शुक्रवार, 13 मई 2016

दिल्ली, दोपहर और जूस वाला

आसमान से 42 डिग्री सेल्सियस का ताप फेंकता सूरज, आगे चलते हुए पिछवाड़े से आग फेंकती डीटीसी बस, गर्म हवा के थपेड़े और निचे से बाइक की तपती सीट, इसी बीच किसी छायादार पेड़ के निचे कोई 'दिलवाला जूस वाला' दिख जाए तो बाइक खुद-ब-खुद मुड़ जाती है...हम भी मुड़ ही गए हैं...हाँ भैया कौन सा बनाऊं 10 का, 20 का या 30 का...गर्दन झटक कर अपनी लंबी बालों को यथास्थान करते हुए जूस वाले भाई ने पूछा है...मैं भी 20 वाला कह कर उनके बाल, जूस के ठेले पर लिखे नाम 'दिलवाले' और दिलवाले वाले अजय देवगन तथा रवीना टंडन की तस्वीरों में सामंजस्य बैठाने लगा हूँ...देखकर अच्छा लगा है कि सिंघम स्टाइल वाले फैन्स के जमाने में अजय देवगन के दिलवाले वाले फैन भी हैं...भाई के बाल और जूस ठेले का नाम देखकर मन बचपन की उन यादों में गोते लगाने लगा है जब बरफ (आइसक्रीम) वाला पों पों बजाता था और हम दौड़ पड़ते थे...(एक गोलाकार बैलून की तरह होता था जिसे दबाने पर पों पों की आवाज आती थी, इसे ही बजाकर बरफ वाला अपने आने की सूचना देता था) साइकिल के स्टैंड पर रखे गए लकड़ी या टिन के डब्बे में से बरफ वाला बरफ निकालता। बात इशारों में ही होती थी कि 1,2 या 5 रुपया वाला चाहिए क्योंकि मुंह में पड़े गुटखे की मजबूरी उन्हें बोलने नहीं देती थी। जब दाम को लेकर विवाद होता तब भाई साहब किसी कोने में पच्च कर देते...तब आइसक्रीम शब्द गाँवों में उतना लोकप्रिय नहीं हुआ था, लेकिन नाम में आइसक्रीम या कुल्फी का उपयोग जरूर दिखता था...साइकिल पर बरफ के डब्बे के पीछे या उसी के सहारे लगाए गए लकड़ी के तख्ते पर ये लोग फिल्मी सितारों के नाम से ही अपने चलंत दूकान का नाम रख लेते थे जैसे 'ऐश्वर्या आइसक्रीम', 'काजोल कुल्फी' इत्यादि...
मैं इन्ही यादों में खोया था तभी जूस वाले ने जूस से भरा ग्लास बढ़ा दिया है...इस बार भाई साहब एक मशहूर गज़ल गुनगुना रहे थे...मैंने भी सुबह में All India Radio से प्राप्त उस गज़ल से संबंधित ज्ञान का उपयोग करते हुए पूछ दिया है...भाई ये जो आप गा रहे हैं इसे तो गाया है ग़ुलाम अली साहब ने, लिखा कौन है? तड़ाक से जवाब आया है...'हसरत मोहानी'...भाई मोदी जी ने मुझे भी रेडियो सुनना सीखा दिया है...जवाब के साथ मिले एक और जवाब ने मुझे हतप्रभ कर दिया है...सच में एक बात तो है, मोदी जी सिर्फ सरकार ही नहीं चला रहे...
आज का दिन क्यों ख़ास है ? किस महान हस्ती ने आज जन्म लिया या कौन बिछड़ गए... ये हममे से बहुत लोग नहीं जानते होंगे लेकिन उस दिलवाले हेयर स्टाइल जूस वाले को सब पता था क्योंकि वह दिन में रेडियो सुने ना सुने सुबह 8 बजे के न्यूज़ के साथ उससे पहले का कार्यक्रम भी जरूर सुनता है जिसमे यह सब बताया जाता है...ख़ैर आज मशहूर शायर, स्वतंत्रता सेनानी और संविधान सभा के सदस्य रहे हसरत मोहानी की पुण्यतिथि है...और इन्ही की लेखनी से निकली वह मशहूर गजल जिसे जूस वाले भाई साहब गुनगुना रहे थे वह है...

'चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है,
हमको अब तक आशिकी का वो ज़माना याद है...'

मंगलवार, 10 मई 2016

चलते चलते...यूं ही कोई मिल गया था...

'पेड़ को काटने वालों को ये मालूम तो था,
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा।'

वर्तमान समय के सबसे ज्वलंत मुद्दे को बहुत पहले शायरी में समेट कर जिस शायर ने समाज को सबक सिखाने का काम किया था उसकी मुहब्बत की पंक्तियाँ आज भी राह चलते लोगों को गुनगुनाते हुए सुनी जा सकती है...सामने वाले के चेहरे की बनावटी हंसी को देखकर आज भी अनायास ही यह गीत होठो पर आ जाता है कि
'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो...'

मिले या बिछड़े हुए, बिछड़ते बिछड़ते मिले हुए या मिलते मिलते बिछड़ चुके किसी हमसफ़र की याद इस 20वी सदी में भी 19वी सदी के इस गीत को ही अपना अपना गंतव्य बनाती है कि,
'चलते-चलते यूँ ही कोई मिल गया था,
सरे राह चलते-चलते...
वहीं थम के रह गई है, मेरी रात ढलते-ढलते...'

आज आजादी की पहली जंग की सालगिरह है...जी हाँ आज ही के दिन 1857 में फिरंगियों से भारत की आजादी की आवाज बुलंद हुई थी...जिसकी परिणति ने हमें स्वतंत्रता की आबो हवा में सांस लेने की सौगात दी...लेकिन जिन कुर्बानियों की बदौलत हमने स्वतंत्रता पाई उनके लिए नतमस्तक कर देता है उसी गीतकार का यह गीत जिसकी मैं बात कर रहा हूँ,
'कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों...।'

जिस लिखनी से मातृभूमि के दीवानों का देशवासियों के लिए यह पैग़ाम निकला उसी लेखनी से उन दीवानों के दिल की आवाज भी निकली है जिनकी सार्थकता को आज भी लोग जीते हैं...
'कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों हैं?
वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों हैं?
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों हैं?
यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों हैं?'

शायरी को दीवानों के दिल से निकला प्रश्न बनाने वाले इस शायर की इन पंक्तियों से भी आप शायद ही अनभिज्ञ होंगे कि,
'झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं...।'

प्रवास हर समय में समाज की एक पीड़ा रही है...और शायर, कवि, गीतकार की तत्कालीन समय में सार्थकता यही है कि वह उस समय के दुःखों, तकलीफों को आवाज दे...दूर रहकर अपनी जमीन को याद करने वालों की ख्वाहिस ये पंक्तियाँ बखूबी समेटे हुए है कि,
'वो कभी धूप कभी छाँव लगे,
मुझे क्या-क्या न मेरा गाँव लगे,
किसी पीपल के तले जा बैठे
अब भी अपना जो कोई दाँव लगे।'

वक्त के हंसी सितम से खुद को और उनको बदलने के भाव को बयां करने वाले उस महान शायर को अब तक आप पहचान ही गए होंगे...फिर भी मैं बता देता हूँ...समाज, सियासत और मुहब्बत तीनों को अपनी लेखनी से बयां करने वाले मशहूर शायर 'कैफ़ी आज़मी' की आज पुण्यतिथि है। उसी कैफ़ी आज़मी की जिन्होंने हिंदी सीने जगत को 'शबाना आज़मी' जैसी अदाकारा दी...और जो अपनी ही इन पंक्तियों को चरितार्थ कर गए कि
'इंसाँ की ख़ाहिशों की कोई इंतेहा नहीं
दो गज़ ज़मीन चाहिए, दो गज़ कफ़न के बाद।'
आज ही के दिन यानी 10 मई को आज से 6 साल पहले यह मशहूर शायर, कवि, और गीतकार यह गुनगुनाते हुए हमसे रुखसत हो गया कि,
'ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं...'
लेकिन अब भी...
'जरा-सी आहट होती है तो दिल सोचता है
कहीं ये वो तो नहीं, कहीं ये वो तो नहीं...।'

रविवार, 8 मई 2016

मां और मदर्स डे

‘...सुनो, मैं सोच रहा हूं कि इस मदर्स डे, मम्मी को अपने ही घर बुलाऊं और हम उन्हें एक कार सरप्राइज गिफ्ट में दें।’ भाई साहब के इतना कहते ही बगल की सीट पर बैठी महिला जो शायद उनकी पत्नी थीं, जोर से बोल पड़ीं, ‘अभी तो जनवरी में उनके जन्मदिन पर जंगपुरा जैसे इलाके में तुमने उन्हें फ्लैट गिफ्ट किया है...’
मैं बस इतना ही सुन सका क्योंकि मदर डेयरी की लाल बत्ती हरी हो गई और मझे अपनी बाइक आगे बढ़ानी पड़ी साथ ही वह गाड़ी भी धूल उड़ाती आगे बढ़ गई, जिसमे बैठे ‘बेटे-बहु’ की बातचीत उस आधुनिकता का चित्रण कर रही थी, जो भारतीय विरासत और संस्कृति के ऊपर बदनुमा दाग है। उन दोनों की बातचीत से ही स्पष्ट हो गया कि वह बेटा उसी शहर में रहकर भी अपनी मां से अलग रहता है। यहां यह बताना जरूरी है कि जिस कार में वे बैठे थे, उसकी पिछली सीट पर एक विशालकाय कुत्ता बैठा था, जिसकी गर्दन खिड़की से बाहर थी। मुझे नहीं पता कि कुत्ता पालना आधुनिकता का पैमाना है या वर्तमान की जरूरत, लेकिन यह तो सर्वविदित है कि कुपात्र और सुपात्र का पैमाना माता पिता के प्रति पुत्र का व्यवहार ही होता है। पूरी उम्र जो माता-पिता इस आस में गुजार देते हैं कि उम्र के अंतिम पड़ाव में उनकी संतान उनका सहारा बनेगी, वो संतान अगर उस समय अपनी तथाकथित आधुनिक जीवनशैली को माता-पिता की जरूरतों और ख्वाहिशों पर हावी कर दे, तो उस माता-पिता के दुःख का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है।
पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम ने एकबार कहा था, ‘जब मैं पैदा हुआ, इस दुनिया में आया, वो एकमात्र दिन ऐसा था जब मैं रो रहा था और मेरी मां के चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान थी।’ बेटे का रुदन सुनकर कारण जान लेने वाली मां का दुःख एक बेटा क्यों नहीं जान पाता? पूरी जिन्दगी जिस मां के लिए उसका बेटा ही सब कुछ होता है, उस बेटे के लिए उसकी मां सब कुछ क्यों नहीं हो सकती? मुनव्वर राणा साहब का एक शेर है,    
‘उदास रहने को अच्छा नहीं बताता है,  
कोई भी जहर को मीठा नहीं बताता है,  
कल अपने आप को देखा था मां की आंखों में,    
यह आईना हमें बूढ़ा नहीं बताता है...’  
यह बताने की बात नहीं कि मातृत्व की छांव बेटे के उम्र की मोहताज नहीं, पर आखिर क्यों इस तथाकथित आधुनिक समाज में बेटे और मां की बढ़ती उम्र इन दोनों के बीच दूरियों को जन्म दे रही है ? आखिर क्यों बच्चों में मातृत्व की चाहत उम्र के एक पड़ाव तक ही रह गई है? ऐसे तमाम सवाल हैं जो वर्तमान समाज के समक्ष सुरसा की भांति मुंह फैलाए खड़े हैं। अगर समय रहते इनका जवाब नहीं ढूंढा गया, तो परिवार-सभ्यता और मर्यादा के लिए जानी जाने वाली यह भारत भूमि आधुनिकता की रफ्तार में कहीं गुम हो जाएगी। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि जिस देश में धरती, गाय और नदियों तक को हम मां कहते हैं, वहां अपनी मां का दर्द साझा करने के लिए हमारे पास समय नहीं है। भारत में दिन-ब-दिन बढ़ती वृद्धाश्रमों की संख्या यह बताने के लिए काफी है कि हमारा वर्तमान समाज किस दिशा में जा रहा है।
कुछ साल पहले की बात है, फ्रांस में बहुत गर्मी पड़ी तो वहां के कई बुजुर्ग अपने घरों में मृत पाए गए थे, क्योंकि वहां उनकी देख-रेख करने वाला कोई नहीं था। हमारा वर्तमान भी इस दिशा में बढ़ रहा है और वैश्वीकरण के रास्ते दुनिया की यह हकीकत भारतीय संस्कृति में घुसपैठ करने को तैयार है। जरूरत है अपनी विरासत और मां की अहमियत को समझने की। सिर्फ सोशल साइट्स पर ‘सुपर मॉम’ वाला मैसेज चस्पा कर देने से हम बेटा-बेटी होने का फर्ज अदा नहीं कर सकते हैं। सिर्फ एक दिन मां की पसंद की साड़ी उन्हें पहना कर या उनकी पसंद का खाना खिलाकर हम उन तमाम दिनों की असलियत पर पर्दा नहीं डाल सकते हैं जब मां हमारे साथ रहते हुए भी हमसे दूर रहती है। हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि हम उस भारत भूमि पर निवास करते हैं, जहां चंगेज खान जैसे खूनी शासक के दरबार में अपने बेटे को खोजती हुई पहुंची एक मां, उससे सीधे सवाल करती है, ‘तेरी फौज में मेरा बेटा काम करता था, मैं उसे लेनी आई हूं...’ चंगेज खान हैरानी से उस मां से प्रश्न करता है कि मां तू आई कैसे ? रास्ते में पर्वत और समुन्द्र पड़े होंगे तूने उसे पार कैसे किया ? तो उस मां का जवाब होता है, ‘मैंने समुद्र और पर्वत से यह कहकर रास्ता मांगी कि मैं मां हूं, मुझे रास्ता दो और उन्होंने मुझे रास्ता दे दिया।’
अभी व्हाट्सएप पर एक मैसेज खूब फॉरवार्ड किया जा रहा है। जिसमे यह बताया गया है कि, ‘एक बेटा अपनी पत्नी और बेटे के साथ घर से बाहर निकलते हुए अपनी मां से कहता है, मां पास के मंदिर में भंडारा है आप वहां जा कर खाना खा लेना, हम बाहर से खा कर आएंगे। तभी उनका छोटा बेटा अपनी मां से कहता है, ‘मां मैं बड़ा होकर घर के पास एक मंदिर बनवाऊंगा, ताकि जब मैं अपनी पत्नी के साथ बाहर जाऊं तो आपको और पापा को खाना खाने में परेशानी नहीं हो।’ एक छोटा सा यह मैसेज वर्तमान और भविष्य की दिशा-दशा बताने के लिए काफी है। हमारा आज का कर्म ही कल की बुनियाद बनता है। आज अपने बच्चों के सामने बुजुर्गों के लिए किया जाने वाला सलूक ही कल हमारे और हमारे बच्चों के बीच के संबंधों का आधार बनेगा। क्षणिक आकर्षण और सर्वार्थसिद्धि के आगे मां के प्यार और उसकी अहमियत को नजरअंदाज करने वालों को हम जैसे मातृत्व सुख से महरूम लोगों के दर्द से जरूर सीख लेनी चाहिए, जिनका दुर्भाग्य मुनव्वर राणा की इन पंक्तियों की ख्वाहिश को भी जीने की इजाजत नहीं देता...
‘जी चाहता है कि मैं फिर से खिलौना हो जाऊं,
मां से इस तरह से लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं...'

रविवार, 1 मई 2016

मज़बूरी का नाम मजदूरी...

'कुचल कुचल के न फ़ुटपाथ को चलो इतना
यहां पर रात को मज़दूर ख़्वाब देखते हैं...'

भले ही एक चाय बेचने वाले की सियासी संगत उसे सत्ता की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठा दे, लेकिन अहमद सलमान के इस शेर की सार्थकता भारत और भारतीयता का दुर्भाग्य बनी रहेगी। मखमली चादर कभी भी एक मजदूर के ख्वाब का बिस्तर नहीं हो सकता... आज मजदूर दिवस है, मजदूरों की दीन-दशा पर आज फिर कशीदे गढ़े जाएंगे, जीडीपी में इनका योगदान ट्विटर पर ट्रेंड करेगा। प्रधानमंत्री जी ने तो ट्वीट भी कर दिया है। लेकिन ये नहीं बता सके कि भूख के कारण जिनका पेट और पीठ एक हो चुका है, उनके लिए मनरेगा की मजदूरी में एक रुपए की बढ़ोतरी से कैसे अच्छे दिन लाए जा सकते हैं...
दिल्ली आया तो पहली बार देखा कि एक माँ सिर्फ भरपेट भोजन के लिए पेट पर अपने बच्चे और पीठ पर इंट या बालू लादे हुए कई मंजिल चढ़ती है। मजदूरी तो पहले भी मैं देखा था लेकिन मजबूरी की आग में एक माँ को मजदूर बनते दिल्ली ने ही दिखाया। ऐसा नहीं कि इतनी मेहनत के बाद भी इन्हें इनका वाजिब हक मिल पा रहा है। तमाम कागजी कानूनों के इस दौर में भी ये धन्ना सेठों के रहमोकरम पर 'पल' रहे हैं। रात 8 बजे के बाद आपको किसी भी महानगर या बड़े शहर के शोर से बेफिक्र फुटपाथों पर सैकड़ों की संख्या में एक साथ सोए हुए लोग दिख जाएंगे जो केवल पैसों के किए अपना आशियाना छोड़कर घर से सैकड़ों किमी दूर खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर हैं। यह वह दुःख है जिसे वो नहीं जान सकता जो एसी कमरों और महंगी गाड़ियों में बैठ कर रोजमर्रा की जरुरतो से मरहूम अपनी जन्मस्थली को भूल जाता है, लेकिन वो जान सकता है जो सैकड़ो किलोमीटर दूर अपने परिवार की खुशी के लिए किसी और की सौ मंजिला इमारत को अंतिम रूप देने में अपनी हड्डियाँ गला रहा है। हर राज्य की नई सरकार इस वादे के साथ सता पर काबिज होती है कि वे प्रवास रोकेंगे। लेकिन बिहार, झारखंड, यूपी, कश्मीर, आसाम और अन्य कई राज्यों से महानगरों की ओर जाने वाली ट्रेनों की भारी भीड़ हर दिन उन हुक्मरानों से सवाल करती दिखती है जो आजादी के लगभग 7 दशक बाद भी भारत को इस तरह नहीं बना सकें जहाँ एक आदमी अपनी जन्मस्थली पर ही अपने परिवार के साथ पूरी जिन्दगी बसर कर सके। आखिर कब तक प्रवासी मजदूर अपने परिवार से दूर दिल्ली के कापसहेड़ा, मुम्बई के धारावी और कोलकाता के स्लम एरिया में अभावग्रस्त जिन्दगी जीने को मजबूर रहेंगे? ‘गरीब-किसान-मजदूर’ ये तीन शब्द हैं जो सियासत की शब्दावली में सबसे पहले आते हैं लेकिन अफ़सोस कि सत्ता आज तक इन्हें इनका वाजिब हक़ नहीं दे सकी और ये आज भी उसी जगह पर खड़े हैं जहाँ 7 दशक साल पहले एक बूढ़ा फ़कीर इन्हें छोड़कर गया था। आंकड़ो की ओट में सियासी बिसात बिछाने वाले आखिर यह कब समझेंगे कि मजदूर के शरीर में केवल वोटिंग मशीन पर बटन दबाने वाला अंगूठा ही नहीं वरन वह पूरा शरीर भी है जिससे निकला पसीना जीडीपी की बुनियाद खड़ी खड़ी करता है। किसी ने सच ही कहा है,
'दुनिया बदली
सत्ता बदली
बदले गांव जवार
पर मजदूर का हाल न बदला
आई गई सरकार...।'

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

माता भूमि पुत्रो अहम् पृथिव्या

जब इस पंक्ति का अर्थ भी नहीं समझता था तब से मैं इस धरती का बेटा होने का फर्ज निभा रहा हूँ। आज विश्व पृथ्वी दिवस पर अचानक ही बचपन की वह तस्वीर आँखों के सामने जीवंत हो गई जब धान-गेंहू की बुआई और धान की रोपनी शुरू होने से पहले माँ पूजा की थाली में तमाम सामग्रियाँ रखकर सर पर रखे गमछे के ऊपर रख देती थीं और हम भी घर में सबसे छोटे होने का फर्ज निभाते हुए अपने उन खेतों की पूजा को निकल पड़ते थे जिसकी उपज ने आज हमे यहाँ तक पहुंचाया है। बचपन से ही पूजा-पाठ में गहरी रूचि होने के कारण यह मौका हर बार अपने ही जिम्मे आता था और हम भी जिम्मेदारी से इसका निर्वहन करते थे और कर भी रहे हैं। मुझे अब भी याद है जब पहली बार गावा लेने (बुआई से पहले खेत की पूजा) जा रहा था। इस पूजा के बारे में स्पष्ट निर्देश होता था कि एक बार पूजा की थाली सर पर रख ली गई तो फिर बोलना नहीं है। माँ ने थाली सर पर रख दी और हम भी घर की चौखट पार कर गए तभी याद आया कि अरे माँ से ये तो पूछे ही नहीं कि खेत माता से मांगना क्या है। क्योंकि उससे पहले जब पूजा पाठ समझने लगा था तब एक बार माँ से पूछा था कि पूजा करते समय भगवान् से क्या मांगते हैं तो उन्होंने भी ऐसे ही बता दिया था, 'बल-बुद्धि-विद्या'...आज भी ईश्वर के सामने हाथ जोड़कर आँख बंद करते ही माँ की बताई वही मांगे खुदबखुद मन में आ जाती हैं। खैर, खेत में पहुँचने तक अपना बालमन इसी उधेड़बुन में था कि ये मांगें तो मंदिरों के भगवान् के लिए है खेत के भगवान् से कुछ और माँगा जाता होगा। चूँकि बोलने का आदेश नहीं था इसलिए किसी से पूछ भी नहीं सकते थे। यही सोचते सोचते खेत में पहुँच गए...अब मन में बिना कोई मांग रखे प्रार्थना तो कर नहीं सकते थे...तभी नज़र खेत में हल चला रहे हमारे जाना (खेतों में काम करने वाले) सतन काका पर पड़ी सोचा कि एक बार ऐसे ही खेत माता को प्रणाम कर के सतन काका से पूछते हैं। धरती माता को भुलियाने के भाव से धीरे से गोड़ लाग के (प्रणाम कर के) दौड़ गए सतन काका के पास। पूछने पर उन्होंने बताया, 'धरती माता से कहीअ, 'हे अन्नपूर्णा माता नाया अन्न धरे (रखने) के दी पुरान अन्न खाए के दी'...आज भी जब गाँव जाने के समय खेतों में जाता हूँ तो सतन काका की बताई वह मासूम सी मांग याद आ जाती है...और अपनी पारिवारिक विरासत पर गर्व होता है कि हम उस विरासत से निकले हैं जहाँ इस वसुंधरा पर फसल बोन या रोपने से पहले नतमस्तक होकर दही हल्दी, चंदन, नैवेद और अक्षत से इसकी पूजा करते हैं...काश अपनी धरती से यह आत्मीयता और यह प्रेम कंक्रीट के जंगल खड़ा करने वाले समझ पाते...

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

कश्मीर में छात्रों की पिटाई और मुखर्जी जी के सपने

'अपने देश में मातृभूमि का नारा जहाँ निषेध लगे,
भारत माँ की जय कहने पर जहाँ अपनों को मारा है,
इस अखंड भूमि भारत में बोलो अब हम कैसे कहें
कि दूर हटो ऐ दुनिया वालो हिन्दुस्तान हमारा है...'

मेरी इन चार पंक्तियों से निकला प्रश्न आज भाजपा के 36 वे स्थापना दिवस पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते समय शायद अमित शाह या भाजपा के अन्य नेताओं के ध्यान में नहीं आया होगा क्योंकि हर मौके पर मुखर्जी जी को कश्मीर से जोड़कर 'जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी, वह कश्मीर हमारा है' के नारे लगाने वाली भारतीय जनता पार्टी के आलाकमान को यह अहसास होता कि अगर आज श्यामा प्रसाद मुखर्जी होते तो भारत के अभिन्न अंग कश्मीर में भारत माता की जय के नारे लगाने पर छात्रों की हड्डी तोड़े जाने वाली घटना पर उनका रुख क्या होता, तो आज भाजपा मुख्यालय में गर्व के नारों के साथ साथ कुछ समय खुद पर शर्म करने के लिए भी निकाला गया होता क्योंकि मुखर्जी जी ने उसी कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाने के अपने सपने को पूरा होते देखने के लिए कांग्रेस के मंत्री पद को ठुकरा कर जनसंघ की स्थापना की थी और जीते जी 'एक निशान, एक प्रधान, एक विधान' के लिए लड़ते रहे। अपने हितार्थ ऐसी घटनाओं को असहिष्णुता करार देने वालों और इनकी तुलना आपातकाल से कर के टीवी स्क्रीन ब्लैक करने वालों से मैं नहीं पूछूँगा कि यह असहिष्णुता है या नहीं क्योंकि उनकी थुथुरलोजी वाला लॉजिक सबको पता है। पीडीपी के साथ मिलकर भाजपा के सरकार बनाने पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि सरकार में शामिल होकर ही रीति-निति में बदलाव किया जा सकता है लेकिन सवाल यह है कि केंद्र और कश्मीर में भी एक राष्ट्रवादी सरकार के रहते राष्ट्रवाद की धज्जियां कैसे उड़ सकती है और अपनी मातृभूमि, भारत माँ के जय के नारे लगाने वाले छात्रों पर लाठियां क्यों बरसाई गई?

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

दिल्ली सरकार की नजर में ‘आदमी’ नहीं गेस्ट टीचर



पैसा कमाना हर आदमी की ख्वाहिस ही नहीं मज़बूरी भी होती है लेकिन क्या वह पैसा कभी सुख-सुकून दे पाएगा जो खुद के अंदर के इंसान को मार कर कमाया जा रहा हो। वह भी उस पेशे में जिससे देश और समाज का भविष्य जुड़ा हो। जी हाँ, बिना छुट्टी के लगातार काम करते रहना, खुद के अंदर के इंसान को मारना ही होता है। बीमारी में जब कि शरीर को आराम की जरुरत होती है उस समय भी नौकरी हाथ से निकलने के डर से सेहत को नजरअंदाज कर देना इंसानी जरूरतों के साथ खिलवाड़ ही है। पर्व-त्यौहार, शादी की बात दो दूर, किसी औरत के पाँव में फ्रैक्चर आ गया हो तो भी उसे काम से छुट्टी ना दी जाय और छुट्टी लेने की हालत में नौकरी छूटने का डर दिखाया जाय तो आप इसे क्या कहेंगे? माँ बनने के दो दिन बाद भी अगर किसी औरत को काम पर आना पड़े और कमजोरी की अवस्था में वह बेहोस होकर गिर पड़े तो क्या हम इसे उस व्यक्ति, उस संगठन से मानवता का लोप नहीं कहेंगे जो अपने कर्मचारियों से ऐसे काम लेता है। 
 
पर अफ़सोस कि इंसानियत को ताक पर रखकर काम लेने का यह कृत्य किसी व्यक्ति या निजी संगठन का नहीं है, और ना ये किसी कॉर्पोरेट सेक्टर के कर्मचारियों की दर्द भरी दास्ताँ है। यह कहानी है दिल्ली सरकार के अधीन काम कर रहे गेस्ट और कॉन्ट्रेक्ट शिक्षकों का और इनका बेदर्द हाकिम है उस दिल्ली सरकार का शिक्षा विभाग जिसने अपनी सियासी पहचान को ही आम आदमियों से जोड़ा था। लेकिन आज शिक्षक रूप में ये आम आदमी हलकान हैं लेकिन सरकार की तरफ से सिर्फ सब्जबाग ही दिखाए जा रहे हैं। 25 जनवरी को मुख्यमंत्री केजरीवाल जी ने कहा, ‘हम सरकारी स्कूलों को प्राइवेट से बेहतर बनाएंगे।’ लेकिन सीएम साहब अब तक उन सवालों का जवाब नहीं दे पाए हैं जो कई बार गेस्ट और कॉन्ट्रेक्ट शिक्षकों ने उनके दफ्तर, आवास, जंतर मंतर या सड़कों पर उतर कर उनसे पूछा था। हालाँकि दिल्ली में ठेके पर नियुक्त दिहाड़ी मजदूरों की तरह काम कर रहे इन शिक्षकों की दुर्दशा की जिम्मेदार दिल्ली की वर्तमान सरकार नहीं है, शीला दीक्षित शासन में भी इन शिक्षकों का यही हाल था। लेकिन आन्दोलन के बाद जिन मुद्दों पर केजरीवाल कुनबे का सियासी प्रवेश हुआ उसमे ठेके पर बहाल इन गेस्ट/कॉन्ट्रेक्ट शिक्षकों को नियमित करना भी प्रमुख था। लेकिन लोकपाल के नाम पर कुर्बान हो चुकी पहली सरकार के बाद दूसरी सरकार के भी एक साल बीत गए लेकिन बच्चों के भविष्य की बुनियाद रखने वाले ये शिक्षक आज भी दिहाड़ी मजदूर के जैसी जिन्दगी जी रहे हैं। और दिल्ली सरकार में नियमित होने सदृश्य सपनों के महल के भरभराकर गिरने की दशा में आस का एक सहारा लिए ये हमेशा मुख्यमंत्री या शिक्षा मंत्री के दरवाजे पर दस्तक देते हैं लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती है।

‘जिस दिन जन्तर मंतर पर आम आदमी पार्टी की सभा में एक किसान गजेन्द्र ने आत्महत्या की उसी दिन और उसी समय जन्तर मन्त्र पर ही सैकड़ों की संख्या में गेस्ट टीचर्स भी आए थे दिल्ली सरकार को अपनी मांग बताने के लिए लेकिन सियासी आग का रूप ले चुकी उस किसान की आत्महत्या में हमारी वाजिब मांगें झुलस कर रह गई। उसके बाद भी हमने कई बार मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री सह शिक्षा मंत्री सिसोदिया जी का घेराव किया है उनसे भी अपनी समस्याएं बताई लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। छुट्टी तो छोड़ दीजिए, हमारा वेतन भी पिछले 2 महीने से बाकी है, कब मिलेगा यह भी पता नहीं।’ यह कहते-कहते ‘बबलू’ मायूस हो गए। बबलू दिल्ली सरकार में पिछले एक साल से कॉन्ट्रेक्ट टीचर हैं। न्यू कोंडली स्कूल में पढ़ाने वाली एक मैम की शादी सिर्फ इसलिए टालनी पड़ गई क्योंकि उन्हें शादी के लिए छुट्टी नहीं मिल पा रही थी। हैरान करने वाली बात यह है जब दिल्ली सरकार के अधीन गेस्ट टीचर के रूप में काम कर रही एक महिला कहती हैं कि, ‘एक स्त्री खुद में पूर्ण तभी होती है जब उसमें मातृत्व भाव आता है, जब वह माँ बनती है लेकिन क्या सितम है कि हमें मैटरनिटी लिव तक नहीं दिया जा रहा। आज जब कि सभी सरकारी महकमों में मैटरनिटी लिव में इजाफा किया जा रहा है, हमें एक अदद छुट्टी के लिए तरसना पड़ रहा है। गेस्ट टीचर्स की इन सस्मास्याओं पर ‘गेस्ट टीचर्स एसोसिएसन’ के अध्यक्ष प्रवीन तोगड़िया कहते हैं, ‘शिक्षक समाज का पथ प्रदर्शक होता है लेकिन जब उसे ही सरकार सुविधाहीन बना देगी तो फिर वह अपने कर्तव्यों का निर्वहन कैसे कर पाएगा? वर्तमान में दिल्ली के स्कूलों में गेस्ट और कॉन्ट्रेक्ट टीचर्स के जो हालात है उसे देखकर साफ़ कहा जा सकता है कि सरकार इनका शोषण कर रही है।’

यह सच है कि आज के बच्चों से बना कल का समाज और सामाजिक व्यवस्था कैसी होगी इसके निर्धारण में शिक्षक महती भूमिका अदा करता है और यह भी सच है कि वेतन और सुविधा की संतुष्टि के बिना कोई भी अपना काम पूरे मनोयोग से नहीं कर सकता है। तो क्या गेस्ट और कॉन्ट्रेक्ट टीचर्स के सहारे चलने वाले दिल्ली के स्कूल पढ़ाई की गुणवत्ता में प्राइवेट स्कूलों को पीछे छोड़ सकते हैं, जैसा कि मुख्यमंत्री केजरीवाल जी कह रहे हैं? क्या इसके लिए जरुरी नहीं है कि सीएल (कैजुअल लीव) और अन्य सुविधाओं के साथ साथ करीब आधा लाख वेतन उठाने वाले शिक्षकों के जैसा ही बर्ताव उनके साथ भी हो जो 800 रुपए हर दिन के हिसाब से स्कूलों में पढ़ाने आते हैं और जिनके वेतन वाले दिनों में रविवार और सरकारी छुट्टियों की गिनती नहीं होती, छुट्टी तो खैर ले ही नहीं सकते हैं... ।