सोमवार, 14 अगस्त 2017

इस रात की 'सुबह' कब होगी...

वो आधी रात का समय था, जब अपने भाषण के दौरान नेहरू ने कहा था- 'मध्यरात्री घंटे के स्पर्श पर जब दुनिया सोती है, भारत जीवन और आजादी के लिए जागेगा। आज हमने अपने दुर्भाग्य को समाप्त कर दिया...।' लेकिन क्या सच में दुर्भाग्य समाप्त हो गया? क्या ये रात के बाद की सुबह की निशानी है कि जब लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री जी राष्ट्र के नाम संबोधन कर रहे होंगे और हम भारत माता की जय के नारे लगा रहे होंगे, तब देश के सबसे बड़े सूबे में सैकड़ों माताएं अपनी सूनी हो चुकी कोख के लिए विलाप कर रही होंगी? पानी भरे घरों के छप्पर पर बैठकर, फिर से बारिश ना हो जाय इस डर से आसमान की ओर कातर दृष्टि से देख रहे करोड़ों लोगों की ज़िंदगी का अंधेरा क्या सच में उजाले में बदल गया है? आज ढाबो में बर्तन धो रही नन्ही हाथें, अपने मालिक की एक आवाज पर सरपट दौड़ने वाले नन्हे पैर, और हाथों में गुटखे का थैला लिए ट्रेनों-बसों में घूमते बच्चे क्या अब तक आज़ादी से रूबरू हो सके हैं? भर पेट भोजन ना मिल पाने के कारण हमारे देश में हर 5 मिनट में 1 आदमी दम तोड़ देता है, क्या उनके लिए वो दिन का उजाला भी रात का अंधेरा नहीं है, जब उनकी जठरागन जिंदगी पर हावी जो जाती है? एक दिन की जिंदगी जीने के लिए जब दहाई अंक का सबसे ज्यादा पैसा भी नाकाफी हो, उस दौर में देश की उस 70 फीसदी से ज्यादा आबादी के लिए स्वतंत्रता का मतलब क्या हो सकता है, जो 20 रुपए प्रतिदिन में गुजारा करती है? 86 फीसदी ग्रामीण और 82 फीसदी शहरी आबादी, जिसके पास आज भी मेडिकल बीमा नहीं है, उसके देहावसान के बाद उसके परिजनों की जिंदगी में उजाले वाली बल्ब क्या फ्यूज नहीं हो जाती होगी? उस 65 फीसदी युवा आबादी के जरिए सुराज की कल्पना क्या आधारविहीन नहीं है, जिसमे से हर साल 25,000 युवा पढ़ाई के दबाव या अन्य चुनौतियों के कारण आत्महत्या कर लेते हैं? क्या ये अंधेरे में हाथ मारना नहीं है कि 'स्कूल चले हम' का नारा देने के दशकों बाद भी और इस नारे को सार्थक करने पर सैकड़ों करोड़ रुपए बहाने के बाद भी देश में 10 करोड़ से ज्यादा बच्चों को स्कूल नसीब नहीं है?

'इलाही वो भी दिन होगा, कभी वो दिन भी देखेंगे,
जब अपनी ही जमीं होगी और अपना आसमां होगा।'
इस शेर में गुलाम भारत की पीड़ा है, पर अफ़सोस कि इन शब्दों में आज भी उन 20 करोड़ भारतीयों का सपना है, जो खुले आसमान के नीचे रात गुजारते हैं। इन सबके बावजूद, मैं न तो खुद हतोत्साहित हूं और न ही मेरी मंशा आपको हताश करने की है। आजादी के 70 सालों में हमने खूब तरक्की भी की है, पर अफसोस कि हमारे नीति नियंता उस तरक्की से आमजन को नहीं जोड़ पाए। हमने सबसे कम लागत की परमाणु ऊर्जा तो विकसित कर ली, लेकिन देश की एक बड़ी आबादी को इस लायक नहीं बना सके कि वो महीने भर की कमाई से खाना पकाने वाला एक रसोई गैस सिलेंडर भी खरीद सके। सामरिक शक्ति के मामले में हम दुनिया के अग्रणी देशों में हैं, आज सबसे ताकतवर चीन भी हमसे आंख मिलाने से पहले सौ बार सोचता है, लेकिन क्या हम स्वास्थ्य के मामले में खुद को मजबूत कर पाए हैं? हालत ये है कि देश में 61,011 लोगों पर एक अस्पताल, 1833 मरीजों पर एक बेड और 1700 मरीजों पर एक डॉक्टर की उपलब्धता है। ये यूं ही नहीं है, परमाणु पनडुब्बी लांच करने से लेकर, चांद और मंगल पर मानव रहित मिशन भेजने के मामले में हम अमेरिका के समकक्ष हैं, लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च करने के मामले में उससे बहुत नीचे। स्वास्थ्य सेवाओं पर अमेरिका अपनी जीडीपी का 8.3 फीसदी खर्च करता है, जबकि हम अपनी जीडीपी का सिर्फ 1.4 प्रतिशत। कैसे ना होंगे 100 में 70 आदमी बीमार, और फिर इन पंक्तियों को कैसे झुठला सकते हैं कि
'100 में 70 आदमी फिलहाल जब नासाद है,
दिल पे रखकर हाथ कहिए देश का आजाद है।'

आंकड़ों में दर्ज है कि भारत की मिड-डे मील योजना दुनिया का सबसे बड़ा भोजन कार्यक्रम है, लेकिन देश के 39 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं, 50 फीसदी से ज्यादा बच्चे स्कूल नहीं जा पाते और 40 प्रतिशत बच्चे अपना पांचवा जन्मदिन मनाने से पहले ही चल बसते हैं,  केवल पिछले साल यानि 2016 में 2,96,279 बच्चे डायरिया और निमोनिया से मर गए... आखिर क्यों 70 साल का उजाला भी इनकी जिंदगी में सुबह की रौशनी नहीं ला पाया? आखिर इस रात की सुबह क्यों नहीं होती...? आप जब ये पढ़ रहे होंगे, तब शायद 14 की मध्य रात्रि नहीं, 15 का सुबह होगा... चारो तरफ देशभक्ति के गीत गूंज रहे होंगे, आसमान में तिरंगा लहरा रहा होगा, हम अपने शहीदों और उनकी कुर्बानीयों को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे होंगे, चारों तरफ महात्मा गांधी जिंदाबाद, सरदार पटेल जिंदाबाद, सुभाष चन्द्र बोस जिंदाबाद के नारों से आकाश गुंजयमान हो रहा होगा... लेकिन सोचिएगा, क्या हम गांधी-नेहरू-पटेल-सुभाष बोस के सपनों के भारत में जी रहे हैं, सोचिएगा कि 'तंत्र' के मामले में नहीं, 'जन' के मामले में हम 14 अगस्त की मध्य रात्रि के बाद से कितना कदम आगे बढ़े हैं...? आखिर इस रात की सुबह क्यों नहीं होती...

रविवार, 13 अगस्त 2017

हादसों की राजनीति या राजनीति का हादसा

गोरखपुर की घटना अब पुरानी होने लगी है, इसलिए सरकार और भाजपा का बचाव दल सक्रिय हो रहा है, जो लाजिमी है। ऐसे तमाम प्रसंग सुनाए-बताए जा रहे हैं, जब कांग्रेस सरकार में ऐसी घटनाएं हुईं और मंत्रियों ने इस्तीफा नहीं दिया। हालांकि ऐसे प्रसंग सुनाने वाले भूल जा रहे हैं कि तब भाजपा ने उन मंत्रियों को दायित्व का बोध कराने और नैतिकता का पाठ पढ़ाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। हम भाजपा को पूर्णतः कठघरे में खड़ा नहीं कर रहे, ये हम समझ रहे हैं कि
'जाने लें चिलम जब चढ़े ले अंगारी'
लेकिन आप दिल पर हाथ रखकर बताइए, क्या आप प्रधानमंत्री मोदी जी से ये उम्मीद कर सकते थे कि वे ऐसी बड़ी घटना पर एक ट्वीट तक नहीं करेंगे? क्या आप सोच सकते थे कि खुद को लाल बहादुर शास्त्री का सियासी वारिस बताकर वोट मांगने वाले सिद्धार्थ नाथ सिंह खुद के और सरकार के बचाव में ऐसी गैरजिम्मेदाराना दलील देंगे? इस मामले में सत्ता पक्ष को कठघरे में खड़ा करने वाला वर्तमान विपक्ष भी कौन सा दूध का धुला है। ये दलील देकर और सोचकर कि आपातकाल के बाद भी इंदिरा सत्ता में आई थीं, 2019 में मोदी को मात देने की रणनीति बना रही कांग्रेस शायद बेलछी कांड के समय इंदिरा गांधी का बिहार दौरा भूल चुकी है। अहमद पटेल की जीत के समय सुना था कि राहुल गांधी को वायरल फीवर है, शायद अब तक ठीक नहीं हुए। राहुल गांधी इंदिरा की विरासत को वैसे ही आगे बढ़ा रहे हैं, जैसे सिद्धार्थनाथ सिंह लालबहादुर शास्त्री की। सुकुमार राहुल जी पिछले कई दिनों से अपने ऑफिस के ट्विटर हैंडल के सहारे ही गोरखपुर घटना में सरकार को घेर रहे हैं। शायद राहुल गांधी को ये मालूम भी नहीं होगा- 'आपातकाल के बाद इंदिरा सियासी और कानूनी, हर रूप से विपक्ष के निशाने थीं। उसी दौरान 27 मई 1977 को बिहार में भागलपुर के बेलछी गांव में दबंगों ने कई दलितों के फूंक दिए, इस घटना में दर्जन भर से ज्यादा दलित जिंदा जला कर मार दिए गए थे। इस घटना की खबर सुनते ही इंदिरा गांधी बेलछी के लिए रवाना हो गईं। गांव में गाड़ी नहीं जा सकती थी, इसलिए हाथी की यात्रा करनी पड़ी। वहां भारी बारिश हुई थी और कीचड़ था, जब हाथी के जाने में भी मुश्किल हुई, तो इंदिरा को ट्रैक्टर की यात्रा करनी पड़ी, जब ट्रैक्टर भी नहीं जा सका, तो इंदिरा कीचड़ वाली सड़क पर पैदल चलकर पीड़ितों के घर पहुंचीं।' कहा जाता है कि इंदिरा की बेलछी यात्रा ने ही जनता पार्टी सरकार की उल्टी गिनती शुरू कर दी थी। आज की कांग्रेस को ये किस्सा कौन बताए। ख़ैर, गोरखपुर जैसी घटनाओं के समय कांग्रेस के कुकृत्य गिना रहे भाजपाई बंधुओं के लिए इंदिरा का एक और किस्सा- आज से तक़रीबन छत्तीस साल पहले अचानक अंधेरा हो जाने की वजह से क़ुतुबमीनार की सबसे ऊपरी मंज़िल पर भगदड़ मच गई थी, जिसमें करीब 45 लोग कुचल कर और दम घुटने की वजह से मर गए थे। मरने वालों में ज़्यादातर स्कूली बच्चे थे। इंदिरा गांधी घटनास्थल पर पहुंचीं। ज़मीन पर एक लाइन से रखी बच्चों की लाशें, कपड़े से ढकी हुई थीं। हवा की वजह से कई के चेहरे से कपड़ा हट गया, जिससे उनका कुचला हुआ चेहरा नज़र आ गया। वो मंजर देख इंदिरा की आंखों से आंसू टपक कर दामन में आ गिरे और उन के मुंह से बरजस्ता निकल गया-
'जिन को पामाल किया बाद-ए-सबा तूने आज,
यही गुंचे कभी खिलते तो गुलिस्तां बनते...'

शुक्रवार, 23 जून 2017

23 जून... 1953 से 2017...

वो भी 23 जून ही था जब कश्मीर को सच्चे अर्थों में अखंड भारत का हिस्सा बनाने के लिए संघर्षरत एक 'भारतीय' को सियासी षड्यंत्र के चंगुल में फंसकर शहादत को प्राप्त होना पड़ा था... और ये भी 23 जून ही है, जब एक भारतीय को 'कश्मीरियत-जम्हूरियत-इंसानियत' बचाने की कोशिश में जान से हाथ धोना पड़ा... परिस्थितियों से इतर अंतर सिर्फ इतना है कि वो 1953 था और ये 2017 है... 64 साल बीत गए, रावी में कितना पानी बह गया लेकिन आज भी हर दिन अपनी धारा में खून के छींटे देखती रावी सवाल करती महसूस की जा सकती है कि वो शख्स लौटा क्यों नहीं, जो मेरे बहाव को रक्त रहित करने के मंसूबे से आया था... क्या इसमें षड्यंत्र की बू नहीं आती कि देश के एक तत्कालीन बड़े नेता को राजधानी से कोसो दूर एक वीरान घर में कैद कर दिया जाय और जब उसकी तबियत खराब हो तो एम्बुलेंस की बजाय ऑटो से हॉस्पिटल पहुंचाया जाए, वो भी घण्टों देरी से और हॉस्पिटल पहुंचा कर भी इमरजेंसी वार्ड की जगह उसे प्रसूति वार्ड में भर्ती कराया जाय... 23 जून 1953 की वो घटना आज 23 जून 2017 को एक तरह से फिर दोहराई गई है... आज फिर कश्मीरियत को हिंदुस्तानियत से दूर रखने वाले अपने नापाक मंसूबों में कामयाब हुए हैं और फिर आज वैसी ही चुप्पी है जैसी 64 वर्षों पहले थी... वो 23 जून इस 23 जून को फिर से जिंदा नहीं हुआ होता, एक निर्दोष आज यूं बेमौत नहीं मरता, आज कश्मीरियत यूं नहीं कराहती अगर इस सवाल का जवाब मिल गया होता कि डॉ मुखर्जी क्यों मरे... जी हां, मैं बात कर रहा हूं श्यामा प्रसाद मुखर्जी की, जिन्होंने सपना देखा था 'एक निशान-एक प्रधान-एक विधान का' और उसी सपने को सच होते देखने की कोशिश में हमेशा के लिए सो गए... पर अफसोस उनके सपने को अपनी सियासी स्वार्थसिद्धि का साधन बनाने वालों ने ठीक से उनकी मौत का मातम भी नहीं मनाया... 'बदला' शब्द भले ही हमारी गांधीवादी अहिंसक मनोवृति की डिक्शनरी में नहीं है, लेकिन अगर हमारी निजता और हमारी संप्रभुता पर प्रहार होता है, तो ये जरूरी हो जाता है कि हम अपने सियासी शब्दकोष में कुछ संशोधन करें... जिस नेहरू ने कश्मीर जाकर भी वहां जेल में बंद डॉ मुखर्जी से मिलना उचित नहीं समझा और उनकी मृत्यु के बाद जांच की मांग को ये कहते हुए खारिज कर दिया कि ये स्वाभाविक मौत थी और उसमे कोई रहस्य नहीं है, उस नेहरू की कांग्रेस से तो हम कोई उम्मीद ही नहीं कर सकते... लेकिन दुःख होता है, जब मुखर्जी द्वारा उनके खून से से सींचे हुए पौधे से निकली शाखा पर बैठे नेता आज अपनी धुन में बांसुरी बजा रहे हैं, किसी को उस मां की करुण वेदना याद भी नहीं कि 'मैं अपने प्रिय बेटे की मौत पर आंसू नहीं बहाऊंगी, मैं चाहती हूं कि लोग खुद निर्णय करें कि इस त्रासदी के पीछे क्या वास्तविक कारण थे और स्वतंत्र भारत की सरकार के द्वारा क्या भूमिका अदा की गई?' कश्मीर सियायत की असफलता पर विपक्षी प्रहार से बचने का भाजपा के पास सिर्फ एक कवच-कुंडल है, और वो है- 'जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वो कश्मीर हमारा है...' भाजपा नेता हर मौके पर ढोल-नगाड़े के साथ निर्लज्जता से इस नारे का उद्घोष करते हैं, लेकिन कोई ये जानने की जहमत नहीं उठाता कि भाजपाई शासनकाल में भाजपा ने अपने 'पितामह' के बलिदान के3 षड्यंत्रों से पर्दा हटाने के लिए क्या किया... क्या अदद एक जांच कमिटी भी गठित की... आज अपनी 64वीं पुण्यतिथि पर उसी कश्मीर में एक पुलिसवाले को भीड़ द्वारा मारते देखकर क्या डॉ मुखर्जी की आत्मा आंसू नहीं बहा रही होगी, जिस कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों जैसा देखने की कोशिश में उन्होंने जान गंवा दी... डॉ मुखर्जी की शहादत अगर जाया नहीं गई होती, तो आज मोहम्मद अयूब पंडित की जंदगी यूं खत्म नहीं होती...

मंगलवार, 20 जून 2017

सियासी कवच-कुंडल हैं, दलित-महिला-मुस्लिम

मेरे एक जानने वाले हैं, दलित हैं। पहले गंवई गुंडागर्दी करते थे, फिर प्रखंड स्तर के नामचीन बदमाश हुए, फिर विधायक की जीत के अहम 'कारण' बने, फिर फॉर्च्यूनर पर घूमने लगे। स्थानीय पंचायत में प्रधान का पद आरक्षित हुआ और उनकी पत्नी प्रधान बन गईं। नालायक बेटा बाप के 'पुण्य प्रताप' से ठेकेदार बन गया। दूसरा बेटा 'कॉलेज जाता था', कुछ आरक्षण और कुछ बाप के बाहुबल से स्टेट पीसीएस पास कर गया। बचपन में बगल वालों के घर से चोरी करने पर रड से दागा जाने वाला ये आदमी आज अरबों की संपत्ति का मालिक है और इन्हें अपनी कॉपी दिखाकर परीक्षा-दर-परीक्षा पास कराने वाले इन्हीं की जाति के दोस्त का बेटा आज इनके रहमोकरम पर पल रहा है और इनके ठेकेदार बेटे की ब्रेज़ा का ड्राइवर है। दोनों का घर पास में ही है, लेकिन 40 साल पहले जहां आस-पास दो घास-फूस की झोपड़ी थीं, उनमे से एक की हालत थोड़ी बेहतर हुई है और वहां इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत बना दो कमरे का घर है, जबकि दूसरे की जगह एक आलिशान बंगले ने ले ली है। हां, इस बीच स्थानीय स्तर से लेकर जिला, राज्य और दिल्ली तक कई दलित समर्थक और पिछड़ों गरीबों के मसीहा उन जिम्मेदार पदों पर बैठे, जिनका कर्तव्य था कि वे उस दलित की दशा भी सुधारें, जो पढ़ने में भी कुछ ठीक था और मेहनती भी। लेकिन बात उसे मनरेगा का झुनझुना थमाए जाने से आगे बढ़ी नहीं, जबकि पॉकेटमारी और चोरी चकारी से शुरुआत कर के रंगदारी, गुंडागर्दी और बाहुबल के सहारे सिस्टम का हिस्सा बन जाने वाला दलित अरबपति होते हुए भी आज भूमिहीन और भूखे पेट सोने वाले गरीबों को दी जाने वाली सरकारी योजनाओं का न सिर्फ लाभ ले रहा है, बल्कि उन्हें जरूरतमंद तक पहुंचने भी नहीं दे रहा।  
कहने का मतलब ये है कि भारतीय लोकतांत्रिक सिस्टम में सिस्टम उसी का है, जो सिस्टम के करीब है या उससे जुड़े लोगों की चमचागिरी करता है। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति छोड़िए, आप अपने आस-पास नजर दौड़ाइए और बताइए कि आपकी जाति के मुखिया, सरपंच, विधायक या सांसद बन जाने से आपको कितना फायदा हुआ। सिवाय मूंछों पर ताव देते हुए आपके ये परिचय देने के कि आपका भाई-भतीजा मुखिया, सरपंच, विधायक या सांसद है। इज्जत का थोथा गाल बजाना अन्न विहिन थाली-पतीली की खनक की आवाज को कम नहीं करता। जिस भावी दलित राष्ट्रपति के नाम सुनकर तमाम दलित लोग कुलांचे मार रहे हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि ये दलित उनके गांव उनके शहर के सबसे धनाढ्य साहूकार और जमींदार से लाख गुना बेहतर जिंदगी जीता है। चप्पल विहीन पैरों में बेवाई लिए जिस गरीब के कानों में खरीदे हुए भोंपुओं के जरिए ये आवाज भरी जा रही है कि सरकार उनकी हमदर्द है और उनकी जाति के आदमी को देश के सबसे बड़े पद पर बैठाने वाली है, उस गरीब को पता होना चाहिए कि उसकी जाति का ये आदमी उनके सपनों के 'धनिक' से लाख गुना ज्यादा धनिक है और इसके खाली पैर खाली जमीन पर नहीं कालीन पर उतरते हैं। ये दलित, मुस्लिम, महिला सियासत की शब्दावली के वे शब्द हैं, जिनसे सरकारें अपनी बेहयाई और बेवफाई के कवच-कुंडल के लिए इस्तेमाल करती हैं। बने थे एक और दलित राष्ट्रपति लेकिन उससे दलितों को क्या फायदा हुआ, ये कि उनके कार्यकाल में दलित उत्पीड़न के मामले बढ़ते हुए 1,40,138 तक पहुंच गए थे। इनका भी राष्ट्रपति बनना सुनिश्चित है, लेकिन ये सोचना हास्यास्पद है कि एक दलित के राष्ट्रपति बन जाने से दलितों के दिन बहुरेंगे। कोविंद जी को उनकी जातिगत पहचान से इतर एक राजनेता और एक अच्छे इंसान के रूप में प्रचारित कर रायसीना की पहाड़ियों  का सरताज बनाया जाता, तो शायद ज्यादा सही था, क्योंकि इससे पहले तो मैं भी नहीं जानता था कि वे दलित हैं, और जानता भी कैसे उन्होंने तो उस समय भी मुंह नहीं खोला था जब ऊना में निर्दोष दलितों की चमड़ी उधेड़ दी गई थी... खैर, खुश रहने को गालिब ख्याल अच्छा है, वैसे भी हम हैप्पीनेस इंडेक्स में 'पाकिस्तान' से पीछे हैं...

गुरुवार, 1 जून 2017

इतना भी 'खत्तम' नहीं है बिहार

पिछले 24 से 29 मई तक मास्टर्स सेकेंड सेमेस्टर की परीक्षा थी। लोधी रोड के सेंट जॉन कान्वेंट में जहां हमारा एग्जाम सेंटर था उसी में किसी और कॉलेज का भी सेंटर था। एक दिन एग्जाम देते हुए पीछे बैठे एक भाई साहब ने यूआरएल का फुलफॉर्म पूछा, मैंने बता दिया। एग्जाम दे के निकला और अपनी बाइक की ओर बढ़ा, तो देखा वही भाई साहब बाइक पे बैठकर बीड़ी का धुआं उड़ा रहे हैं। मैं बोला भैया उतरेंगे, बाइक ले जाना है, तो उनका जवाब था- सब्र रख भाई, इत्ती धूप में कित्थे जाना। मुझे जल्दी निकलना था इसलिए उनके इत्थे कित्थे को इग्नोर मारते हुए निकल गया। अगले दिन एग्जाम देने जाते हुए जवाहरलाल नेहरू मेट्रो स्टेशन के सामने वही भाई साहब हाथ हिलाते दिख गए। सेंटर पर पहुंचते पहुंचते उन्होंने अपनी सियासी बाहुबल वाली हैसियत और शैक्षिक औकात की पूरी रामकहानी सुना दी। उस दिन तो मुझे लगा था कि उन्हें केवल यूआरएल का फुलफॉर्म नहीं पता होगा लेकिन वे तो प्रौडीकल साइंस और संगीत वाले बिहार टॉपर्स से बड़े खिलाड़ी निकले। बीसीए की परीक्षा दे रहे भाई साहब को बीसीए का फुलफॉर्म भी पता नहीं था। मैंने पूछा लिखते क्या हैं कॉपी में, तो जवाब था, मेरे ताऊ का साला विधायक है, कौन फेल करेगा मैंनू। अपनी शेखी बघारते हुए ये भी बता दिया कि 6 महीने पहले ही जेल से निकले हैं, वो भी लड़की छेड़ने के जुर्म में गए थे, वो भी 24 घण्टे में बेल मिल गई। गौरतलब है कि भाई साहब पंजाब के पटियाला के रहने वाले थे।
2013 में दिल्ली में ग्रेजुएशन में एडमिशन हुआ। क्लास के कुछ ही दिन बीते थे, सर ने एक दिन ऐसे ही क, ख, ग, घ सुनाने को कहा। 20-25 बच्चों में से केवल 3 को पता था। ये छोड़िए, आजकल बड़े शहरों के बच्चों के लिए हिंदी कठिन हो गई है। दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता, बैंगलोर कहीं के राह चलते 10 कॉलेजिया बच्चों से पास्ट इम्परफेक्ट का सेंटेंस स्ट्रक्चर पूछिए, देखिए कितनों को आता है। ये भी छोड़िए, शाम के समय दिल्ली के सेंट्रल पार्क की तरफ जाइए, वहां आने वाले 10 युवक-युवतियों से 19 का पहाड़ा पूछिए, देखिए कितनों को आता है। ये सब छोड़िए, ऐसे ही लोगों से लोकसभा अध्यक्ष का नाम पूछिए... और हां, जवाब बताने वाले के राज्य का नाम भी लिखते जाइए। मैं दावे के साथ कह सकता हूं, दिल्ली आकर पढ़ने वाला एक एवरेज बिहारी इन सबके जवाब में बाकियों को पीछे छोड़ देगा। मैं मानता हूं कि बिहार में शिक्षा का स्तर बहुत गिरा है। इसके लिए आप सरकार को गरियाने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन एक दो निकम्मे लोगों के कारण, भ्रष्ट अधिकारियों के कारण पूरे बिहार की प्रतिभा पर तो प्रश्न चिन्ह मत लगाइए। 60-70 प्रतिशत बिहारी हिस्सेदारी वाला मीडिया जिस तरह से चटकारे ले लेकर टीवी स्क्रीन पर पूरे बिहार और बिहारवासियों के अनपढ़ गंवार होने का रेखाचित्र बना रहा है, उसे चाहिए कि अन्य राज्यों के बोर्ड रिजल्ट का भी इसी तरह से पोस्टमार्टम करे। खुद को मल्लिका-ए-न्यूज़ समझने वाली एंकर मोहतरमा को चाहिए कि वे पंजाब, एमपी, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र जैसे राज्यों के स्कूलों में माइक और कैमरा लेकर जाएं और बच्चों के साथ-साथ शिक्षकों का भी टेस्ट लें। सोशल मीडिया पर अपने पोस्ट से बिहार को 'खत्तम' बताने वाले लोगों को ये भी बताना चाहिए कि झारखंड के 66 स्कूलों के सारे बच्चे बोर्ड एग्जाम में फेल हो गए हैं। सिर्फ बिहार के रिजल्ट से भारतीय शिक्षा जगत का चेहरा देखने वाले इन देश के कर्णधारों को चाहिए कि वे गूगल से हरियाणा के बोर्ड एग्जाम में चीटिंग की वो तस्वीर निकालकर फेसबुक पर अपलोड करें, जिसमे बाकायदा सीढ़ी लगाकर चीटिंग कराई जा रही थी। अरे भाइयों, फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ जरूरी है, प्रशासन की कुंभकर्णी नींद तोड़नी चाहिए, सुशासन का नकाब उतारना भी जरूरी है, लेकिन एक घुन के साथ पूरे गेंहू को पीसना कहां का न्याय है...

बुधवार, 10 मई 2017

एक शायर जो हमारी आवाज़ में अमर है...

'पेड़ को काटने वालों को ये मालूम तो था,
जिस्म जल जाएंगे जब सर पे न साया होगा…’

वर्तमान समय के सबसे ज्वलंत मुद्दे को बहुत पहले शायरी में समेट कर जिस शायर ने समाज को सबक सिखाने का काम किया था उसकी मुहब्बत की पंक्तियां आज भी राह चलते लोगों को गुनगुनाते हुए सुनी जा सकती है... सामने वाले के चेहरे की बनावटी हंसी को देखकर आज भी अनायास ही यह गीत होठों पर आ जाता है कि
'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो...'

मिले या बिछड़े हुए, बिछड़ते बिछड़ते मिले हुए या मिलते मिलते बिछड़ चुके किसी हमसफ़र की याद इस 20वी सदी में भी 19वी सदी के इस गीत को ही अपना अपना गंतव्य बनाती है कि,
'चलते-चलते यूं ही कोई मिल गया था,
सरे राह चलते-चलते...
वहीं थम के रह गई है, मेरी रात ढलते-ढलते...'

आज आजादी की पहली जंग की सालगिरह है...जी हां, आज ही के दिन 1857 में फिरंगियों से भारत की आजादी की आवाज बुलंद हुई थी, जिसकी परिणति ने हमें स्वतंत्रता की आबो हवा में सांस लेने की सौगात दी. लेकिन जिन कुर्बानियों की बदौलत हमने स्वतंत्रता पाई उनके लिए नतमस्तक कर देता है उसी गीतकार का यह गीतः 
'कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों...’

जिस लिखनी से मातृभूमि के दीवानों का देशवासियों के लिए यह पैग़ाम निकला उसी लेखनी से उन दीवानों के दिल की आवाज भी निकली है, जिनकी सार्थकता को आज भी लोग जीते हैंः 
'कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों हैं?
वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों हैं?
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों हैं?
यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों हैं?'

शायरी को दीवानों के दिल से निकला प्रश्न बनाने वाले इस शायर की इन पंक्तियों से भी आप शायद ही अनभिज्ञ होंगे कि,
'झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं...'

प्रवास हर समय में समाज की एक पीड़ा रही है और शायर, कवि, गीतकार की तत्कालीन समय में सार्थकता यही है कि वह उस समय के दुःखों, तकलीफों को आवाज दे. दूर रहकर अपनी जमीन को याद करने वालों की ख्वाहिश ये पंक्तियां बखूबी समेटे हुए हैं कि,
'वो कभी धूप कभी छांव लगे,
मुझे क्या-क्या न मेरा गांव लगे,
किसी पीपल के तले जा बैठे
अब भी अपना जो कोई दांव लगे'

वक्त के हंसी सितम से खुद को और 'उनको' बदलने के भाव को बयां करने वाले उस महान शायर को अब तक आप पहचान ही गए होंगे, फिर भी मैं बता देता हूं. समाज, सियासत और मोहब्बत, तीनों को अपनी लेखनी से बयां करने वाले मशहूर शायर 'कैफ़ी आज़मी' की आज पुण्यतिथि है. उसी कैफ़ी आज़मी की, जिन्होंने हिंदी सीने जगत को 'शबाना आज़मी' जैसी अदाकारा दी और जो अपनी ही इन पंक्तियों को चरितार्थ कर गए कि
'इंसां की ख्वाहिशों की कोई इन्तहां नहीं
दो गज़ ज़मीन चाहिए, दो गज़ कफ़न के बाद'
आज ही के दिन यानी 10 मई को आज से 7 साल पहले यह मशहूर शायर, कवि, और गीतकार यह गुनगुनाते हुए हमसे रुखसत हो गया कि,
'ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं...'
लेकिन अब भी...
'जरा-सी आहट होती है तो दिल सोचता है
कहीं ये वो तो नहीं, कहीं ये वो तो नहीं...'

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

कश्मीर को बुखार नहीं जख्म की दवा चाहिए

किसी जख्म के कारण अगर बुखार हो जाता है, तो डॉक्टर बुखार की बजाय जख्म ठीक करने की दवा देता है। जख्म ठीक होने के बाद बुखार खुद-ब-खुद ठीक हो जाता है। अफसोस कि दिल्ली में रायसीना की पहाड़ियों पर बैठने वाले हर किसी ने कश्मीर को हमेशा से डायरेक्ट बुखार की दवा दी है। किसी ने जख्मों को पूरी तरह से ठीक करने की कोशिश नहीं की। एक ने की थी, और ईमानदार कोशिश की थी, यही कारण भी है कि आज कश्मीरी भले ही दिल्ली को गाली देते हैं, लेकिन उनके घरों में अटल जी की तस्वीरें देखी जा सकती हैं।
दिल्ली की सल्तनत पर जब मोदी काबिज हुए और उन्होंने इंसानियत-जम्हूरियत-कश्मीरियत की बात कह कर कश्मीर के मामले में अटल जी की विरासत आगे बढ़ाने की बात कही, तब कश्मीरियों को भी लगा था कि अब उन्हें संगीनों के साए से आजादी मिलेगी और वे भी खुली हवा में सांस लेने वाले आम हिंदुस्तानी की तरह महसूस कर पाएंगे। लेकिन जब मोदी जी भी बम-बन्दूकों और जोर-जबरदस्ती से कश्मीर सुलझाने की नीति पर आगे बढ़े, तो कश्मीर को लेकर मोदी नीति अटल नीति से कोसों दूर हो गई। कश्मीर को लेकर मोदी नीति कुछ ऐसी ही है, जैसे कोई डॉक्टर जख्मों को कुरेद कुरेद कर ताजा बनाए रखता है और मरीज को बुखार की दवा देते रहता है। दिल्ली को अब समझना होगा कि कश्मीर का जख्म अब दर्द की उस सीमा को पार कर चुका है, जिसे और कुरेद कर 'सबक' सिखाया जा सके।
जीप की बोनट पर बंधे कश्मीरी युवा वाली तस्वीर में भले ही आपको कश्मीर में भारतीय सेना की विजय नीति नजर आए, लेकिन इन सब रणनीतियों से भारत हर दिन कश्मीर में हार रहा है। आप अगर कहते हैं कि भारतीय सेना कश्मीर में मजबूर है, तो मैं ये नहीं मान सकता। सेना वहां ताकतवर है लेकिन हमारी रणनीति गलत है। हमारी सरकार के फैसलों के कारण वीर सैनिक वहां आए दिन शहीद हो रहे हैं। हमारे गांवों में भी ये घटना आम है कि पुलिस कहीं छपेमारी करने या किसी की धर-पकड़ करने जाती है, तो कई बार उन्हें स्थानीय लोगों के विरोध का सामना करना पड़ता है। कई बार पुलिस वालों पर गांव वाले हमले भी करते हैं, पुलिस वाले घायल भी हो जाते हैं। लेकिन वहां पुलिस की हिम्मत नहीं होती कि दहशत फैलाने के लिए वो अगले दिन किसी को अपने जीप की बोनट पर बांध कर गांव में घूमा सके। लेकिन पुलिस कश्मीर में ऐसा कर सकती है, फिर कैसे आप ये आशा करते हैं कि कश्मीरी युवा टूरिज्म को चुनेंगे। आप यहां कह सकते हैं कि कश्मीर बिहार नहीं है, लेकिन कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा तो कहते हैं न, तो फिर व्यवहार रूप में इसे क्यों नहीं उतारते।
मेरा मानना है कि दबाव की रणनीति से कश्मीरी युवाओं में भारत के प्रति नफरत और बढ़ता जा रहा है। मैं कतई ये नहीं कहता कि पत्थर चलाने वालों को बख्श दिया जाय, उन्हें कठोर से कठोर सजा दी जाय। लेकिन साथ ही उन कारणों की पड़ताल कर उनके समाधान की कोशिशें भी जारी रहे, जो उन्हें हाथों में पत्थर उठाने पर मजबूर कर रहे हैं। ईवीएम ले जाते सैनिकों को मारने वालों को सजा में किसी भी तरह की रियायत नहीं होनी चाहिए, लेकिन साथ ही उन्हें उन जैसा बनाने की कोशिश की जाय, जो उसी वीडियो में सैनिकों को वहां से सुरक्षित निकालते नजर आ रहे हैं।
आपको इसके पीछे की रणनीति समझनी होगी कि एक लंबी चुप्पी के बाद, चुनाव के दौरान ही अब्दुल्ला बाप बेटे ने पत्थरबाजों के समर्थन में बयान क्यों दिया। उन्होंने चुनावी फायदे के लिए ऐसा बयान दिया, ताकि पत्थर चलाने वाले भी उनके पक्ष में वोट कर सकें। गौर करने वाली बात है कि जिसे पुलिस जीप की बोनट पर बांधा गया, वो भी वोट देकर ही आ रहा था।
मेरा मानना है कि अजित डोभाल एक सफल सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दे सकते हैं, पड़ोसी देश से सामरिक संबंधों पर रणनीति बना सकते हैं, लेकिन उनसे यह आशा रखना कि वे भारत के भाल कश्मीर को इस लोकतंत्र का मणि बना सकते हैं, ये मूर्खता है। क्योंकि अब पत्थर चलाने वालों पर पैलेट की बौछार करके कश्मीर नहीं सुलझाया जा सकता।