शनिवार, 21 अप्रैल 2018

सरकार ने अपना काम कर दिया अब समाज की बारी है

निर्भया कांड के बाद, बलात्कार और यौन शोषण से सम्बंधित कानून को कड़ा बनाने का सुझाव देने के लिए तत्कालीन सरकार द्वारा गठित कमिटी के अध्यक्ष जस्टिस जेएस वर्मा ने 23 जनवरी 2013 को अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए कहा था कि 'ऐसे अपराध कानून की कमी की वजह से नहीं, बल्कि सुशासन की कमी के कारण होते हैं।' अगर हम 2013 तक और उसके बाद के वर्षों में हुए बलात्कार की घटनाओं की तुलना करें तो जस्टिस वर्मा की बात सही लगती है। 2013 के पहले पॉक्सो एक्ट नहीं था। 2012 में देशभर में 8886 और 2013 में 8511 बलात्कार की घटनाएं सामने आईं। लेकिन 2013 में पॉक्सो बनने के बाद से हम देखें तो 2014, 15 और 16 में क्रमशः 36735, 34651 और 38847 महिलाएं बलात्कार की शिकार हुईं। बलात्कार के मामले में अंतिम फांसी 2004 में धनंजय चटर्जी को हुई थी, उस समय पॉक्सो नहीं था, लेकिन कानून ने अपना काम किया। कुछ सकारात्मक संशोधनों को छोड़ दें तो कई बार संविधान में बदलाव की जरूरत ही नहीं पड़ती। नए कानून या नियम की जरूरत इसलिए पड़ती है, क्योंकि पुराने वाले को कमजोर कर दिया जाता है, अगर पुराने कानूनों का सख्ती से पालन हो, तो नए की जरूरत ही न पड़े और ऐसा आज से नहीं हो रहा है, वर्षों से राजनीतिक दल और सियासदान अपने लिए और अपनों के लिए कानून को तोड़ते-मोड़ते रहे हैं। उन्नाव और कठुआ में क्या हुआ और हो रहा है, यह तो इसकी बानगी है ही इससे पहले भी ऐसे बहुत से मामले सामने आए हैं। 1996 के सूर्यनेल्ली बलात्कार मामले की पीड़िता आज भी उस दर्द और पीड़ा के साथ जी रही हैं। यह घटना थी, 16 बरस की स्कूली छात्रा को अगवा कर 40 दिनों तक 37 लोगों द्वारा बलात्कार करने की। इसमें कांग्रेस नेता पीजे कुरियन का नाम उछला और उसके बाद सिवाय राजनीति के कुछ नहीं हुआ। घटना के 9 साल बाद केरल हाईकोर्ट ने मुख्य आरोपी के अलावा सभी को बरी कर दिया। उसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट गया और कुछ को सजा हुई। 1996 में ही दिल्ली में लौ की पढ़ाई कर रही प्रियदर्शिनी मट्टू की उसके एक साथी ने बलात्कार के बाद हत्या कर दी। लड़का जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन आईजी का बेटा था। बाप के पद और पैरवी की ताकत बेटे के अपराध पर भारी पड़ी और विडम्बना देखिए कि जब यह केस हाईकोर्ट पहुंचा, तब तक वो आरोपी लड़का उसी कोर्ट में वकालत कर रहा था। भंवरी देवी बलात्कार मामले के बारे में कौन नहीं जानता। उसके आरोपी तो न नेता थे और न ही पुलिस के बड़े अधिकारी लेकिन उनकी दबंगई ने इस मामले पर सुनवाई कर रहे ट्रायल कोर्ट के पांच जजों का तबादला करा दिया था।
ऐसे उदाहरण इतने हैं कि पूरा ग्रन्थ लिखा जा सकता है, लेकिन सवाल यह है कि यहां सुशासन का राज क्यों नहीं देखने को मिला? प्रधानमंत्री जी ने लंदन में इस मामले पर कहा कि 'बलात्कार तो बलात्कार होता है, और उसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए', एकदम सही बात है, नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन किया तो जा रहा है, ऐसा नहीं किया गया होता तो उन्नाव मामले में आरोपी की गिरफ्तारी में 7 महीने का समय नहीं लगता और ऐसा नहीं किया गया होता तो कठुआ मामले के आरोपियों के पक्ष में तिरंगा यात्रा नहीं निकलती, वे दोषी सिद्ध होते हैं या बाइज्जत बरी ये अलग मुद्दा है, अभी बात सुशासन की है... और जब बात सुशासन की चलती है, तो चर्चा यह भी होती है कि कौन कितना पाक-साफ है। एडीआर का डाटा है कि वर्तमान में हमारे 48 सांसद-विधायक यौन उत्पीड़न के आरोपी हैं और अपने 12 सांसदों-विधायकों के साथ भाजपा इनमें शीर्ष पर है। वही भाजपा जिसके सियासी माई-बाप, हमारे प्रधानमंत्री जी ने लंदन में कहा कि 'जो व्यक्ति ये अपराध कर रहा है, वह भी किसी का बेटा है।' लेकिन अफ़सोस कि ऐसे बिगड़ैल बेटे हर दलों में हैं और इन्हें सुधारने के बजाय हमारी पार्टियां इन्हें चारित्रिक प्रमाण पत्र दे देती हैं। ऐसा भी नहीं है कि यह सिलसिला थम गया, तमिलनाडु के महामहिम राज्यपाल ने सवाल पूछने वाली एक महिला पत्रकार का गाल छुआ, हालांकि उन्होंने बाद में स्पष्ट किया कि उन्होंने पोती समझकर ऐसा किया था, बात आई-गई हो गई, लेकिन राज्यपाल जी के बचाव में उतरे एक वरीय भाजपा नेता ने फेसबुक पोस्ट में यह लिख दिया कि 'बड़े लोगों के साथ सोए बिना कोई लड़की रिपोर्टर या न्यूज रीडर नहीं बन सकती।'
इन सवालों का तीर भाजपा पर ज्यादातर इसलिए है क्योंकि भाजपा के पास अभी सबसे ज्यादा सांसद-विधायक हैं और भाजपा वाले ही हमारे प्रधानमंत्री जी ने पिछले दिनों कहा कि इन मुद्दों पर सियासत नहीं होनी चाहिए। खैर, बड़ी बात यह है कि हमारी सरकार ने सराहनीय कदम उठाते हुए पॉक्सो में संशोधन कर दिया है और ऐसा समय की मांग थी। लेकिन मुझे कई बार यह बहुत छोटी बात लगती है, ऐसा क्यों है इसे मैंने ऊपर में उदाहरण देकर समझा दिया है। बड़ी बात यह है कि कानून तो बन गया लेकिन सुशासन की संभावना पहले जैसी ही मद्धम है। इसलिए अब समाज को अपना काम करना है। एक आदमी जो 8 महीने और एक साल की बच्ची की मासूमियत में भी हवस का सामान ढूंढ सकता है, उसे उस समय फांसी की सजा वाले अंजाम का ख्याल भी नहीं आएगा। जरूरत इस बात की है कि समाज में संवेदना और समझ का संचार किया जाय। इंसान को इंसान के दुख-दर्द को समझने की संस्कृति पैदा की जाय। पीढ़ी-दर-पीढ़ी रिश्तों की मर्यादा और आत्मीयता का स्थानांतरण हो, तभी ऐसी घटनाओं पर लगाम लग सकती है, वरना कड़े से कड़े कानून बनते रहेंगे और ऐसे अपराध किसी की जिंदगी बर्बाद कर उसे आंकड़ों में समेटते रहेंगे...

गुरुवार, 15 मार्च 2018

तारीखों के 'राही'...

'हुआ उजाला तो हम उनके नाम भूल गए,
जो बुझ गए हैं चराग़ों के लौ बढ़ाते हुए...'

किसी कवि की ये पंक्तियां हमें इसे लेकर आगाह करती हैं कि हमारी इस अक्षुण संस्कृति के अथाह समंदर में एक बूंद का योगदान देने वालों को भी हम उसी शिद्दत से याद करें, जैसे बड़ी शख्सियतों या अपने स्वार्थ से जुड़े लोगों को याद करते हैं... और यह सिर्फ किसी शख्सियत की बात नहीं है, यह 'तारीख' की बात भी है, जो अपने आप में इतिहास का एक बड़ा कालखण्ड समेटे हुए हैं। यूं तो कहा जाता है कि इतिहास एक दिन से नहीं बनता, लेकिन इस इतिहास में कई ऐसे 'एक दिन' होते हैं, जो खुद में इतिहास होते हैं। आज की तारीख यानि 15 मार्च भी कुछ वैसी ही है। 
आज का दिन, वेदव्यास के महाकाव्य को हमारी समझ की भाषा में रूपांतरित कर महाभारत के रूप में चलचित्र के माध्यम से हम तक पहुंचाने वाले उस राही मासूम रज़ा से जुड़ा है, जिन्होंने 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' को हर गृहस्त आश्रम के लिए सूक्ति बना दिया और जिनकी कलम से निकले ये शब्द अपने घर, अपने देश के लिए तड़पते हर प्रवासी के पीड़ा की अभिव्यक्ति बन गए कि 'हम तो हैं परदेश में, देश में निकला होगा चांद...' राही मासूम रज़ा अदब की दुनिया के उन चंद हस्ताक्षरों में से एक थे, जिन्होंने साहित्य में भाषा की सीमारेखा को समाप्त किया। शेर-ओ-शायरी और ग़ज़लों की दुनिया के तो वे बेताज बादशाह हैं ही, हिंदी साहित्य को भी उन्होंने अनमोल कृतियां दी है। हिंदी सिनेमा को तो नाज़ होना चाहिए कि उसके साथ राही मासूम रजा का नाम जुड़ा। कई अनाड़ी हीरे को पत्थर समझ लेते हैं। मुहब्बत को बदकिरदारी का नाम देकर अलीगढ़ के उर्दू विभाग ने राही को निकाल दिया था। लेकिन कहते हैं न कि जो जगह दिल में बसी हो, उसकी यादें पीछा नहीं छोड़तीं, राही ने अलीगढ़ को याद करते हुए अपने एक दोस्त को एक नज्म लिखी थी, जिसके दो शेर हैं:
'...ऐ सबा तू तो उधर से गुजरती होगी
तू ही बता अब मेरे पैरों के निशां कैसे हैं,
मैं तो पत्थर था फेंक दिया, ठीक किया
अब उस शहर में लोगों के शीशे के मकां कैसे हैं...'
गौरतलब यह भी है कि महाभारत धारावाहिक से मिली प्रसिद्धि के बाद अलीगढ़ के उसी उर्दू विभाग ने राही को इज्जत के साथ आमंत्रित कर उनका सम्मान किया था। नाम और टाइटल में सियासत का सामान ढूंढने वाली वर्तमान राजनीति को उस राही मासूम रज़ा के बारे में पता होना चाहिए, जिसके पास वरिष्ठ भाजपा नेता आडवाणी जनसंघ के नेता दीन दयाल उपाध्याय के ऊपर बनने वाली डॉक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लिखवाने गए थे, और आडवाणी के यह पूछने पर कि मेहनताना क्या लेंगे? राही का जवाब था- 'दिल्ली में आपके साथ एक वक्त का खाना खा लूंगा...' 65 साल कोई बड़ी उम्र नहीं होती जाने की, लेकिन कहते हैं न कि ईश्वर को भी अच्छे लोगों की जरूरत होती है, आज ही के दिन 15 मार्च 1992 को जन्नत की सफ़र पर निकलते हुए राही अपनी पंक्तियों को सार्थक कर गए कि,
'इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई, 
हम न सोए रात थककर सो गई...'
और इत्तेफाक देखिए कि 'थककर सोने' के अहसास वाले अपने इस शेर को चरितार्थ कर जिस दिन राही इहलोक से रवाना हुए उसी दिन दुनिया #WorldSleepyDay मनाती है... 15 मार्च उस दीन दयाल उपाध्याय के सपनों से भी जुड़ा है, जिनपर बनने वाली डॉक्यूमेंट्री की स्क्रिप्ट राही मासूम रजा ने लिखी थी। 1996 में 14 दिन की सरकार गिरने के बाद अटल जी के नेतृत्व में आज ही के दिन 15 मार्च 1998 को केंद्र में दोबारा भाजपा की सरकार बनी थी। ये अलग बात है कि आज भारी बहुमत से केंद्र में बैठने के साथ-साथ 22 राज्यों तक पहुंचने वाली भारतीय जनता पार्टी अपनी विरासत को बिसारती जा रही है। खैर, सरकार या सियासत से इतनी उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए। शहादत को भी सियासत का समान बना लेनी वाली वर्तमान राजनीतिक बिरादरी में से कौन ऐसा है, जिसे याद हो कि कारगिल में तिरंगा फहराने के बाद 26/11 को मुम्बई बचाते हुए शहीद होने वाले मेजर संदीप उन्नीकृष्णन आज ही के दिन 15 मार्च 1977 को जन्मे थे। लेकिन देश की एक बड़ी राजनीतिक बिरादरी को यह तो याद ही होना चाहिए कि जिस दबे-कुचले और पीड़ित-शोषित के नाम पर उनकी सियासी दुकान चलती है, उन्हें वास्तव में सार्थक रूप से सियासत के लिए मुद्दा बनाने वाले कांशीराम भी आज ही के दिन 15 मार्च 1934 को जन्मे थे। बॉल और बल्ले में खेलों की दुनिया को समेटती जा रही वर्तमान पीढ़ी को यह तो जरूर पता होना चाहिए कि सबसे पहले आज ही के दिन 15 मार्च 1975 को हम अपने राष्ट्रीय खेल हॉकी में विश्व विजेता बने थे। आज़ादी के बाद अंग्रेज़ों द्वारा घायल छोड़ी गई इस सोने की चिड़िया को आज ही के दिन 15 मार्च 1950 को योजना आयोग के रूप में विकास की दवा का फॉर्मूला मिला था। तो मूल बात यह है कि हर दिन खास होता है, ये अलग बात है कि उनमें से कुछ उस अहसास से भी जुड़े होते हैं, जिनके लिए राही मासूम रजा ने लिखा कि
'हां उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें
हां वही लोग जो अक्सर हमें याद आए हैं...'

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

गुंडातंत्र न बन जाए हमारा गणतंत्र

'भले ही हमारा देश 15 अगस्त को स्वतंत्र हुआ, लेकिन हमें असली आज़ादी मिली थी आज के दिन, यानि 26 जनवरी को। आज ही के दिन हमारा संविधान लागू हुआ और हमें भारतीय होने का दर्जा हासिल हुआ...' स्कूली दिनों में आज के दिन का हमारा भाषण ऐसा ही होता था। तब इस भाषण को रटना पड़ता था, तब भले ही समझ उतनी विकसित नहीं थी, लेकिन आस्ता भरपूर थी। दिल्ली आने के बाद याद नहीं कि कभी मैं बिना खाए या पूजा करके झंडा फहराने गया हूं, लेकिन स्कूली दिनों में यह हमारे लिए सामाजिक नहीं व्यक्तिगत उत्सव हुआ करता था, जिसमे भगवान भी शामिल थे, गांधी-नेहरू-भगत-सुभाष भी और सेना के वीर सिपाही भी। तब हम मन्दिर में जल चढ़ाने के बाद झंडा फहराने जाया करते थे वो भी बिना अन्न ग्रहण किए, क्योंकि वो भी एक तरह से पूजा के समान था। तब का बालमन भी उस दिन की पूजा में खुद की नहीं, देश की हिफाजत की दुआ करता था। 
आज ऐसे ही सोच रहा था कि क्या सभी का बचपन ऐसा ही बीता होगा, खासकर उनका जो आज थोथी इज्जत के नाम पर शासन की धज्जियां उड़ा रहे हैं और सियासी शह जिनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा। मुझे नहीं लगता कि उन्होंने 'स्व' से आगे पढ़कर 'पर' के बारे में कभी सोचा होगा, देश के लिए दुआ करना तो दूर की बात है। क्योंकि जो देश की संपदा को विनष्ट करना अपनी जीत समझे, जिसके लिए लोगों में भय का माहौल पैदा करना उद्देश्य की प्राप्ति हो, जो देश की सर्वोच्च संस्था न्यायपालिका को अपने जूते की नोक पर रखे और जो अपनी बात मनवाने के लिए बच्चों से भरी बस पर भी पत्थर फेंकने से गुरेज न करे, वो खुद के बारे में तो सोच सकता है, लेकिन देश के बारे में नहीं। देश एक व्यक्ति, एक संस्था या एक जातिगत समूह से नहीं बनता, खासकर भारत जैसे देश की पहचान तो वैसी नहीं है। विविधता में एकता हमारी पहचान रही है, पर अफसोस कि एकता के नाम पर एकरूपता लादी जा रही है। ऐसा तो गणतंत्र नहीं था हमारा। न सिर्फ शासन बल्कि सामाजिकता के स्तर पर भी हमें आत्ममंथन की जरूरत है। आज तो पढ़े लिखे बुद्धिजीवियों को भी करणी सेना के करतूत वाजिब दिख रहे हैं। जिन्हें अपने दादा-दादी से बैठकर बात करने की फुर्सत नहीं, जो अपने परदादा-परदादी का नाम तक नहीं जानते, वे भी आज पद्मावती के बहाने विरासत बचाने की बात कर रहे हैं। आज जब हमारा गणतंत्र 69वे साल में प्रवेश कर गया, हमें सोचना चाहिए कि इतने सालों में हमने क्या पाया और जो पाया उसे अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए क्या प्रयत्न कर रहे हैं। केवल राजस्थान की ही बात करें, तो किसी भी क्षेत्र के किसी अखबार का कोई संस्करण ऐसा नहीं होता है, जिसमे किसी भी दिन बलात्कार या महिलाओं के खिलाफ अपराध की कोई घटना नहीं हो, लेकिन आजतक किसी भी संगठन ने उसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई। जिन राजूपत राजघरानों की राजकुमारियां आज विदेशों की पाश्चात्य संस्कृति में सराबोर हो रही हैं, उन्हें ये चिंता सताने लगी कि सिनेमा के पर्दे पर पद्मावती देवी का किरदार निभा रही अभिनेत्री का पेट क्यों दिख रहा है। दिक्कत यह है कि हम अपने बंधे-बंधाए दायरे से बाहर निकलना नहीं चाहते। 
हमने न सिर्फ बचपन से पढ़ा है, बल्कि देखा भी है कि हमारे आस-पास के लोगों का आचार-विचार, बोल-चाल, रहन-सहन सब भिन्न होता है। मेरे गांव से महज 2 किमी की दूरी पर एक मुस्लिम बहुल गांव है, उनकी भाषा हमारे गांव की भाषा से अलग है, उनका पहनावा और रहन-सहन भी हमसे अलग है। लेकिन न सिर्फ हम सद्भाव वाले पड़ोसी गांवों के हैं, बल्कि उस गांव के बच्चों के साथ मैं हॉस्टल में भी रहा हूं। यह है हमारा वास्तविक गणतंत्र, पर अफसोस कि यह 'है' अब धीरे-धीरे 'था' में बदलता जा रहा है। दुर्भाग्यवश ऐसा कहना पड़ रहा है कि वर्तमान का भारत हमें हमारे वास्तविक भारत से अलग छवि पेश कर रहा है। हम मानते हैं कि हर दौर में अभिव्यक्ति की आजादी का बेजा इस्तेमाल होता रहा है, हर दौर में लोगों की भावनाएं आहत होती रही हैं, हर दौर में गुंडे-मवाली सड़कों पर आते रहे हैं, लेकिन क्या हर दौर में सरकार के इक़बाल पर सवालिया निशान खड़ा होता रहा है? क्या हर दौर में सरकार ने निरीह-निस्पृह होने का दिखावा करते हुए हुड़दंगियों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया है? हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने जब पहली बार कहा था कि 'संविधान हमारे लिए ग्रन्थ है' तब लगा था कि इस सरकार में वैसा कुछ नहीं होगा जैसा 1975 में देश के संविधान के साथ और 1984 में देश के भाईचारे के खिलाफ हुआ था। लेकिन इस गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देशभर से आने वाली खबरों ने हमारे उस विश्वास की चूलें हिला दी हैं कि अब वैसा कुछ नहीं होगा। सप्ताह भी पूरे नहीं हुए जब हमारे प्रधानमंत्री जी ने एक समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा था कि 'मैं चुनावी फायदों को ध्यान में रखकर फैसला नहीं लेता', तो क्या आहत भावना के नाम पर गुंडागर्दी करने का खुला छूट दे देना चुनावी फायदे को ध्यान में रखकर लिया जाने वाला फैसला नहीं है? कौन नहीं जानता कि पद्मावती रिलीज नहीं करने वाले मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और गोवा में किसके आदेश से शासनात्मक पत्ता हिलता है? कांग्रेसी शासन के भ्रष्टाचार से त्रस्त भारतवासियों को सुकून मिलता था मोदी जी के कांग्रेस मुक्त भारत के नारे से, लेकिन अगर कांग्रेस मुक्त भारत का असली ध्येय यही है कि सब जगह मनमाफिक हुक्म चलाया जाए, फिर क्या फायदा इस कांग्रेस मुक्त भारत का? इसी 26 जनवरी से कुछ दिन पहले 2015 में अपनी कुछ लोकतांत्रिक मांगों को लेकर धरने पर बैठे अरविंद केजरीवाल को अराजक की संज्ञा दी दी गई थी, वो भी इन्हीं भाजपाइयों द्वारा, लेकिन देशभर में शासन की छाती पर मूंग दलने वाले मुट्ठी भर हुड़दंगियों के खिलाफ निंदा के दो शब्द बोलना भी हमारी सरकार ने जरूरी नहीं समझा है। हम वैश्विक स्तर पर भारत की पहचान बुलन्द करने की बात करते हैं, लेकिन उन 10 आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्षों को हम किस तरह के भारत से रूबरू कराया रहे हैं, जो अभी नई दिल्ली में हैं। क्या अभी उन तक सिर्फ भारत-आसियान बैठक की खबर ही पहुंचती होगी, क्या वे इंरनेट और टीवी के जरिए नहीं देख रहे होंगे कि मीटिंग हॉल और लाटीयन की दिल्ली के बाहर का भारत अभी किस माहौल में जी रहा है? हमने तो सिंघम फ़िल्म के इस डायलॉग को शासन का चरित्र समझ लिया था कि 'पुलिस चाह दे तो किसी मंदिर के आगे से कोई एक जूता भी नहीं चुरा सकता', तो क्या मैं गलत था...? क्या गुंडातंत्र बनना ही अब इस गणतंत्र की नियति है...?

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

बदलती सत्ता में न बदलने वाले सच

'शहर में करता था जो सांप के काटे का इलाज,
उसके तहखाने से सांपों के ठिकाने निकले...'

अभी 'शकील आजमी' को सुनते हुए, उनकी इन पंक्तियों पर मन ठहर सा गया। वर्तमान सियासी मौजूं पर इस शेर की सार्थकता यह सोचने पर विवश करती है कि जनता के भले के लिए बुरे को बुरा और खराब को खराब कहने वाले सुर अगर पूरी तरह से विपरीत रुख अख्तियार कर लें, तो जनता का क्या होगा?
'रिटेल में एफडीआई' से हमारा पहला परिचय एक ऐसे सांप के बिल के रूप में हुआ था, जिससे विदेशी कारोबारियों के रूप में निकले सांप हमारे खुदरा व्यापारियों को डंस लेते हैं, अफ़सोस कि इसके प्रति हमें आगाह करने वाले रहनुमाओं को आज उसी सांप के बिल में तरक्की का मणि दिख रहा है। रिटेल में एफडीआई के लिए पूरी तरह से भारत के दरवाजे खोलने वाले हमारे प्रधानमंत्री जी, वही मोदी जी हैं, जिन्होंने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा रिटेल में एफडीआई के लिए हिंदुस्तान के दरवाजे आधे खोलने पर उन्हें कहा था कि मनमोहन सिंह की कांग्रेस सरकार 'विदेशियों द्वारा, विदेशियों की और विदेशियों के लिए सरकार' है। उसी 'रिटेल में एफडीआई' वाले सांप से जनता को बचाने वाला रखवाला बनकर सामने आए हमारे वर्तमान वित्त मंत्री जेटली जी ने तब रामलीला मैदान की भरी सभा में खुदरा व्यापारियों की दारुण दशा का मार्मिक चित्रण करते हुए कहा था कि 'अंतिम सांस तक मैं भारत के खुदरा व्यापार को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से दूर रखने के लिए लड़ता रहूंगा।' अफ़सोस कि यहां भी वादों की बलि वेदी पर इरादे बदल गए...
2012-14 के बीच उजागर हुए घोटालों की फेहरिस्त पर फिर से नज़र डालें तो वो इसी रूप में सामने आए कि योजना में हुआ खर्च वाजिब खर्च से ज्यादा था या उसके नाम पर उगाही कर ली गई थी। तत्कालीन विपक्षी पार्टी द्वारा कांग्रेस के कुकृत्यों को उजागर करने की कोशिशों को जनता ने सराहा भी और उसके साथ खड़े भी हुए, नतीज़ा यह निकला कि कांग्रेस को उसके किए की सजा मिली और उन्हें इतिहास की सबसे बड़ी हार से रूबरू होना पड़ा, बदले में हमें ऐसी सरकार मिली, जो आर्थिक और सामाजिक विकास के साथ-साथ भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को जीवंत करने में पूर्णतः सक्षम थी। लेकिन तब पता नहीं था कि यह क्षमता यहां तक पहुंच जाएगी कि एक धार्मिक आयोजन के लिए गीता की एक प्रति की खरीददारी 37,950 रुपए में की जाएगी। जी हां, हरियाणा राज्य में भाजपा की सरकार है और जो मुख्यमंत्री हैं, उन्हें हमारे प्रधानमंत्री जी का वरदहस्त प्राप्त है और उसी मुख्यमंत्री जी वाली सरकार ने पिछले साल आयोजित गीता जयंती महोत्सव में गीता की 10 प्रतियां खरीदने के लिए 3,79,500 रुपए खर्च कर दिए...
हमारे वर्तमान सत्ताधारी तो उस समय सत्ता वाले रहनुमा ही थे, जब 3 साल पहले दिल्ली के जंतर-मंतर पर दिल्ली सरकार के एक कार्यक्रम में राजस्थान के एक किसान ने आत्महत्या कर ली थी। तब हमारे प्रधानमंत्री जी ने अपनी जिम्मेदारियों का पूर्ण निर्वहन करते हुए कई ट्वीट किए थे और किसानों को उनकी दुर्दशा से उबारने के वादे के साथ मरने वाले किसान के दुःख के लिए अंग्रेजी में 'Deeply Shattered' भी लिखा था। एक आत्महत्या कल भी हुई है और यह प्रधानमंत्री जी के लिए 3 साल पहले की दिल्ली वाली किसान आत्महत्या से ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी बोध वाली घटना है, क्योंकि यह उसी पार्टी के शासन वाले राज्य की घटना है, जिसके आलाकमान हमारे प्रधानमंत्री जी हैं। 3 साल पहले दिल्ली में आत्महत्या करने वाला किसान तो राजस्थान का था लेकिन कल जिस कारोबारी ने आत्महत्या की वह उत्तराखंड का ही था और उसने उत्तराखंड में ही आत्महत्या की, वो भी सरकार के एक बड़े कैबिनेट मंत्री के सामने अपनी समस्याओं का रोना रोते हुए। अफ़सोस कि 3 साल पहले वाली दिल्ली की घटना को आम आदमी पार्टी की सियासी संवेदनहीनता बताने वाले दल ने अपनी नीतिगत विफलताओं के कारण अपने सामने एक कारोबारी को जहर खाते और उसे मौत के मुंह में जाता देखकर भी उसे 'नौटंकी' करार दिया...
एक बहुमत वाली सरकार के शासन में अराजक तत्वों का बेखौफ मन जब एक बड़े क्षेत्र को मुर्दाघाटी में बदल दे और पीड़ित लोगों की देखरेख करने के बजाय उन्हें कड़ाके की सर्द रात में तड़पता छोड़कर जिम्मेदार लोग हीटर की गर्मी में सुरा-सुन्दरियों के रास-रंग का आनंद लें, तो इसे 'निहायत ही घटिया और चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाला हरकत' कहा जाना सर्वथा उचित है, तब भी जब वो आयोजन निजी हो। समाजवादी पार्टी के सैफई महोत्सव की गोरखपुर के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ जी द्वारा की गई भर्त्सना में हमने भी अपना सुर मिलाया था, लेकिन तब पता नहीं था कि सत्ता मिलने पर अपने शहर की चांदनी रात को गुलजार करने वाली परम्परा उत्तर प्रदेश में कायम रहेगी, भले ऐसे कृत्य की भर्त्सना करने वालों के हाथ में ही सत्ता क्यों न हो और भले वहां 30 निरीह बच्चों की मौत के जख्म अभी हरे क्यों न हों। आज से शुरू हुए गोरखपुर महोत्सव में जब बॉलीवुड गायक शान अपनी तान छेड़ेंगे, मुख्यमंत्री योगी के प्रमुख सचिव अवनीश अवस्थी की धर्मपत्नी मालिनी अवस्थी जब कजरी और ठुमरी का राग अलापेंगी और अभिनेता रवि किशन जब कमरिया लपालप करेंगे, तब वो मंजर सैफई से बस इसी मामले में अलग होगा कि लोग वहां यादव परिवार के धन को नहीं बल्कि अपने टैक्स के पैसे को पानी में बहता देख रहे होंगे और वहां नेता जी नहीं बल्कि 'नाथ योगी' के नारे लग रहे होंगे... ये वो चंद सच हैं, जो सत्ता बदलने के साथ भी नहीं बदलते और राजनीतिक ताकतें हमें-आपको मंदिर-मस्जिद और हिन्दू-मुस्लिम जैसे मुद्दों में उलझाकर अपनी सियासी स्वार्थसिद्धि का इंतेजाम करती रहती हैं। 

शनिवार, 6 जनवरी 2018

सांप्रदायिकता से लड़ाई भ्रष्टाचार का पाप नहीं धो सकती

अपने जीवन की पहली राजनीतिक रैली में मैंने जो सियासी डायलॉग सुना वो था- 'यही पुलिस गोली चलाएगी।' 2004 के विधानसभा चुनाव प्रचार में सिकटा आए नीतीश कुमार ने बिहार को कुशासन और जंगलराज के जंजाल से निकालकर सुशासन देने के वादे के साथ यह बात कही थी। यह अलग मुद्दा है कि बिहार वर्तमान में भी सुशासन की पहुंच से दूर है। उसी चुनाव प्रचार के दौरान पहली बार जया प्रदा और अमर सिंह को भी देखना सुनना हुआ। दोनों साथ आए थे और अमर सिंह की एक बात जो आजतक मुझे याद है, वो कुछ ऐसी थी- 'आपलोग जोरदार तालियां बजाकर जया जी का स्वागत कीजिए, क्योंकि ये बहुत मुश्किल से यहां आई हैं, इनके पिताजी इन्हें नहीं आने दे रहे थे, वे कह रहे थे कि वो 'लालू का इलाका' है, मैं अपनी बेटी को वहां नहीं जाने दे सकता, लेकिन मैंने उन्हें समझाया कि नहीं, आप जाने दीजिए, इनकी सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है, अगर आज ये बिहार नहीं गईं, तो फिर आगे भी कोई बाहरी लड़की बिहार जाने में डरेगी...' अमर सिंह के इस लच्छेदार भाषण का सार मुझे आज समझ में आता है, लेकिन उस समय मैंने जया प्रदा के लिए ताली नहीं बजाई थी। इसलिए नहीं कि अभिनेत्री या नेत्री के रूप में वे मुझे पसंद नहीं या मुझे अमर सिंह की बात समझ में नहीं आई, बल्कि इसलिए क्योंकि जो लड़की हमारे यहां जबरदस्ती लाई गई हो, उसके सम्मान में ताली क्यों बजाना। जया प्रदा का डर भले सियासी हो, लेकिन बिहार की आबोहवा में उन दिनों 'बेटियों की इज्जत' को लेकर बरती जाने वाली सावधानी महसूस की जा सकती थी।
यह उन्हीं दिनों की बात है, जब हमने अपने सिलेबस की एक किताब 'कथान्तर' में कर्पूरी ठाकुर के साथ लालू प्रसाद यादव की जीवनी पढ़ी थी। लेकिन कथान्तर में जिस जनहितकारी और गरीबों के मसीहा लालू का जिक्र था, वो लालू हमें जमीन पर कहीं नहीं दिखे। उस कथान्तर में मैंने पढ़ा था कि 'मुख्यमंत्री बनने के बाद एक बार लालू जी हेलीकॉप्टर में बैठकर कहीं जा रहे थे, एक खेत के ऊपर से उड़ते हुए उन्होंने देखा कि नीचे कुछ मजदूर 'पनपीआव' (जलपान) खा रहे हैं, लालू जी ने हेलीकॉप्टर नीचे उतरवाया और उनके साथ बैठकर सत्तू प्याज खाए।' लेकिन कथान्तर में इसका जिक्र नहीं था कि लालू जी ने बिहार में किसानों की हालत सुधारने के लिए क्या किया, सत्तू खाने के एवज में उन्होंने उस किसान को ऐसा क्या दिया कि उसका बेटा तंगहाली की किसानी से बाहर आ सके। मुझे उस कथान्तर की सिर्फ एक पंक्ति में लालू प्रसाद यादव की सियासत का ध्येय नज़र आता है, और वो पंक्ति थी- 'लालू के मुख्यमंत्री बनने के बाद जब उनकी मां मरछिया देवी ने पूछा कि ई मुख्यमंत्री का होला, तो लालू ने उन्हें समझाया कि माई रे, हथुआ राज मिल गइल...' 90 के दशक से लेकर अब तक की लालू की सियासत देखें, तो इसका साफ संकेत मिलता है कि उन्होंने बिहार को 'खैरात' ही समझा।
लालू यादव की 15 साल की स्वार्थसिद्धि वाली सियासत ने सिर्फ विकास का गला नहीं घोंटा बल्कि हमारे जैसे लाखों युवकों के सपनों को भी मार डाला।पता नहीं तेज-तेजस्वी उस समय कहां थे और क्या कर रहे थे, लेकिन मैं तब 8वी कक्षा में था, जब अपने सिकटा रेलवे स्टेशन के बुक स्टॉल पर टंगे दैनिक जागरण में गौतम गोस्वामी की मृत्यु की खबर पढ़ी। उन दिनों हम भी ज्यादातर बिहारी बच्चों की तरह गौतम गोस्वामी की राह पर चलकर प्रशासनिक सेवा में जाना चाहते थे, इसलिए गौतम गोस्वामी के बारे में हर संभव ज्यादा से ज्यादा जानने की कोशिश की थी और उस समय हीरो की तरह उभरे पटना के डीएम के बारे में हमारा मन मानने को तैयार नहीं था कि डॉक्टरी का पेशा छोड़कर आईएएस बनने वाला यह अधिकारी घोटाला कर सकता है। पता नहीं सच्चाई क्या थी, लेकिन गोस्वामी के साथ हमारे सपने भी दम तोड़ गए, क्योंकि सिस्टम के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति के कृत्य के लिए उसके मातहत लोगों की सजा हमारे लिए असहनीय थी। हो सकता है उसमे गौतम गोस्वामी की भी भागीदारी रही हो, लेकिन बिना ऊपर वाले की मर्जी के तो वो संभव नहीं हो होता।
आज लालू यादव को साढ़े तीन साल की सजा होने के बाद उनके बेटे तेजस्वी यादव कह रहे हैं कि 'हमें गर्व है अपने पिता पर, जिन संघर्षों के कारण वे जेल में हैं...' मैं मान लेता हूं कि पिछले तीन साल से लालू यादव साम्प्रदायिक ताकतों के साथ संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन चारा घोटाला 2014 का तो है नहीं, जो साम्प्रदायिक ताकतें उन्हें जेल भेज देना चाहती हैं। इससे पहले तीन बार जब लालू जेल गए तब कांग्रेस की सरकार थी। क्या तब भी कांग्रेस इन्हें सांप्रदायिकता से लड़ने की सजा दे रही थी? और संप्रदायिकता से लालू की लड़ाई ने शोषितों-वंचितों को क्या दिया है? लालू शान से कहते हैं कि हमने आडवाणी का रथ रोका, लेकिन आडवाणी का रथ रोकने से उस तबके को क्या मिला, जिसके नाम आज वे जेल से चिट्ठी लिख रहे हैं। अगर उन्होंने अपने 15 साल के शासन में शोषितों-वंचितों का इतना ही ध्यान रखा होता, तो वे भी बिहार में साउथ वाले एनटीआर और अम्मा की तरह पूजे जाते। आज उन्हें चिट्टी लिखवाकर उसका सार्वजनिक वाचन नहीं कराना पड़ता। साम्प्रदायिक ताकतों से लड़ाई जरूरी है, लेकिन उसके नाम पर किसी के भ्रष्टाचार वाले पाप पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। हमारी नज़र में व्यापम घोटाला, सृजन घोटाला, शौचालय घोटाला या भाजपा शासित राज्यों के अन्य घोटाले भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल इसलिए कि इन घोटालों पर आज कोई सवाल नहीं हो रहे, हम चारा घोटाले को सिरे से खारिज नहीं कर सकते। जिस तरह चारा घोटाला मामले में लालू यादव ने एफआईआर दर्ज कराया था, उसी तरह नीतीश कुमार ने भी सृजन मामले में जांच के आदेश दिए हैं। बहुत हद तक संभव है कि तेजस्वी जब मुख्यमंत्री बनें, तब वे सख्ती से जांच कराकर नीतीश को सजा दिलवाएं, क्योंकि आज की राजनीति में कोई अपने कुकृत्यों की सजा खुद तो दिलवा नहीं सकता, न लालू ने दिलवाया न नीतीश दिलवाएंगे...।

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

सेक्युलरिज्म: संविधान से समाज तक...

हमारे यहां एक कहावत कही जाती है कि 'अनपढ़ ठीक, मने कुपढ़ ना ठीक', मतलब कि जो कुछ भी नहीं पढ़ा हो, उसे हम कोई भी बात बेहतर तरीके से बता-समझा सकते हैं, लेकिन जिसकी पढ़ाई में ही खोट हो उसे समझाएं कुछ तो समझेगा कुछ और। हाल के दिनों में ऐसे बहुत से उदाहरण देखने को मिले। जो 2 महीने पहले तक पद्मावती का नाम नहीं जानते थे, वे भी पद्मावती की इज्जत की रक्षा को रण में उतर गए, बिना जाने-समझे कि जो मुद्दा सामने है, उससे पद्मावती की अस्मिता खतरे में है भी या नहीं। कहने का मतलब यह है कि आदमी जिससे परिचित नहीं होता है, या जिसे जाना-समझा नहीं होता है, उसे 'धारणा' के जरिए समझता है, क्योंकि वो असलियत से कोसो दूर होता है। बाकी मामलों में तो इस कुपढ़ता से ज्यादा नुक़सान नहीं होता, लेकिन बात जब संविधान की होती है, तो यह हानिकारक प्रतीत होता है। राह चलते आम लोग या ट्रेन-बस में सफर कर रहे सियासी विशेषज्ञ टाइप दिखने वाले लोग जब संविधान को कोसें तो समझ में आता है, क्योंकि उनका कोसना संविधान की सार्थकता पर सवाल होता है, लेकिन जब केंद्र सरकार का कोई मंत्री ही संविधान बदलने की बात करने लगे, तो इसे क्या कहेंगे? 
मंत्री जी को 'सेक्युलरिज्म' से दिक्कत है।  दरअसल, सेक्युलरिज्म की आड़ में उन्हें दिक्कत एक 'धर्म विशेष' से है और उस दिक्कत की जो बुनियाद है, वो उनकी नजर में यह है कि वो 'धर्म विशेष' भारत विरोधी कार्य करता है, उस 'धर्म विशेष' के लोग दंगों में संलिप्त होते हैं, उस 'धर्म विशेष' के लोग धार्मिक मुद्दे पर विभाजनकारी षड्यंत्र करते हैं। शायद मंत्री जी इसी का हल तलाश रहे हैं, लेकिन उनकी हालत शायद मृग मरीचिका वाली हो गई है, समाधान पास में होते हुए भी वे सार्वजनिक मंचों से अपनी समस्या की 'बोली' लगा रहे हैं। मैंने इसीलिए लिखा है कि मोदी जी को अपने सभी मंत्रियों को संविधान पढ़ाना चाहिए, अगर इस मंत्री जी ने संविधान पढ़ी होती, तो पता होता कि धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास और भाषा आदि के नाम पर सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वालों को सबक सिखाने के लिए संविधान में धारा-153(A) की व्यवस्था है, किसी धर्म विशेष के धार्मिक स्थानों को अपमानित करने के आरोपियों के लिए संविधान ने हमें धारा-295 दिया गया है, दंगों के आरोपियों के लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने धारा-147 की व्यवस्था की है, यहां तक कि किसी की शांति में विध्न-बाधा उत्पन्न करने वालों को सबक सिखाने के लिए भी संविधान में दिए गए धारा-504 के तहत पुलिस मुकदमा दायर करती है। अब सोचने वाली बात यह है कि इतना सब होने के बावजूद मंत्री जी की समस्या का समाधान क्यों नहीं होता, जबकि वे स्वयं कानून बनाने वाले कुनबे में शामिल हैं और कानून को लागू कराने का अधिकार है उनके पास? इसका जवाब यही है कि दरअसल, यह सब मंत्री जी की समस्या है ही नहीं, इस समस्या का हल्ला मचाकर वे अपनी उस 'समस्या' को ही खत्म करना चाह रहे हैं। उनकी नज़र में समाधान यही होगा कि संविधान से 'सेक्युलरिज्म' को निकाल दिया जाए, लेकिन शायद संविधान के साथ-साथ मंत्री जी समाचार भी नहीं पढ़ते, अब तो नहीं ही पढ़ते हैं, तब भी नहीं पढ़े, जब पढ़ना ज़रूरी होता है और तब भी नहीं पढ़े जब उनकी सियासी सोच को बल देने वाले उन्हीं की पार्टी के वरिष्ठ लोग सरकार चला रहे थे। 
मतलब यह कि मंत्री जी ने उस समय भी समाचार नहीं पढ़ी थी, जब 1973 में 'केसवनंदा भारती बनाम स्टेट ऑफ़ केरल' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों की खंडपीठ ने बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा था कि संसद की शक्ति संविधान संशोधन करने की तो है, लेकिन संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को नहीं बदला जा सकता है और कोई भी संशोधन प्रस्तावना की भावना के खिलाफ़ नहीं हो सकता है। पता नहीं, मंत्री जी यह जानते भी हैं या नहीं कि 'सेक्युलरिज्म' भारतीय संविधान की 'मूल भावना' है, जिस 'सेक्युलरिज्म' शब्द को 1976 में संशोधन कर संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया, वो उसी पंथनिरपेक्षता का परिचायक है, जिसका जिक्र संविधान में पहले से है। मंत्री जी की ही पार्टी के तत्कालीन गृह मंत्री गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने 1998 में संविधान की समीक्षा के लिए बनी कमेटी को लेकर उठे सवालों का जवाब देते हुए कहा था कि 'सेक्युलरिज़्म भारत की संस्कृति में है और इसे हटाया नहीं जा सकता।' हालांकि मंत्री जी की पार्टी में अभी आडवाणी जी अप्रासंगिक हो गए हैं, इसलिए एक और उदाहरण देते हैं। भाजपा के संकट मोचक कहे जाने वाले हमारे उप-राष्ट्रपति वैंकेया नायडू ने जी ने तो अभी हाल ही में कहा था कि 'सेक्युलरिज़्म हमारे डीएनए में है।' तो क्या मंत्री जी भारतीय संविधान की मूल भावना, हमारी संस्कृति और हमारे डीएनए के बदलना चाहते हैं...? क्या मंत्री जी हमारे गांव से शहर जाते समय रास्ते में पड़ने वाले बरगद के पेड़ को गिरा देंगे, जहां हिन्दू-मुस्लिम सभी धूप-बरसात से बचने के लिए एकसाथ बैठते हैं? क्या मंत्री जी उस बरगद के नीचे वाले चापाकल को भी उखड़वा देंगे जो पानी पिलाने में हिन्दू-मुस्लिम का भेद नहीं करता? क्या मंत्री जी उस चापाकल में जंजीर से बंधे उस ग्लास को भी फोड़ देंगे, जिससे पानी पीते हुए मैंने कभी नहीं सोचा कि मुझसे पहले शायद किसी मुस्लिम ने इससे पानी पी होगी? क्या मंत्री जी हमारी सामाजिकता से भी सेक्युलरिज्म को निकाल फेकेंगे, ताकि मेरे बच्चे मेरे गांव के अमीन चाचा को 'बाबा' नहीं बोल सकें...? 

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

भंवर में फंसी सियासी नैया के नए खेवैया

विरासत में मिली हर चीज हर किसी को अच्छी नहीं लगती खासकर राजनीति, वह भी तब, जब परिवार मूल रूप से सियासी हो और नई पीढ़ी आधुनिकता की गोद में चिपक कर बैठी हो। लेकिन राजनीति से दूराव की इस व्यक्तिगत मज़बूरी के बाद बावजूद अपने परिवार और पार्टी के लिए कोई निजी नापसंदगी को गौण कर दे और सियासत की बारीकियां सीखते हुए राजनेता बनने की राह पर चलने को तैयार हो जाए, तो इसकी सराहना की जानी चाहिए। कुछ कड़वे अनुभव या प्रशंसक और सियासी नजरिए से शायद हमें कांग्रेस मुक्त भारत का नारा सुखद लगे, लेकिन एक भारतीय के नाते इस सबसे पुरानी पार्टी को खत्म होते देखना दुखद है। बहरहाल, राजनीतिक और कूटनीतिक चालबाजी से दूर सीधे साधे राहुल गांधी पर बीते कुछ सालों में जिस तरह से सियासी रंग चढ़ा है वह इस भारतीय लोकतंत्र के लिए सुखद है, जहां विपक्ष की एक महती भूमिका होती है। इस सच को भले ही इस दुर्भाग्य के साथ स्वीकार करना पड़े कि राहुल गांधी परिवारवाद की देन हैं लेकिन स्वीकार तो करना पड़ेगा, क्योंकि इस हमाम में सब नंगे हैं। सियासत बदलने का दावा करने वाली भाजपा भी इस मुद्दे पर कांग्रेस को घेर नहीं सकती क्योंकि न सिर्फ उसके अपने सहयोगी दल 'युवराजों' के हाथों में हैं, बल्कि खुद भाजपा में भी परिवारवाद फल-फूल रहा है। इस मुद्दे पर भाजपा का दोतरफा रवैया हाल की एक घटना से परिलक्षित होता है। 4 दिसम्बर को राहुल गांधी द्वारा अध्यक्ष पद के लिए नॉमिनेशन करने के बाद जब भाजपा का पूरा कुनबा कांग्रेस को कोस रहा था, उससे ठीक एक दिन पहले महबूबा मुफ्ती लगातार छठी बार पीडीपी की अध्यक्ष चुनी गईं और भाजपा के एक बड़े नेता ने बेहद सरगर्मी के साथ उन्हें बधाई दिया। वहां पर भाजपा के लिए वंशवाद का मुद्दा गौण हो गया। इस बात में कोई संदेह नहीं कि राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के पीछे का एकमात्र कारण यही है कि वे नेहरू-गांधी परिवार के वारिस हैं। लेकिन इस आधार पर हम उन्हें तब तक ख़ारिज नहीं कर सकते, जब तक हमारे सामने वंशवाद और परिवारवाद मुक्त पार्टी का विकल्प मौजूद नहीं होता।

11 दिसम्बर को जिस वक्त कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव के रिटर्निंग अफसर मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने यह ऐलान किया कि राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए हैं, उस वक्त राहुल गुजरात के बनासकांटा में एक चुनावी सभा को संबोधित कर रहे थे। उस रैली में राहुल की बोलने की शैली और दर्शकों से खुद को जोड़ने का अंदाज यह साबित कर रहा था कि 2017 के राहुल गांधी 2014 के राहुल गांधी से ज्यादा प्रभावी और परिपक्व हैं। गुजरात के चुनावी भाषणों में राहुल के इन शब्दों ने स्वस्थ सियासी परंपरा का संकेत दिया है कि 'वे कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते हैं, लेकिन हम भाजपा मुक्त भारत के बारे में नहीं सोच सकते। हम चाहते हैं कि वे भी रहें और हम भी रहें। जनता तक वे अपनी बात पहुंचाएं और हम अपना पक्ष रखेंगे।' आज कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभालने के बाद अपने पहले भाषण में भी राहुल गांधी ने इस आशय की बात कही। 
सकारात्मक सियासत के साथ-साथ बात चाहे सियासी पैंतरेबाजी की हो या चुनावी जुमलेबाजी की, राहुल गांधी हर मोर्चे पर मोदी के सामने खड़े हो रहे हैं। कांग्रेस के अंदरखाने राहुल के प्रभाव का एक उदाहरण हाल में देखने को मिला, जब प्रधानमंत्री के लिए मणिशंकर अय्यर द्वारा अपशब्द कहे जाने पर खुद राहुल गांधी ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के लिए राहुल गांधी का यह संदेश भी सकारात्मक सियासत का संकेत है कि कोई भी प्रधानमंत्री के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल न करे। राहुल गांधी इस मामले में भी बधाई के पात्र हैं कि उनमें अपनी आलोचना और मजाक सहने की क्षमता है। आज सोनिया गांधी ने अपने बेटे की इस क्षमता का बखान भी किया। वर्तमान राजनीति में जबकि बड़े तो बड़े छुटभैये नेता भी अपने विरोध के फेसबुक पोस्ट या ट्वीट पर सामने वाले को कानूनी कठघरे में खड़ा कर देते हैं, उस समय तमाम मजाक के मामले में सांता-बांता से तुलना को भी बर्दास्त करने की राहुल गांधी की क्षमता इस लोकतंत्र में सुखद लगती है। लेकिन उन्हें अब भी बहुत सी सियासी मर्यादाएं सीखनी हैं। जिस तरह ने उन्होंने एक विधेयक की कॉपी फाड़ी या जिस तरह से भरी संसद में ललित मोदी मुद्दे पर घिरी सुषमा स्वराज के अपनत्व को यह कहकर ठेस पहुंचाया कि 'कल सुषमा आंटी आईं और मुझसे कहा कि राहुल बेटे मुझसे नाराज क्यों हो'... अगर राजनीति में खुद को स्थापित करना है तो राहुल गांधी को इस ओछी सियासत से पार पाना होगा। कांग्रेस अब तक 17 अध्यक्ष देख चुकी है और उनमे से 6 नेहरू-गांधी परिवार से ही रहे, लेकिन किसी के भी समय कांग्रेस उतनी कमजोर नहीं हुई, जितनी आज है। कांग्रेस अब तक के अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है और राहुल गांधी को उस व्यक्ति से लोहा लेना है, जिसकी शख्सियत देश की एक बड़ी आबादी के नस-नस में रच-बस गई है। यह देखने वाली बात होगी कि क्या राहुल गांधी भारत के लिए मोदी का विकल्प बन पाते हैं... बहरहाल, उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने की बहुत बहुत बधाई...