मंगलवार, 19 नवंबर 2013

अपने कार्यकाल में भारत को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दिलाने वाली भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री 'श्रीमती इंदिरा गांधी जी' की आज 96 वी जयन्ती है| उनके इस जन्मदिवस पर मै तहे दिल से उनके प्रति श्रद्धा-सुमन अर्पित करता हूँ| 

देख कर आज का अराजक भारत मुझे उस शेरनी की याद आती है,
जिन्होंने भारत को बुलंदी बख्सी, उस इंदिरा गांधी की याद सताती है,
इस 96 वे जन्मदिवस पर भी आज जब सारे सपने उनके अधूरे है 
कैसे ना कहूं उनके बेटे आज उनको भूले बिसरे हैं|

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

कूड़े के ढेर में भारत का भविष्य-

कल पुरे भारत में बाल दिवस बड़े ही धूम-धाम से मनाया गया| यह दिन एक ओर जहाँ उन बच्चो को समर्पित है जिन्हे भविष्य में देश की बागडोर अपने हाथो में लेनी है, तो वही दुसरी तरफ यह दिन उस महान पुरोधा 'पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन है जिन्हे बच्चे प्राणो से भी प्यारे थे| लेकिन कल जब पुरे देश में समर्थ अभिभावकों के बच्चे बाल दिवस का आनंद ले रहे थे, उस दिन भी कुछ बच्चो को कूड़े के ढेर में अपना भविष्य ढूंढते देखा जा सकता था। क्या हम उस महान पुरोधा के जन्म दिवस को सार्थक कर पा रहे है जिन्हें बच्चे प्यार से चाचा नेहरू कहते थे। ये कैसी विसमता है कि एक समर्थ्य अभिभावक का बच्चा गाड़ी में बैठ कर स्कूल जाता है तो दुसरी तरफ उसी का हमउम्र दुसरा बच्चा अपनी जठराग्नि शांत करने के लिए लाल बती पर गाडियो का सीसा खटखटाता है| आंकड़े बताते है कि भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के 17 लाख बच्चे इलाज के अभाव में मरते है। स्वाभाविक है जो अभिभावक अपने लाडले की भुख से बिलखती आत्मा को तृप्त नहीं कर सकता है उसके लिए बच्चे का इलाज और उसे स्कुल भेजने की बात सोचना भी बेमानी होगी। लोहिया जी ने कहा था ''प्रधानमंत्री का बेटा हो या राष्ट्रपति की हो संतान, टाटा या बिडला का छौना सबकी शिक्षा एक समान।'' पर आज आजादी के 65 साल बाद भी सुबह के प्रथम साक्षात्कार में पीठ पर कचरे का थैला लिए एक छोटे बच्चे को देखकर लोहिया जी का ये नारा सपना ही प्रतीत होता है। ये हालत केवल एक़ शहर विशेष या राज्य विशेष की नहीं है। कोहिमा से कांडला और कश्मीर से कन्याकुमारी तक पुरे भारत में हम भारत के भविष्यो के इस गर्तोंमुख गंतब्य से रूबरू हो सकते है। अंतर सिर्फ इतना है कि कही यह बालश्रम के रूप में दिखता है, कही सार्वजनिक स्थल पर कटोरा बजाते हुए, कही पॉकेटमारी करते या चेन खींचते हुए, तो कही ट्रेनों में सूरदास की लाठी थामे हुए। 

बाजारों के अपार जनसैलाभ में हम सामान आयुवर्ग के बच्चो को अलग-अलग परिस्थितियों से सामना करते देख सकते है। कोई महंगे पठाखे और अच्छे ब्रांड के कपड़ो की जिद करता नजर आता है, कोई अपने कल को स्वर्णिम बनाने के लिए कचरों की ढेर से लड़ रहा होता है, तो कोई अपने भाग्य पर आंसू बहाता हुआ हाथ पसारे हुए दुसरो के पीछे दौड़ रहा होता है। अपने हमउम्र बच्चो की ऐयाशी देखकर सडको पर पल रहे बच्चो का मन क्या हिन भावना से ग्रस्त नहीं होगा? क्या वे भी उनकी तरह ठाठ-बाट से जीना नहीं चाहेंगे? और एक ऐयासी की जिंदगी जीने के लिए अगर वे कोई गलत रुख अपनाते है, तो क्या यह उनकी गलती है? समान आयुवर्ग के बीच उपजी गहरी खाई के कारण हिन भावना से ग्रस्त कोमल-मन बच्चो को नजर अंदाज करके क्या हम अपने ही देश में कसाब और सुल्तानमिर्जा पैदा नहीं कर रहे है?

आज ढाबो में बर्तन धो रही नन्ही हाथें, अपने मालिक की एक आवाज पर सरपट दौड़ने वाले नन्हे पैर, और हाथो में गुटको का थैला लिए ट्रेनो-बसो में घूमते बच्चो की मासूम आँखे उन समाज के ठेकेदारो से हर दिन प्रश्न करती दिख सकती है जो सिर्फ कागजो में कानून बनाना ही अपना कर्त्तव्य समझते हैं| आज विडंबना यह है कि बाल श्रमिकों के कल्याण के लिए उठने वाली आवाज नक्कार खाना में तूती बन कर रह गयी है। 1980 में ही बालश्रम के कार्य पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। 1986 में राष्ट्रीय बालश्रम आयोग के सुझाव पर राष्ट्रीय बालश्रम एवं पुनर्वास अधिनियम पारित किया गया। 1996 में उच्च न्यायालय तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी बालश्रम के विरुद्ध व्यवस्था करने की अनुशंसा की। बावजूद इसके बालश्रम पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है।
भारतीय समाज में दरार पैदा करती बच्चो की इन दयनीय स्थिति पर 'राजेश रेड्डी' जी ने ठीक ही कहा है-
"यहाँ हर शख्स, हर पल हादसा होने से डरता है ,
खिलौना है जो मिटटी का फ़ना होने से डरता है ,
मेरे दिल के किसी कोने में, एक मासूम सा बच्चा ,
बड़ों की देख कर दुनिया, बड़ा होने से डरता है.......!

सोमवार, 11 नवंबर 2013

कुछ याद इन्हे भी कर लें-

आज 31 अक्टूबर का दिन भारतीय इतिहास का वह् दिन है जब भारत की ऐतिहासिक भूमि पर उस महान पुरोधा 'सरदार वल्लब भाई पटेल' का प्रादुर्भाव हुआ था जिन्होंने 600 देशी रियासतों को मिलाकर एक गणतंत्र भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई|
दुसरी तरफ़ यह दिन भारत के राजनीतिक इतिहास का वह् काला दिन है जब भारतीय गणराज्य को अपने कार्यकाल में एक नई दिशा देने वाली सिंहनी श्रीमती इंदिरा गाँधी जी की निर्मम हत्या कर दीं गई थी|
आज जब हम इन दो महान नेताओं के भारत के लिए सपने ओर वर्तमान भारत की तुलना करते है तो यह पाते है कि आज भी हम इनके सपनों के भारत से कोसो दूर हैं|
आज जब हमारी 38 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि चीन के कब्जे में है, अरुणाचल प्रदेश और लद्दक के कुछ क्षेत्रों पर चीन आज भी अपनी नजर गड़ाए बैठा है, चीनी सैनिक हमारे सीमा क्षेत्र में आकर गश्त करते है, पाकिस्तान आज भी अपनी नमुराद हरकतों से बाज़ नही आ रहा है, इस समय हमे भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल की याद आती है जिन्होंने अपने बूते 600 देशी रियासतों का भारत में विलय कराया था| आज सता सूख के लिए किसी भी हद तक गिरने वाले नेताओं को सदर पटेल के जीवन से सिख लेनी चहिए जिन्होंने प्रधानमंत्री पद को तरजीह ना देते हुए आज़ाद भारत के अस्तित्व को तरजीह दी| मैंने 'राजीव दीक्षित' जी के एक भाषण में सुना था, ''आजादी के बाद प्रधानमंत्री पद के चुनाव में सरदार पटेल को बहुमत मिला, लेकिन नेहरू किसी भी कीमत पर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठना चाहते थे| इसके लिए वे महात्मा गाँधी के पास गए और कहा कि अगर मै प्रधानमंत्री नही बना तो काँग्रेस भंग कर दूँगा| चुकी काँग्रेस भंग हो जाती तो अँगरेजों को एक बहाना मिल जाता कि भारत के पास नेतृत्व का अभाव है इसलिए हम भारत को स्वतंत्र नही कर सकते, यह सोच कर गाँधी जी ने नेहरू की बात मान ली और पटेल जी ने गृहमंत्री बनना मुनासिब समझा| 
दूसरी तरफ़ आज हम 'श्रीमती इंदिरा गाँधी जी'' की 29 वी पुण्य तिथि मना रहे  है| लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु के पश्चात जब इन्दिरा गाँधी भारत की प्रधानमंत्री बनी, उस समय भारत सूखे की मार झेल रहा था| लेकिन अपनी कार्य कुशलता और सफल नेतृत्व की बदौलत इन्दिरा जी ने भारत को विकाश के पथ पर ला खड़ा किया| 1980 के आम चुनाव में जब की पुरे भारत में ''कांग्रेस हटाओ देश बचाओ'' का स्लोगन जन-जन का नारा बन चूका था| उस विषम परिस्थिति में इंदिरा जी ''गरीबी हटाओ देश बचाओ'' का नारा देकर पुनः आम-जन के दिल पर काबिज हो गई| पर दुर्भाग्यवश, शायद ''जठराग्नि को आर्थिक सुधारों के पैरो तले रौदा जाना, भारतीय जनता के नसीब में लिखा ही था| एक प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा जी की ''गरीबी हटाओ देश बचाओ'' की आखिरी ख्वाहिस आज 29 साल बाद भी पूरी तरह अधूरी है| आज भी 34 करोड़ 47 लाख भारतीय आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर कर रही है| ये सरकारी आँकड़े है, इनमें वे लोग शामिल नही है जिन्हें आज तक फूटपाथ छोड़कर छपापड़ नसीब नही हुआ| महँगाई से त्रस्त जनता का बुरा हाल किसी से छुपा नही है| खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छू रही है| दुःख होता यह देखकर इंदिरा जी की पार्टी के नेता 1, 5 और 12 रुपये में भरपेट खाना मिलने की बात कर गरीबों का मजाक उड़ा रहे है| उनके पौत्र कहते है गरीबी तो केवल मनः स्थिति है|
हमारी वर्तमान काँग्रेस सरकार 'जन वितरण प्रणाली' का नाम बदलकर 'इंदिरम्मा अन्न योजना' करने पर विचार कर रही है| आम आदमी को महँगाई की आग में जलने को मजबूर करने वाली काँग्रेस नित यूपीए सरकार को यह जानना चहिए कि केवल किसी योजाना का नाम इंदिरा गाँधी के नाम पर रख देने से उन्हें श्रद्धांजलि नही दी सकती| उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी उन करोड़ों लोगो के मुँह तक निवाला पहुँचाना जो कई-कई दिन भूखे पेट सोने को मजबूर रहते है ओर अंततः एक दिन जठराग्नि की भेंट चढ़ जाते है|

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

कब रुकेगी गोलियों की गडगडाहट और बुटो की धमक-

''ना बुजुर्गो के ख्वाबो की ताबीर हूँ, ना मै जन्नत सी अब कोई तस्वीर हूँ,
जिसको सदियो से मिलकर के लुटा गया, मै वो उजड़ी हुई एक जागीर हूँ,
हाँ मै कश्मीर हूँ, हाँ मै कश्मीर हूँ, हाँ मै कश्मीर हूँ, हाँ मै कश्मीर हूँ ,
मेरे बच्चे बिलखते रहे भूख से ये हुआ है सियासत की एक चुक से,
रोटिया मांगने पर मिली गोलिया चुप कराया गया इनको बन्दुक से|''
इमरान प्रतापगढ़ी की ये पंक्तिया वर्तमान कश्मीर पर सटीक बैठती है| जहाँ नामुराद पाक की नापाक हरकत और भारतीय हुक्मरानों की चुप्पी ने कश्मीर वाशियों को इस हालत में ला खड़ा किया है कि वे आज अपना घर होते हुए भी विस्थापित की जिन्दगी जीने को मजबूर है| जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री 'उमर अब्दुला'' का यह कहना एकदम सही है कि अब केवल बातचीत से बात नहीं बनेगी, भारत सरकार पाकिस्तान के इस हरकत का जबाब देने का कोई दूसरा विकल्प ढूंढे|
आज दुश्मनों और सैनिको के बुटो तले रौंदे जा रहे कश्मीर की धरती का इतिहास बहुत ही स्वर्णिम रहा है| जिसका उल्लेख कल्हण की रचना राजतरंगिणी में मिलता है| कहा भी जाता है कि धरती पर कहीं स्वर्ग है तो वो कश्मीर है| सबसे पहला कारण और जो सब से बड़ा कारण रहा है कश्मीर की सुन्दरता मे दाग लगाने मे ,वो है आतंकवाद| इन आतंकवादियों के नापाक इरादे और उनके गलत मंसूबो को नाकाम करने के लिए हमारी सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम ने कश्मीर वासियों को उन्हें उनके ही घर में गुलाम बना दिया है| आए दिन कर्फ्यू की मार झेल रही कश्मीरी जनता को लगातार जिस तरह फौजी संगीनों के साये और अपमान में जीना पड़ता है, वह किसी भी कौम के लिए दमघोंटू होगा।
अगर हम इतिहास के आईने से देखे तो यह पाते है की कश्मीर और कश्मीरियों की इस दुर्दशा का बीजारोपण भारत और पाकिस्तान के निर्माण के समय ही हो चूका था| कश्मीर का भारत में विलय ही विषम परिस्थितियों में हुआ था| अंग्रेजो की साजिश नेहरु का अड़ियल रुख और जिन्ना द्वारा सांप्रदायिक राग अलापे जाने के कारण भारत का विभाजन सांप्रदायिक आधार पर किया गया|  उन दिनों कश्मीर एक स्वतन्त्र रियासत हुआ करता था| जो एक मुस्लिम बहुल रियासत था लेकिन वहां का राजा हरी सिंह हिन्दू था| अपने स्वर्णिम इतिहास के साथ कश्मीर उस समय तक साम्प्रदायिकता से मुक्त रहा था| भारत के बटवारे पर हुए समझौते के दस्तावेज के अनुसार रियासतो के राजाओं को दोनो मे से एक राष्ट्र को चुनने का अधिकार था परंतु कश्मीर के महाराजा हरी सिंह अपनी रियासत को स्वतंत्र रखना चाहते थे और उन्होने किसी भी राष्ट्र से जुड़ने से बचना चाहा। लेकिन हरी सिंह का स्वतन्त्र रहने का सपना सपना ही रह गया और रियासत पर पाकिस्तानी सैनिको और पश्तूनो के कबीलाई लड़ाको (जो कि उत्तर पश्चिमी सीमांत राज्य के थे) ने हमला कर दिया। पाकिस्तानी हमले से अपनी सुरक्षा को महाराजा हरी सिंह ने भारत से सैनिक सहायता की अपील की तो भारत ने विलय की शर्त रख दी| इस बार हरी सिंह को विलय के लिए तैयार होना पड़ा| इसप्रकार 1949 में कश्मीर ने सशर्त भारतीय संघ में होना स्वीकार किया। कश्मीर के भारत में शामिल होने पर कश्मीरी जनता के जनमत संग्रह का भी वायदा किया गया था, जिसे कभी निभाया नहीं गया। इसके लिए पंडित नेहरू का तर्क यह था कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1947-48 में पाकिस्तान-समर्थित हमले के बाद यह तय किया गया था कि पाकिस्तान कश्मीर के उत्तर-पश्चिमी हिस्से से अपनी सेनाएँ वापस बुलायेगा और उसके बाद जनमत संग्रह कराया जायेगा। पाकिस्तानी शासकों ने अपना कब्ज़ा छोड़ा नहीं और इसके कारण जनमत संग्रह कराने से भारतीय शासकों ने इनकार कर दिया। लेकिन भारत और पाकिस्तान की क्षेत्रीय महत्तवाकांक्षाओं में पिस गया कश्मीरी अवाम।
80 के दसक में कश्मीर में आतंकवाद अपना पैर पसार चुका था| 1989 से 1991 -92 तक हजारो कश्मीरी नौजवान आतंकवाद और भारतीय राज्य के बीच टकराव की भेंट चढ़ चुके थे| भारत सरकार से कश्मीरियों की अविश्वसनीयता के बल पर ऐसे बहुत से अलगाववादी समूह कश्मीरियों के बीच पैठ बना चुके थे जो आजाद कश्मीर या पाकिस्तान में शामिल होने की ख्वाहिस रखते थे| हत्या, बलात्कार, अपहरण और सेना द्वारा अकल्पनीय दमन की प्रतिक्रिया में हजारो कश्मीरी नौजवान आतंकवाद के रास्ते पर चल निकले| युवा हाथो ने कलम की जगह बन्दुक और गोले बारूद थाम लिए|  इनके दमन को भारत ने कठोर कदम अख्तियार किया| 1989 से भारतीय राज्य ने कश्मीर घाटी में आतंकवाद के विरुध्द बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया और अपनी सैन्य शक्ति के बूते पर 1993 आते-आते आतंकवादी समूहों को काफी हद तक कुचल डाला। लेकिन आतंकवाद को कुचलने के नाम पर कश्मीरी जनता का भी सेना ने भयंकर दमन और उत्पीड़न किया। 1993 में भारत सरकार ने दावा किया कि कश्मीर घाटी में आतंकवाद और पाकिस्तान से होने वाली घुसपैठ को ख़त्म कर दिया गया है और अब घाटी में एक अनुमान के अनुसार केवल 600 से 1,000 सशस्त्र आतंकवादी मौजूद हैं। इसके बाद 90 का दसक सामान्यतः शांत बिता| नई शताब्दी के पहले दसक के मध्य में कश्मीरी जनता में सैन्य-दमन और अत्याचार के ख़िलाफ सुलग रहे भयंकर असंतोष का फायदा उठाया हुर्रियत कान्फरेंस के नेता सैयद अली शाह गिलानी ने, जो की एक इस्लामी कट्टरपन्थी नेता हैं| इस समय कश्मीर में कोई दुसरी ताकत मौजूद नहीं थी जो भारतीय दमन का विरोध कर सके इसलिए गिलानी को कश्मीरी जनता का अपर समर्थन प्राप्त हुआ| 2004-05 आते-आते इस आन्दोलन ने कश्मीर घाटी में गहरे तक अपनी जड़ें जमा ली थीं। 2009 में अमरनाथ यात्रा के लिए भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ हुए आन्दोलन में इसका प्रमाण भी मिला| अब कश्मीर में भारत विरोधी नारे लागते वे लोग दिखने लगे जिनका सम्बन्ध किसी आतंकी संगठन से नहीं था| वे कश्मीर के आम लोग थे|
आज सारा भारत पकिस्तान की भारत विरोधी कर्मो से दुखी और आक्रोशित हो सकता है लेकिन इस विपदा के भुक्तभोगी उन परिवारों का दर्द कौन समझेगा जिनके सामने कभी कभी ऐसे हालत आते है कि वे महीनो अपने घर की चारदीवारी में कैद रहते हैं| कश्मीर में पिछले डेढ़ दशक में सशस्त्र बलों के हाथों 60,000 कश्मीरी अपनी जान गँवा चुके हैं और 7,000 लापता हैं। इसकी कोई गिनती नहीं कि कितनी औरतों का अपहरण और बलात्कार किया जा चुका है और कितने मासूम अपाहिज हो चुके हैं। भारत सरकार को कश्मीर में ऐसे हालत पैदा करने होंगे जिससे की वहां का हर बच्चा शाह फैजल बन सके|

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

रामेश्वरम के एक छोटे गाँव से निकल कर भारत को परमाणु संपन्न बनाने वाले एक मछुवारे के बेटे 'भारत रत्न' ''अवुल पकिर जैनुलाअबदीन अब्दुल कलाम'' को उनके 82 वे जन्म दिवस पर मै उन्हें तहे दिल से बधाई देता हूँ, जिन्होंने अपने राष्ट्रपत्रित्व काल में भारतीय गणराज्य को एक नई ऊँचाई दी|

''अपने सुकर्मो से जिन्होंने भारत को परमाणु संपन्न किया,
राष्ट्रपति पद पर बैठ भारतीय गणराज्य को धन्य किया,
जन्म दिवस पर करता हूँ मै इस पुरोधा को शत बार नमन,
मिशाईल मैन बनकर जिन्होंने भारत का पताखा बुलंद किया|''

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

जबाब कौन देगा?           
संसद जबाब देगी इसका या संविधान बतलायेगा,
पुलिस तमाशा देख रही इन्हें कौन बचाने आएगा,
अपने ही घर में लोग यहाँ पर जिन्दा जलाए जाते है,
अफ़सोस न्यायालय द्वारा कातिल निर्दोष बताए जाते है|
भारत के लिए हमने गांधी का सपना कहाँ साकार किया,
जब दिन-दहाड़े दबंगों ने दलितों पर अत्याचार किया,
गांधीजी के हरिजन यहाँ दहशत के साये में जीते हैं,
उनके लाडले आज भी बिन बिस्तर भूखे पेट ही सोते हैं,
धर्म के नाम पर आतंकी से दोष हटाये जाते हैं,
अफ़सोस न्यायालय द्वारा कातिल निर्दोष बताए जाते है|
बाबा साहब का एक सपना इनको सशक्त करने का था,
सम्मानित जीवन देकर,इनको बंधन से मुक्त करने का था,
हिंदुस्तान में भी इनको अंग्रेजो के जैसे सताया जायेगा,
भारत के वीर शहीदों को  फिर क्या संदेशा जाएगा,
सारे समाज की गंदगी ढोने के काम इनके सर आते है,
अफ़सोस न्यायालय द्वारा कातिल निर्दोष बताए जाते है|
    

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

हिन्दी दिवस मनाने का औचित्य क्या है?-

एक तरफ आज से 71 साल पहले 9 अगस्त 1942 को आजादी की लड़ाई में महात्मा गाँधी ने अँगरेजों भारत छोड़ो का नारा दिया था| सपना था अंग्रे भी जायेंगे और अंग्रेजियत भी| जबकि दूसरी तरफ 175 साल पहले 12 अक्टूबर 1836 को लार्ड मैकाले ने अपने पिता को लिखे पत्र में कहा था कि, ''आगामी 100 साल बाद हिंदुस्तान में ऐसे बच्चे होंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी|'' स्वतंत्रता प्रप्ति के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी। 13 सितंबर,1949 को संविधान सभा की बहस में भाग लेते हुए 'पंडित जवाहर लाल नेहरू' ने कहा था, ''किसी विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता। कोई भी विदेशी भाषा आम लोगों की भाषा नहीं हो सकती। भारत के हित में, भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र बनाने के हित में जो अपनी आत्मा को पहचाने, जिसे आत्मविश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिंदी को अपनाना चाहिए।" वर्तमान समय में जब हम अपने समाजिक बोल-चाल और रीति-रिवाज पर नजर डालते है तो यह पाते है कि लार्ड मैकाले की भविष्यवाणी सच साबित हो रही है| और हमारे दूरदर्शी प्रधानमंत्री 'पंडित नेहरू' का हिन्दी को अपनाने का सपना आज आजादी के 67 साल बाद भी अधूरा है|
‘थोमस बैबिंगटन मैकाले’ ब्रिटेन का राजनीतिज्ञ, कवि, और इतिहासकार था| सन् 1834 से 1838 तक वह भारत की सुप्रीम काउंसिल में लॉ मेंबर तथा लॉ कमिशन का प्रधान रहा। प्रसिद्ध दंडविधान ग्रंथ "दी इंडियन पीनल कोड" की पांडुलिपि इसी ने तैयार की थी। आज भारतीय संस्कृति में हिन्दी सिर्फ कहने को ही हमारी मातृभाषा है| भारत को यह दुर्दिन दिखाने के पिछे लार्ड मैकाले का बहुत बड़ा हाथ है| व्यापार के बहाने आकर भारतीय संस्कृति का सम्मुल नष्ट करने का सपना देखने वाले अँगरेजों में सबसे घृणित अँगरेज मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटेन की संसद में भारत के प्रति अपने विचार प्रकट करते हुए कहा था, "मैं भारत में काफी घुमा हूँ। दाएँ- बाएँ, इधर उधर मैंने यह देश छान मारा और मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो, जो चोर हो। इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है, इतने ऊँचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं की मैं नहीं समझता की हम कभी भी इस देश को जीत पाएँगे। जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है और इसलिए मैं ये प्रस्ताव रखता हूँ की हम इसकी पुराणी और पुरातन शिक्षा व्यवस्था, उसकी संस्कृति को बदल डालें, क्यूंकी अगर भारतीय सोचने लग गए की जो भी विदेशी और अंग्रेजी है वह अच्छा है और उनकी अपनी चीजों से बेहतर हैं, तो वे अपने आत्मगौरव, आत्म सम्मान और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बन जाएंगे जैसा हम चाहते हैं। एक पूर्णरूप से गुलाम भारत।" अपने इस सपने को साकार करने के लिए 1858 में लोर्ड मैकोले द्वारा Indian Education Act बनाया गया। इसके तहत भारत में मौजूद सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया।
वो था अपना भारत जिसके चारित्रिक आदर्श और गुणवता का पुरे विश्व में डंका बजता था| लेकिन अंग्रेजों ने हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक संपदा 'माँ हिन्दी' में सेंध डालकर भारतीय संस्कृति में अंग्रेजी का एक ऐसा बिजा रोपण कर दिया जिसके कुप्रभाव से आज भारतीय संस्कृति खतरे में पड़ी नजर आ रही है| हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, 'वर्धा' के अनुरोध पर 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष 'हिंदी दिवस' के रूप में मनाया जाता है। आज पुरे 60 साल हो गए हमे हिन्दी दिवस मानते हुए, लेकिन कठिन दौर से गुजर रही इस विरासत को बचाने के सार्थक कदम आज भी नजर नही आ रहे है| हम बचपन से ही सुनते आ रहे है कि, हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा है| लेकिन सूचना के अधिकार के तहत एक ऐसा खुलासा हुआ है जिसे जानने के बाद हिन्दी पर तरस आती है, और गुस्सा आता है हमारे नीति-नियताओ पर| राष्ट्रभाषा के विषय में सूचना के अधिकार कानून के तहत माँगी गइ जानकारी में, लखनऊ की आरटीआई कार्यकर्ता 'उषा शर्मा' को दी गई जानकारी इस ओर इंगित करती है कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा नहीं हैं। गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग से मिली सूचना के अनुसार भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी भारत की राजभाषा केवल राजकाज की भाषा तक सीमित हैं। भारत के संविधान में राष्ट्रभाषा का कोर्इ उल्लेख नहीं है।
कहा जाता है, ''जब से जागो तभी सबेरा'', अतः अभी भी समय है हिन्दी को बचाने का वरना प्रत्येक वर्ष हिन्दी दिवस मनाने का कोइ औचित्य नही रह जाएगा| मेरा मतलब यह कतई नही है कि हम दूसरी भाषाओं को ना अपनाए, वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपना स्थान सबसे ऊपर रखने के लिए हमे और विदेशी भाषाएँ भी जाननी होगी| लेकिन हमे पहले अपनी मातृभाषा पर पकड़ मज़बूत बनानी होगी| हमे इन पंक्तियों पर गौर करना होगा कि,
''हिन्दी में हम काम करेंगे पहले मन में संकल्प करें,
निश्चय होकर आरंभ करें, विश्वास न मन में अल्प करें,
पहले यदि कुछ मुस्किल होगी धिरे-धीरे मीट जाएगी,
अभ्यास निरंतर करने से मज़बूत पकड़ हो जाएगी|''