पिछले दिनों पीटीआई ने खबर दी कि 'प्रधानमंत्री जी की तरफ से ऐसी कोई अपील नहीं है कि दिवाली पर केवल भारत में बनी वस्तुएं ही खरीदें।' बात भी सही है। माना कि देश में बने उत्पादों का उपभोग स्वाभिमान के साथ विकास का सूचक है। लेकिन राष्ट्रवाद की अंधी दौड़ में आप वैश्वीकरण को झुठला नहीं सकते। जिस समय भारत में चीन में बनी फुलझड़ियाँ, जो फ्यूज हो चुकी थीं और मोबाइल के फ्लिप कवर और स्क्रीन गार्ड में आग लगा कर भारत प्रेम की ज्वाला जगाई जा रही थी, उसी समय 20 अक्टूबर को भारतीय सैनिक, चीनी सैनिकों के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास कर रहे थे। जिस चीन ने 54 साल पहले छल से हमारी संप्रभुता पर चोट की और आज हमारे पड़ोसी को हथियार मुहैया करा रहा है, उसके साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास जायज है, उसके पैसे से मोदी जी की महत्वाकांक्षी योजना, स्मार्ट सिटी को संजीवनी मिले यह जायज है, उसके पैसे से भारत की जीडीपी में उछाल लाया जाए यह जायज है, लेकिन उसकी बाजार से कुछ छोटे-मोटे सामान खरीद कर भारत में अपनी रोजी-रोटी चलाना नाजायज है... वाह रे देशभक्ति और वाह रे बुद्धिमता... और हाँ, जिस इनडायरेक्ट रिलेशन से हम पाकिस्तान से होते हुए चीन विरोध तक पहुंचे हैं, उस डायरेक्ट रिलेशन वाले पाकिस्तान से हिंदुस्तान की कथित 'दुश्मनी' की भी कहानी सुनिए... जिस समय उड़ी हमला हुआ उस समय भी और जिस समय सर्जिकल स्ट्राइक हुआ उस समय भी और आज भी अटारी बॉर्डर, अमन सेतु, सदा-ए-सरहद, या चकन-दे-बाग से हजारों बस और ट्रक आ-जा चुके हैं, समझौता एक्सप्रेस उसी रफ्तार से दौड़ रही है, भारत-पाकिस्तान के बीच हॉकी के मैच में आज भी वही रोमांच था, 'खून और पानी आज भी साथ बह रहे हैं, पाकिस्तान से मोस्ट फेवरेबल नेशन का दर्जा छीने जाने पर हुए मीटिंग्स की फाइलों की ग्रह दशा बदल गई है। ले-दे कर बात यह है कि कूटनीति-सियासत और राष्ट्रवाद को एक ही डंडे से नहीं हांका जा सकता...।
गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016
शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016
असफाक और अदम...
‘जुबाने-हाल से अशफ़ाक़ की तुर्बत ये कहती है,
मुहिब्बाने-वतन ने क्यों हमें दिल से भुलाया है?
बहुत अफसोस होता है बडी़ तकलीफ होती है,
शहीद अशफ़ाक़ की तुर्बत है और धूपों का साया है।’
ऐसा होना नहीं चाहिए था, लेकिन अफ़सोस कि आज ये पंक्तियाँ सार्थक हो रही है। जिनके सुकर्मों और सीखों के ऊपर हमारे आज के सुखमय जीवन की बुनियाद खड़ी है, ऐसे दो महान लोगों का आज जन्मदिन है। लेकिन अपने और अपनों में ही मशगुल होकर हमने उन्हें भुला दिया। किसी शहीद और साहित्यकार की समाधी पर आवारा कुत्तों को भटकते देखते हैं तो उपर्युक्त पंक्तियों की सार्थकता हमें शर्म का अहसास कराती है। इत्तेफाक से आज एक जन्मदिन की शुभकामना के ट्वीट नोटिफिकेशन से ही नींद खुली। प्रधानमंत्री जी ने अपनी पार्टी के अध्यक्ष और अनन्य मित्र अमित शाह जी को जन्मदिन की बधाई दी थी। वैसे इसपर तो उनका सर्वाधिकार है कि वे क्या ट्वीट करें और किसे जन्मदिन की बधाई दें, लेकिन उन्होंने ही अपने एक मन की बात में कहा था, ‘अगर इतिहास से नाता टूट जाता है तो इतिहास बनने की संभावनाओं पर भी पूर्ण विराम लग जाता है।’ जिस इतिहास और उसे बनाने वाले जिन लोगों पर हमारे वर्तमान की बुनियाद टिकी है, उनके उल्लेख से दिन-ब-दिन हमारे समाज, सत्ता वर्ग और सियासत का दूर होना उस इतिहास बनने के पूर्ण विराम की तरफ ही इशारा कर रहा है। आज माँ भारती के उस वीर सपूत का जन्मदिन है, जिसने हमारे आज को खुशनुमा बनाने के लिए अपने वर्तमान के ऊपर दुखों का पहाड़ लाद लिया।
‘बहुत ही जल्द टूटेंगी गुलामी की ये जंजीरें,
किसी दिन देखना आजाद ये हिन्दोस्ताँ होगा।’
खुद की और देशप्रेम के दीवाने अपने दोस्तों की टोली की कुर्बानी की बदौलत अपनी ही पंक्तियों को सार्थक करने वाले उस वीर योद्धा का नाम है, ‘असफाक उल्ला खान।' आज जब हर दिन धार्मिक भावनाएं देश, कानून और संविधान पर हावी हो रही हैं, इस समय हमें असफाक उल्ला खान से प्रेरणा लेने की जरुरत है, जिन्होंने फांसी पर चढ़ने से पहले भारत को आजाद ना देख पाने का दुःख और अपने धार्मिक बंधन की बेबसी का जिक्र करते हुए लिखा कि,
‘जाऊँगा खाली हाथ मगर, यह दर्द साथ ही जायेगा,
जाने किस दिन हिन्दोस्तान, आजाद वतन कहलायेगा।
बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं, फिर आऊँगा-फिर आऊँगा,
ले नया जन्म ऐ भारत माँ! तुझको आजाद कराऊँगा।
जी करता है मैं भी कह दूँ, पर मजहब से बँध जाता हूँ,
मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कह पाता हूँ।
हाँ, खुदा अगर मिल गया कहीं, अपनी झोली फैला दूँगा,
औ' जन्नत के बदले उससे, यक नया जन्म ही माँगूँगा।’
आज उस कलम कुल के पुरोधा का भी जन्मदिन है जिनकी लेखनी ने हमेशा समाज और सियासत को रास्ता दिखलाया।
‘तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।’
विकास के झूठे आंकड़ों और जमीनी हकीकत में विभेद को दर्शाते हुए हुक्मरानों को ललकारने वाले इस कवि का नाम है, ‘अदम गोंडवी’ जी हाँ वही अदम गोंडवी जिन्होंने सियासत के चरित्र को हुबहू शब्दों में समेटते हुए लिखा,
जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे
कमीशन दो तो हिन्दोस्तान को नीलाम कर देंगे।’
आज जब वोट की राजनीति के लिए हिन्दू-मुसलमान भाईचारे के बीच दीवार खड़ीं की जा रही है इस समय इस कवि की कमी खल रही है जिन्होंने लिखा है,
‘हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये।
छेड़िए एक जंग मिलजुलकर गरीबी के खिलाफ,
दोस्त मेरे मजहबी नगमात को मत छेड़िए।’
मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016
सलाम... सदी के दो महानायकों को..
'जहाँ खड़े हो जाते हैं लाइन वही से शुरू होती है...' रील लाइफ में यह डायलॉग सिनेमाई महानायक की पहचान है, लेकिन इसे रियल में जिया है, सियासी और सामाजिक महानायक ने। इत्तेफाक से आज दोनों का जन्मदिन है। आजादी भारत में पहली बार जब अराजकता और अहंकार जनहित पर हावी होने लगा और सियासी नारों की गूंगी गुड़िया खुद को गणतंत्र का गनमैन समझने लगी तब भारत ने एक सियासी महानायक का उद्भव देखा। उनकी जिस आवाज ने कांग्रेस के कानों तक दस्तक दे कर उसे उसकी औकात से अवगत कराया, वह सिनेमाई महानायक द्वारा 'नमक हराम' में बोले गए इस डायलॉग जैसी ही थी कि 'है किसी माँ के लाल में हिम्मत जो मेरे सामने आए।' 70 के दशक का वह सियासी महानायक कांग्रेस के लिए कालिया भी था और काल भी। जेलर रूप में कांग्रेस की महारानी भले ही अपने सियासी अवसान की दस्तक को दबाने की कोशिश में लगी थीं, लेकिन उस महानायक की आवाज, कश्मीर से कन्याकुमारी और कोहिमा से कांडला तक को जम्हूरियत की अहमियत का अहसास करा रही थी। उम्र के अंतिम पड़ाव में भी जेल से उस महानायक ने जो हुंकार भरी उसकी गूंज जेलर रूपी 'सरकार' तक जिस रूप में पहुंची वह सिनेमाई महानायक की 'कालिया' की आवाज जैसी ही थी, 'आपने जेल की दीवारों और जंजीरों का लोहा देखा है, कालिया की हिम्मत का फौलाद नहीं देखा।' आखिरकार 1977 में उस सियासी महानायक के नेतृत्व में जम्हूरियत ने सत्ता और सियासत को खैरात समझने वालों की खैरियत बिगाड़ी। कांग्रेस को सत्ता से सड़क पर लाने वाले इस सियासी महानायक के देश के सर्वोच्च पद को अस्वीकार करने के बाद जो सन्देश कांग्रेस के कानों तक पहुंचाया, वह सिनेमाई महानायक के 'त्रिशूल' के इस डायलॉग जैसा ही था कि 'आज आपके पास आप की सारी दौलत सही, सब कुछ सही, लेकिन मैंने आपसे ज्यादा गरीब आज तक नहीं देखा।'
महानायकों की गौरव गाथा उनके नाम की मोहताज नहीं होती। जब तक सूरज-चांद रहेगा, सियासत जेपी और सिनेमा अमिताभ के नक्से कदम पर चलते रहेंगे...और हाँ, जेपी कभी मरते नहीं, अमर होते हैं।
सोमवार, 26 सितंबर 2016
देवानंद: एक दिलदार अदाकार
'कहते हैं इश्क नाम के गुजरे थे एक बुजुर्ग,
हम लोग भी मुरीद उसी सिलसिले में हैं।'
जिगर मुरादाबादी साहब की ये पंक्तियाँ अगर किसी एक शख्स पर सटीक बैठती है तो वो हैं, हिंदी सीने जगत के सदाबहार अभिनेता, प्यार, एहसास और रुमानियत की तस्वीर, आज के स्मार्टनेस को अपने समय में परिभाषा बना देने वाले दीवानगी की जीती जागती मिशाल, देवानंद साहब। बॉलीवुड के स्टार्स के लिए हम आज भी सुनते हैं कि उसकी अदा पर लडकियां मरती हैं। यहाँ मरना का मतलब दीवानगी होता है ना कि जान देना। दीवानगी में लड़कियों ने जान सिर्फ एक अदाकार के लिए दिया था जिसका नाम है देवानंद। कहा जाता है, देवानंद के व्हाइट शर्ट और ब्लैक कोर्ट पहनने पर कोर्ट ने रोक लगा दिया था, क्योंकि उन्हें इस ड्रेस में देख कर लड़कियां हद से ज्यादा क्रेजी हो जाया करती थीं। बहुत कम लोग होते हैं जिनकी माशुका प्यार के परवान नहीं चढ़ पाने पर भी खुद को अपने प्रेमी की यादों के हवाले कर देती है। देवानंद साहब उन खुशकिस्मत लोगों में से थे जिन्हें उस समय की सबसे खूबसूरत अदाकारा सुरैया का प्यार नसीब हुआ था पर अफ़सोस कि फ़िल्म 'किनारे किनारे' की शूटिंग से शुरू हुए इस प्यार की पतवार को मांझी नहीं मिल सका और यह मुहब्बत मजहब की भेंट चढ़ गई। लेकिन देवानंद को ना पाने के ग़म में सुरैया ने भी अपने को कमरे में कैद कर लिया और उसी दिन दुनिया के सामने आई जब जिंदगी को अलविदा कहा। हालाँकि सुरैया से बिछड़ने के बाद देवानंद की जिंदगी में आए सूनापन को दूर किया अभिनेत्री कल्पना कार्तिक ने, उनका हमसफ़र बनकर। उम्र के तीसरे पहर में देवानंद की जिंदगी में आई जीतन अमान। लेकिन प्यार में जमाने के हाथो शिकस्त पाए देवानंद को इस बार प्यार से ही हारना पड़ा और जीतन अमान ने उनकी चाहत को ठुकरा दिया। हालाँकि यह नाकाम इश्क दोस्ती में जरूर बदला। यह इत्तेफाक ही है कि करियर के शुरूआती दिनों से उम्र के अंतिम पड़ाव तक मुहब्बत के विभिन्न रूपों से रूबरू होने वाले हसीनाओं के सपनों के इस राजकुमार ने अपनी जिंदगी को पन्नों में समेटा तो उसे नाम भी दिया, 'रोमांसिंग विद लाइफ'। जिंदगी को रुमानियत का पर्याय बनाने वाले इस अभिनेता को जन्मदिन पर सलाम।
मंगलवार, 13 सितंबर 2016
आत्मसात करने से समृद्ध होगी हिंदी, आयोजन करने से नहीं
पिछले साल हिंदी दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने का मौका मिला था। आयोजकों ने एक चैनल के एंकर को हिंदी पर अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित किया था। एंकर महोदय ने माइक थामा, पर्चा निकाले और शुरू हो गए। बात खत्म करने के बाद 'Thanx' बोलकर सीढ़ियों की तरफ बढे। तभी शायद याद आया कि अरे आज तो हिंदी दिवस है, फिर मुड़े और माइक के पास जाकर बोले, 'Sorry...माफी चाहूंगा।' उसी दिन शाम में वही महोदय अपने चैनल पर औरंगजेब रोड वाले मुद्दे पर चर्चा में अशोक को बार-बार अशोका कह रहे थे।
हर साल हिंदी दिवस पर यही होता है, पूरे साल हिंदी पर अंग्रेजियत को थोपने वाले चंद लोगों को माइक पकड़ा दिया जाता है और वे भी जाते जाते 'Thanx-Sorry' बोल जाते हैं। गलती उनकी भी नहीं है, माहौल ही कुछ ऐसा तैयार हो रहा है कि हिंदी को पिछड़ेपन की निशानी बना दिया गया है। नई पीढ़ी की एक बड़ी आबादी का क, ख, ग, घ से कोई वास्ता नहीं है। उनके अक्षर पहचान का पैमाना ही A, B, C, D बन गया है। जो अखबार आज हिंदी दिवस के रंग में रंगे नजर आएंगे वे भी साल भर अंग्रेजियत को मजबूती प्रदान करते नजर आते हैं। उनकी नजर में आज की युवा पीढ़ी 'परिस्थिति' नहीं समझ सकती, उसके लिए उन्हें 'सिचुएशन' सटीक लगता है। जब ये ही ऐसे करेंगे तो कैसे समृद्ध होगी हिन्दी। जो हिंदी के मठाधीश हैं वे भी इसकी समृद्धि में बाधक बन बैठे हैं। अंग्रेजी के शब्दकोष में 80 प्रतिशत शब्द दूसरे शब्दों के हैं, जबकि हिंदी के शब्दकोष में आज भी उतने ही शब्द हैं जितने 50 साल पहले थे। हिंदी के वैयाकरण लोग दूसरी भाषा के शब्दों को हिंदी के लिए अछूत समझते हैं। इस मुद्दे पर इस बार के 'तहलका' में महशूर भाषाविद 'राजेंद्र प्रसाद सिंह' जी का बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख प्रकाशित हुआ है। आज तो पूरे दिन फेसबुक ट्विटर मैकाले के पत्र और भारतेंदु जी के श्लोक से भरा रहेंगे। मुझे 'शिवकुमार बिलग्रामी' जी की ये पंक्तियां याद आ रही हैं:
'धनवान भी इस देश में क्या क्रेज रखते हैं,
हिंदी सिखाने के लिए अंग्रेज रखते हैं।'
बुधवार, 31 अगस्त 2016
अमृता प्रीतम: जो अमर हैं शब्दों में
'उम्र की एक रात थी,
अरमान रह गए जागते,
किस्मत को निंद आ गई...।'
अमृता के अरमान साहिर और इमरोज की लेखनी में अमर हो गए और उनकी किस्मत का पाठ पूरी दुनिया पिंजर के पन्नों में कर रही है...।
साहित्य अकादमी, भारतीय ज्ञानपीठ, पद्मश्री और पद्म भुषण से सम्मानित एक जिंदादिल लेखिका अमृता प्रीतम का आज जन्मदिन है। अमृता प्रीतम ने प्रेम, रुहानियत के साथ-साथ विभाजन की त्रासदी, महिला उत्पीङन और समाज के अन्य अनछुए पहलुओ को अपनी रचनाओ में स्थान दिया ।
'साहित्य अकादमी का पुरस्कार पाने पहली महिला- अमृता प्रीतम' इसी रूप में अपना पहली बार 'अमृता प्रीतम' के नाम से परिचय हुआ था, विधासागर-सामान्य ज्ञान का रट्टा मारते हुए। जब कहानियों-कविताओं में रूचि जगी और अमृता प्रीतम को पढ़ा और जाना, तब पहली बार पता चला कि अमृता प्रीतम एक नाम नहीं खुद में एक दुनिया हैं...एक ऐसी दुनिया जिसमें शब्दों का संसार तो समाहित है ही, दो ऐसी शख्सियतें भी हैं, जिनके अक्स में उनसे ज्यादा अमृता शामिल हैं। अमृता ताउम्र साहिर में खुद को ढूंढती रहीं, पर पा ना सकीं और इमरोज, अमृता के बाद भी अमृता में जी रहे हैं। इमरोज ने लिखा भी है-
'उसने जिस्म छोड़ा है साथ नहीं,
वो अक्सर मिलती है,
कभी तारों की छांव में,
कभी बादलों की छांव में,
कभी किरणों की रोशनी में,
कभी ख्यालों के उजालों में...'
इमरोज से पहले अमृता का सुकून साहिर ही रहे, तभी तो शायद साहिर ने लिखा भी है-
'तेरे तड़प से न तड़पा था मेरा दिल,लेकिन
तेरे सुकून से बेचैन हो गया हूँ मैं।'
साहिर की बेचैनी को मिले सुधा मल्होत्रा के सहारे ने अमृता को किनारे कर दिया फिर अमृता को कंधा मिला इमरोज का। इमरोज एक ऐसा प्रेमी जिन्होंने अपनी प्रेमिका के पूर्व प्रेमी को भी अपनी पंक्तियों में शामिल किया, अदब के साथ। इसकी नजीर है ये पंक्तियां-
'वो नज़्म से बेहतर नज़्म तक पहुँच गया,
वो कविता से बेहतर कविता तक पहुँच गयी,
पर जिंदगी तक नहीं पहुंचे,
अगर जिंदगी तक पहुँचते,
तो साहिर की जिंदगी नज़्म बन जाती,
अमृता की जिंदगी कविता बन जाती...।'
मंगलवार, 30 अगस्त 2016
सीट पकड़ प्रतियोगिता
मेट्रो में खाली सीट देखते ही दौड़ लगाने वालों के लिए भी ओलंपिक में एक खेल होना चाहिए, 'सीट पकड़ दौड़'...अरे भाई जब कोच एमएसजी (बाबा राम रहीम) 'रुमाल छू' के जरिए पदक का ख़्वाब देख सकते हैं तो मंगू सिंह क्यों पीछे रहें...इसमें पदक मिलने का पूरा चांस भी है क्योंकि बाकी देश वाले पूरी ताकत के साथ ही दौड़ेंगे, उन्हें तो पता भी नहीं होगा कि सीट छेंकना किसे कहते हैं...हमारी तरह बैग फेंक के सीट हथियाना उन्होंने तो सपनों में भी नहीं सोचा होगा...और अगर खेल में महिलाओं की भी एंट्री रही तब तो भैया...एक बार में 2 ठो पदक पक्का...हम बताते हैं कइसे...'मेट्रो में आपने नहीं देखा कइसे मैडम जी लोग सीट हंथियाने के बाद बगल वाले से मुस्कुरा के बोलती हैं, भैया थोड़ा सा खिसकेंगे...भैया तो जैसे पहिले से तैयार रहते हैं, दांत चियारे जाने के बाद दीवाल ढाहने वाले अंदाज में बगल वाले को धकियाते हैं... और फिर...'बाबू', आओ ना बैठ जाओ...बाबू भी मुंडी नीचे किए हुए तशरीफ़ रखते हैं...' बुझ गए न...लेकिन इसमें एक खतरा है...अगर मैडम जी द्वारा जीते गए सीट के बगल में कोई मुझ जैसा कोई हुआ तो मैडम जी की सीट भी जब्त कर ली जाएगी...
सदस्यता लें
संदेश (Atom)