मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

बदरंग सियासी चेहरा और स्वतंत्रता की सार्थकता

श्री श्री 1008 श्री देशभक्त महोदय जी, व्यवस्था के विरोध को देशद्रोह नहीं कहते हैं और ना ही अभिव्यक्ति की आजादी को राष्ट्रवाद का हनन। सोशल मीडिया पर ज्ञान बघारने से पहले राष्ट्रवाद-राष्ट्रद्रोही और देशभक्त-देशविरोधी की असली परिभाषा पढ़ लीजिए। एक लड़की के उन्मुक्त विचारों से आपकी संप्रभुता हिल गई, लेकिन इस व्यवस्था की उस पुलिस पर प्रश्न आपको राष्ट्रद्रोह लगता है, जो बस्तर के जंगलों में आदिवासी महिलाओं के स्तन से दूध निकाल कर चाय पीती है। थोड़ा सोचिए उनके बारे में क्या वे आजाद हैं? छपरा में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ने के बाद एक घण्टे के लिए इंटरनेट बंद होता है, तो लोग जिला पदाधिकारी को घेर के गरियाने लगते हैं, लेकिन कश्मीर का युवा साल के 365 में से 300 दिन बिना इंटरनेट के संगीनों के साए में गुजारता है। हम फिर भी गर्व से इन दोनों को अखंड भारत का अभिन्न हिस्सा कहते हैं, लेकिन क्या हमारी सरकार और हमारी व्यवस्था ने इन्हें 'आजाद भारतीय' बनाने पर कभी ध्यान दिया है?
कल यूपी में रैली करते हुए मोदी जी ने भारत की उस दयनीय दशा की ओर ध्यान दिलाया, जहाँ लोग आज भी मवेशियों के गोबर को सुखाकर उसमें से अन्न का दाना निकालकर भोजन करते हैं। यह सच है कि भारत की ये दशा कांग्रेसियों के लिए शर्म से डूब मरने की स्थिति है, लेकिन प्रधानमंत्री जी जिस जमीन पर खड़े होकर कांग्रेस के कुकर्मों का पाठ कर रहे थे, उस जमीन पर दो दिन पहले तक गेंहू की हरी फसल लहलहा रही थी, जिसे रैली के लिए काट दिया गया और कई किसानों को पैसे भी नहीं मिले। शर्मिंदगी की हद देखिए कि एक तरफ जहां, किसान उन बर्बाद फसलों के लिए तो रहे थे वहीं स्थानीय भाजपा उम्मीदवार सीना तान के बोल रहे थे कि इस देश का किसान प्रधानमंत्री जी से बेहद मोहब्बत करता है और उनके लिए ख़ुशी ख़ुशी अपनी फसल कुर्बान का सकता है। वाह रे सियासत और वाह रे सियासतदां। बात भाजपा या मोदी विरोध की नहीं है, बात है उस व्यवस्था और उस सियासी मानसिकता के विरोध की जो लटीयन की दिल्ली को पूरे देश की हकीकत समझ लेता है और इस सोशल मीडिया के जमाने में जिसके भाड़े के टट्टू सवाल उठाने वाले को देशद्रोही करार देते हैं। मैं ना तो वामपंथ का पैरोकार हूँ और ना ही फर्जी राष्ट्रवादी गैंग का सदस्य, लेकिन मुद्दा आधारित राजनीति के सार्थक विरासत वाली भारतीय सियासत की धारणाओं में कैद होकर कठपुतली बनते देखना दुखद है। आजाद भारत में अभिव्यक्ति की आजादी और छात्र राजनीति का एक सार्थक इतिहास रहा है, लेकिन हाल के दिनों में इन दोनों की आड़ में जिस तरह से सियासी रोटियां सेंकी जा रही है, उसे किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता।

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

बचपन वाली सरस्वती पूजा

ऐसे तो उससे पहले वाले साल हमने 'फोटो' पर पूजा किया था, हालांकि पंडाल तब भी बना था, वह भी बाजाब्ता बांस का, चमकीली साड़ियों से सजा के। लेकिन उस साल उमंग उत्साह और जिम्मेदारी कुछ ज्यादा इसलिए थी क्योंकि हम पहली बार मूर्ति रख के पूजा करने जा रहे थे। किसी भी तरह जतन प्रयास कर के लगभग 600 रुपए इकट्ठा हुए थे। तब हमारे लिए यह एक बड़ी रकम थी, खजांची मैं ही था, वह भी एक जिम्मेदार खजांची। इसलिए लगभग हर एक घण्टे में जब तक डिब्बा खोल के पूरा पैसा गिन न लेता, चैन नहीं मिलता। हालांकि खजांची की वह जिम्मेदारी बड़े प्रयासों के बाद मिली थी। तब का नियम यही कहता था कि जो पूजा पर बैठेगा वह पैसा नहीं रखेगा। यानी जिम्मेदारी बराबर-बराबर। लेकिन इसके लिए सबके बीच कई स्तरों पर समझौता हुआ, फिर जिम्मेदारियों का निर्धारण।
खैर, पैसे इकट्ठा होने से पहले ही मूर्ति का बयाना हो चुका था। कुल 225 रुपए की माँ सरस्वती की मूर्ति के लिए शायद हमने 35-45 रुपए का एडवांस दिया था। खुद्दारी और आत्मविश्वास की वैसी मिसाल खुद में दोबारा शायद ही कभी देखने को मिली। उस समय 225 रुपए की उस मूर्ति का वजन भी हम जैसों के लिए बहुत भारी था। लेकिन फिर भी हम बड़ों की सहायता ठुकरा कर, मेरी 20 नंबर वाली साइकिल पर मूर्ति लाने के विश्वास से सिकटा के लिए निकल पड़े। मूर्ति के कारीगर को पैसा भुगतान करने के बाद साइकल के 'किलियर' पर मूर्ति रख के आगे बढ़े। उस समय हम चार लोगों में सबसे 'बलवान' दिब्यप्रकाश जी स्टेयरिंग संभाले हुए थे। लेकिन कुछ ही दूर चलने के बाद अहसास हुआ कि साइकल पर मूर्ति ले जाने की यह कोशिश कलश स्थापना से पहले ही विसर्जन करा देगी। फिर सचिन जी किसी हृष्ट पुष्ट आदमी की खोज में निकले, जो किसी तरह से रेलवे लाइन पार करा दे। फिर गांव के एक अन्य आदमी की सहायता से माँ सरस्वती सकुशल रेलवे लाइन पार कर टांगा वाले के पास पहुंचीं। फिर उसके बाद टांगा पर मूर्ति रखकर हम घर पहूंचे। तब गांव में बिजली थी नहीं, तो बल्ब जलाने और स्पीकर बजाने के लिए हमने घर में टीवी चलाने वाली बैट्री के अलावा भाड़े की बैट्री की भी व्यवस्था की थी। इलेक्ट्रॉनिक विभाग बखूबी संभाला था नीरज जी ने। खुरमा और गाजर, कोन, बैर सहित मौसमी फलों वाले प्रसाद के साथ, सकुशल मूर्ति लाकर भव्य पंडाल में अच्छी तरह से पूजा संपन्न करने के हम जैसे 'छोटे बच्चों' के कारनामों की खूब प्रशंसा भी हुई। हालांकि विसर्जन के समय हमने बड़े लोगों का सहारा लिया था।
उसके अगले साल भी हमने मूर्ति लाकर पूजा की। लेकिन इस साल हमने साइकल वाला रिस्क नहीं लिया और माँ सरस्वती टायर (बॉलगाड़ी) से आईं। इस साल बजट कुछ ज्यादा था। आजकल जैसे अलग अलग चैनल अपने चुनाव पूर्व सर्वे पर चर्चा के लिए पहले से ही पार्टी प्रवक्ताओं और विशेषज्ञों को बुक कर लेते हैं, वैसा ही कुछ पूजा के समय पंडित जी लोगों की बुकिंग होती है। हमारे पुरोहित महाशय को पूजा के समय कोई और बुला ले गए, अपना पूजा करवाने। फिर हमें एक 'कामचलाऊ' पंडित जी का सहारा लेना पड़ा। हालांकि सुबह विसर्जन के समय हमारे पुरोहित जी पधारे और जाते हुए सब समेट गए, उस पंडित जी के लिए कुछ नहीं छोड़ा जो सुबह में पूजा कराए थे। अब भी जब कभी वे सुबह वाले पंडित जी मिलते हैं, तो कहते हैं- 'रे हमार दछिनवा (दक्षिणा) ना नु देहलs सन।' वैसे उस साल हमने लाउडस्पीकर का भी बंदोबस्त किया था और उस पर केवल और केवल भजन और आरती बजा, एक भी फ़िल्मी और तड़क-भड़क वाला गीत नहीं। शाम में हमने गांव की कीर्तन मंडली से कीर्तन भी कराया। मतलब कुल मिलाकर पूजा विशुद्ध रूप से सात्विक रही। वैसे, उस साल भी विसर्जन के लिए दूसरों का सहारा लेना पड़ा, हम पानी में नहीं उतरे।
उसके बाद सिकटा मिडिल स्कूल में पढ़ते हुए भी एक साल स्कूल की पूजा में व्यवस्था और प्रबंधन संभालने का मौका मिला था। तब तो हम माँ सरस्वती की मूर्ति के लिए नरकटियागंज तक गए थे। वह मेरी पहली नरकटियागंज यात्रा थी, वह भी ट्रेन से। जाते हुए सबने कहा था, अरे टिकट क्या होगा 'अपना इलाका' है सब। बस, हम भी सवार हो गए ट्रेन में। नरकटियागंज स्टेशन पहुंचने से पहले ही सिग्नल पर किसी ने शोर मचा दिया, मजिस्ट्रेट चेकिंग हो रही है। फिर सब चलती ट्रेन से कूद कर फरार हुए। हालांकि उस डर का अहसास, उसके बाद बस में भी बिना टिकट यात्रा नहीं करने देता है। खैर, स्कूल की वह पूजा भी स्मरणीय रही। मन है, फिर से एक बार गांव के उस सरस्वती पूजा को जीने का, जिसमे ना कोई आडंबर था, ना बेहतर होने की होड़... माँ सरस्वती से मांग भी मासूमियत भरी। एक वो सरस्वती पूजा थी, जब माँ सरस्वती के सामने जमीन पर सर रखकर सोचा करते थे कि क्या मांगे माँ से, और एक आज है कि ऑफिस के लिए निकलने की जल्दी में बंद आंखे और जुड़े हाथ 'या कुन्देन्दुत सार हार धवला... के जाप और जय माँ सरस्वती' से आगे कुछ सोच ही नहीं पाए...

रविवार, 11 दिसंबर 2016

जनता फिर भी 'लाइन' में है...

'एक चुटकी भर चांदनी, एक चुटकी भर शाम,
वर्षों से सपने यही देखे यहां अवाम...।'

वादों की बलिवेदी पर बदलते इरादे देखना शायद भारतीय जनता की बदकिस्मती ही है और उसी बदकिस्मती को बयां करती है 'दिनेश शक्ल' की ये पंक्तियां। संसद का पूरा शीत सत्र हो-हल्ले की भेंट चढ़ गया। दोनों मुख्य राजनीतिक दल इसके लिए बराबर के जिम्मदार हैं। लेकिन उधर राहुल कहते हैं कि मुझे नहीं बोलने दिया जा रहा और इधर मोदी कहते हैं कि मुझे नहीं बोलने दिया जा रहा। ऐसा हो ही नहीं सकता कि राहुल की बात यूपीए का कोई नेता नहीं माने या मोदी का आदेश मानने से एनडीए का कोई नेता मुकर जाए। लेकिन दोनों जनता के सामने घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। अब होगा यही कि संसद सत्र के अंतिम दिनों में मोदी 'लाजवाब' भाषण देंगे और सत्ता पक्ष के साथ-साथ जनता भी झूम उठेगी। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक सदन में पीएम का भाषण चर्चा का विषय बन जाएगा। सब यही कहेंगे, वाह क्या बोला है, धो डाला... पर विपक्ष फिर भी सवालों के जवाब के लिए हो हल्ला मचाएगा लेकिन जनता को यह जवाब कोई नहीं देगा कि आखिर क्यों संसद सत्र में लगने वाली जनता के खून पसीने की कमाई शोर-शराबे और आरोपों-प्रत्यारोपों की भेंट चढ़ गई। अफ़सोस कि जनता आज नागरिक से ज्यादा समर्थक और विरोधी की भूमिका में आ गई है। तमाम असुविधाओं के बावजूद उसे अपने 'प्रिय' नेता के दर्शन और समर्थन के लिए 'लाइन' लगना मंजूर है... 


'भोर था प्यार अब दोपहर हो गया,
स्वप्न का हर भंवर खंडहर हो गया,
तुम संवरती-संवरती हुईं सैफई,
मैं उजड़ कर मुजफ्फरनगर हो गया।'

हर बार दिखाए जाने वाले सियासी सपने कुछ समय बाद किस तरह से केवल सपने भर बन कर रह जाते हैं और सैफई का विकास मॉडल किस तरह से पूरे सूबे की दुर्दशा के लिए एक मजाक है, इसे कवि 'प्रियांशु गजेंद्र' की इन पंक्तियों से भी समझा जा सकता है। लोहिया और चरण सिंह के बाद जब मुलायम सिंह समाजवादी खेमे के अगुआ के रूप से आगे आए, तो जनता में एक आस जगी कि अखाड़े का यह पहलवान जनता के हक़ के लिए लड़ेगा। यह 'नेता' लोहिया और चौधरी जी के समाजवाद के सपने को जिवंत करेगा। पर अफ़सोस कि समाजवाद परिवारवाद का रास्ता और विलासिता का साधन बन गया। हाल में जब समाजवादी पार्ट के नए खेवैया ने समाजवाद की जातिगत राजनीति और गुंडागर्दी वाली सियासी पहचान को सार्वजनिक रूप से ललकारा और विकास के समाजवादी मॉडल के सहारे आगे बढ़ने की बात कही, तब लगा कि 'नेता का बेटा' हाशिए पर पड़े लोगों के हौसलों को उड़ान देगा। लेकिन आज जब पता चला कि समाजवाद के सियासी सूरमाओं ने फिर से मुख्तार अंसारी जैसे गुंडे के आगे घुटने टेक दिए और उसके हत्यारे भाई को बांदा से टिकट दे दिया गया तो यह सपना फिर से भरभरा गया कि देश को दिशा देने वाली यूपी की सियासत में सूचिता लौटेगी। जनता तब भी समाजवाद की हकीकत से रूबरू हुई थी, जब मुजफ्फरनगर में सैकड़ों लोग खुले आसमान के नीचे ठंढ में ठिठुरते रहे थे और समाजवाद के पहरुआ सैफई में हीटर के बीच बॉलीवुड की बालाओं के साथ झूम रहे थे और जनता आज भी इनकी असलियत देख रही है, लेकिन इन सब के बावजूद आज भी अपने समाजवादी नेताओं के एक दीदार के लिए यूपी की बड़ी आबादी 'लाइन' लगने को तैयार है...

'जिसे मैंने सुबह समझ लिया,
कहीं वो भी शाम-ए-अलम ना हो।'

मुमताज नसीम के इस शेर को आज बिहार सरकार के प्रति पिछड़ों और वंचितों के विचार से जोड़कर देखा जा सकता है। 2005 में जब लालू के जंगल राज को जड़ से खत्म करने के मंसूबे के साथ नीतीश कुमार ने ऐलान किया कि 'वही पुलिस गोली चलाएगी' तो जनता को भयाक्रान्त माहौल से छुटकारा मिला। बिहार की जनता को लगभग एक दशक तक सुशासन की जो सौगात मिली उसी का प्रतिफल था कि बिहार की बिगड़ी पहचान के सर्जग और जंगल राज के प्रतीक लालू यादव के साथ नीतीश के  हाथ मिलाने को भी जनता ने कबूल किया और कभी चिर विरोधी रहे लालू-नीतीश को सर आंखों पर बिठाया। इस जीत से सबसे ज्यादा जो समुदाय या वर्ग खुश हुआ वह था हाशिए पर पड़ा पिछड़ा वर्ग। क्योंकि लालू किसी समय उनकी आवाज हुआ करते थे और नीतीश ने उन्हें 'गर्त' से उबारा था। अब उन्हें सपना दिखाया गया था समाज की पहली पंक्ति में कदमताल करते हुए चलने का। लेकिन दो दिन पहले भागलपुर में जो हुआ उसने ना सिर्फ उन सपनों का गला घोंटा बल्कि सरकार के इकबाल पर भी सवालिया निशान लगा दिया।  अपने आशियाने के सपने को पूरा होते देखने की आस में डीएम ऑफिस के सामने आवाज उठा रही औरतों को जिस बेरहमी और बेशर्मी से मारा गया वह निहायत ही कायरता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि ऐसी घटना नीतीश सरकार में पहली बार हुई है, पहले भी दलितों-औरतों पर लाठियां बरसाई जाती रही है। लेकिन जनता सब भूलकर फिर नीतीश को अपना 'नेता' मान लेती है। अब भी वही होगा, निश्चय यात्रा और नीतीश की अन्य यात्राओं में भी वही जनता फिर से भीड़ जुटाने के लिए 'लाइन' में लगेगी... लब्बोलुबाव यह कि हर बार की सियासी बेवफाई भी जनता को वफ़ा से नाउम्मीद नहीं करती और चोट खाने के बाद भी लोग फिर से उसी आशा, आकांक्षा और उत्साह से 'लाइन' में खड़े हो जाते हैं...

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

6 दिसम्बर: स्तंभों के ढहने और जनता के बिलखने का दिन...

वह 6 दिसम्बर ही था जब नियति ने उन लाखों लोगों को स्तंभहिन कर दिया जिनको आम्बेडकर ने सर उठा कर जीने की ताकत दी... वह 6 दिसम्बर ही था जब एक स्तंभ का गुंबज गिरते ही धर्मनिरपेक्ष भारत की बंधुता धाराशायी हो गई थी... वह 6 दिसम्बर का सूर्य ही था जिसने विश्व जगत को यह मनहूस खबर दी कि लाखों लोगों के लिए स्तंभ, वह मंडेला नहीं रहे जिनके शब्दों ने ना सिर्फ अफ़्रीका बल्कि पूरे विश्व को अपने हक़ के लिए लड़ना सिखाया... और आज भी 6 दिसम्बर ही है जब तमिलनाडु के लाखों लोग अपने सियासी व सामाजिक स्तंभ 'अम्मा'  के लिए बिलख रहे हैं... उस अम्मा के लिए आज देश आंसुओं में डूबा है, जिन्होंने जनता को अपना समझकर जननेता  की एक नई परिभाषा गढ़ी... अभी 'आज तक' पर जयललिता के साथ प्रभु चावला के पुराने 'सीधी बात' कार्यक्रम का प्रसारण हो रहा है... जयललिता बोल रही हैं, 'राजनीति नहीं प्रजा मेरा परिवार है, एआईडीएमके के लाखों कार्यकर्ता मेरा परिवार हैं'... आज यह बात सच साबित हो रही है... खैर, एक बहुत पुराना टीवी विज्ञापन याद आ रहा है-
'जाने वाले तो एक दिन चले जाते हैं,
सिर्फ यादें ही अपनी वो दे जाते हैं,
नाम उनके स्मारक बनाते रहें,
उनकी यादों को यूं ही सजाते रहें...'

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

राष्ट्रहित में राष्ट्रवाद का पेंच

पिछले दिनों पीटीआई ने खबर दी कि 'प्रधानमंत्री जी की तरफ से ऐसी कोई अपील नहीं है कि दिवाली पर केवल भारत में बनी वस्तुएं ही खरीदें।' बात भी सही है। माना कि देश में बने उत्पादों का उपभोग स्वाभिमान के साथ विकास का सूचक है। लेकिन राष्ट्रवाद की अंधी दौड़ में आप वैश्वीकरण को झुठला नहीं सकते। जिस समय भारत में चीन में बनी फुलझड़ियाँ, जो फ्यूज हो चुकी थीं और मोबाइल के फ्लिप कवर और स्क्रीन गार्ड में आग लगा कर भारत प्रेम की ज्वाला जगाई जा रही थी, उसी समय 20 अक्टूबर को भारतीय सैनिक, चीनी सैनिकों के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास कर रहे थे। जिस चीन ने 54 साल पहले छल से हमारी संप्रभुता पर चोट की और आज हमारे पड़ोसी को हथियार मुहैया करा रहा है, उसके साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास जायज है, उसके पैसे से मोदी जी की महत्वाकांक्षी योजना, स्मार्ट सिटी को संजीवनी मिले यह जायज है, उसके पैसे से भारत की जीडीपी में उछाल लाया जाए यह जायज है, लेकिन उसकी बाजार से कुछ छोटे-मोटे सामान खरीद कर भारत में अपनी रोजी-रोटी चलाना नाजायज है... वाह रे देशभक्ति और वाह रे बुद्धिमता... और हाँ, जिस इनडायरेक्ट रिलेशन से हम पाकिस्तान से होते हुए चीन विरोध तक पहुंचे हैं, उस डायरेक्ट रिलेशन वाले पाकिस्तान से हिंदुस्तान की कथित 'दुश्मनी' की भी कहानी सुनिए... जिस समय उड़ी हमला हुआ उस समय भी और जिस समय सर्जिकल स्ट्राइक हुआ उस समय भी और आज भी अटारी बॉर्डर, अमन सेतु, सदा-ए-सरहद, या चकन-दे-बाग से हजारों बस और ट्रक आ-जा चुके हैं, समझौता एक्सप्रेस उसी रफ्तार से दौड़ रही है, भारत-पाकिस्तान के बीच हॉकी के मैच में आज भी वही रोमांच था, 'खून और पानी आज भी साथ बह रहे हैं, पाकिस्तान से मोस्ट फेवरेबल नेशन का दर्जा छीने जाने पर हुए मीटिंग्स की फाइलों की ग्रह दशा बदल गई है। ले-दे कर बात यह है कि कूटनीति-सियासत और राष्ट्रवाद को एक ही डंडे से नहीं हांका जा सकता...। 

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

असफाक और अदम...

जुबाने-हाल से अशफ़ाक़ की तुर्बत ये कहती है,
मुहिब्बाने-वतन ने क्यों हमें दिल से भुलाया है?
बहुत अफसोस होता है बडी़ तकलीफ होती है,
शहीद अशफ़ाक़ की तुर्बत है और धूपों का साया है।’

ऐसा होना नहीं चाहिए था, लेकिन अफ़सोस कि आज ये पंक्तियाँ सार्थक हो रही है। जिनके सुकर्मों और सीखों के ऊपर हमारे आज के सुखमय जीवन की बुनियाद खड़ी है, ऐसे दो महान लोगों का आज जन्मदिन है। लेकिन अपने और अपनों में ही मशगुल होकर हमने उन्हें भुला दिया। किसी शहीद और साहित्यकार की समाधी पर आवारा कुत्तों को भटकते देखते हैं तो उपर्युक्त पंक्तियों की सार्थकता हमें शर्म का अहसास कराती है। इत्तेफाक से आज एक जन्मदिन की शुभकामना के ट्वीट नोटिफिकेशन से ही नींद खुली। प्रधानमंत्री जी ने अपनी पार्टी के अध्यक्ष और अनन्य मित्र अमित शाह जी को जन्मदिन की बधाई दी थी। वैसे इसपर तो उनका सर्वाधिकार है कि वे क्या ट्वीट करें और किसे जन्मदिन की बधाई दें, लेकिन उन्होंने ही अपने एक मन की बात में कहा था, ‘अगर इतिहास से नाता टूट जाता है तो इतिहास बनने की संभावनाओं पर भी पूर्ण विराम लग जाता है।’ जिस इतिहास और उसे बनाने वाले जिन लोगों पर हमारे वर्तमान की बुनियाद टिकी है, उनके उल्लेख से दिन-ब-दिन हमारे समाज, सत्ता वर्ग और सियासत का दूर होना उस इतिहास बनने के पूर्ण विराम की तरफ ही इशारा कर रहा है। आज माँ भारती के उस वीर सपूत का जन्मदिन है, जिसने हमारे आज को खुशनुमा बनाने के लिए अपने वर्तमान के ऊपर दुखों का पहाड़ लाद लिया।

‘बहुत ही जल्द टूटेंगी गुलामी की ये जंजीरें,
किसी दिन देखना आजाद ये हिन्दोस्ताँ होगा।’

खुद की और देशप्रेम के दीवाने अपने दोस्तों की टोली की कुर्बानी की बदौलत अपनी ही पंक्तियों को सार्थक करने वाले उस वीर योद्धा का नाम है, ‘असफाक उल्ला खान।' आज जब हर दिन धार्मिक भावनाएं देश, कानून और संविधान पर हावी हो रही हैं, इस समय हमें असफाक उल्ला खान से प्रेरणा लेने की जरुरत है, जिन्होंने फांसी पर चढ़ने से पहले भारत को आजाद ना देख पाने का दुःख और अपने धार्मिक बंधन की बेबसी का जिक्र करते हुए लिखा कि,

‘जाऊँगा खाली हाथ मगर, यह दर्द साथ ही जायेगा,
जाने किस दिन हिन्दोस्तान, आजाद वतन कहलायेगा।
बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं, फिर आऊँगा-फिर आऊँगा,
 ले नया जन्म ऐ भारत माँ! तुझको आजाद कराऊँगा।
जी करता है मैं भी कह दूँ, पर मजहब से बँध जाता हूँ,
मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कह पाता हूँ।
हाँ, खुदा अगर मिल गया कहीं, अपनी झोली फैला दूँगा,
औ' जन्नत के बदले उससे, यक नया जन्म ही माँगूँगा।’

आज उस कलम कुल के पुरोधा का भी जन्मदिन है जिनकी लेखनी ने हमेशा समाज और सियासत को रास्ता दिखलाया।

‘तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।’

विकास के झूठे आंकड़ों और जमीनी हकीकत में विभेद को दर्शाते हुए हुक्मरानों को ललकारने वाले इस कवि का नाम है, ‘अदम गोंडवी’ जी हाँ वही अदम गोंडवी जिन्होंने सियासत के चरित्र को हुबहू शब्दों में समेटते हुए लिखा,

जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे
कमीशन दो तो हिन्दोस्तान को नीलाम कर देंगे।’

आज जब वोट की राजनीति के लिए हिन्दू-मुसलमान भाईचारे के बीच दीवार खड़ीं की जा रही है इस समय इस कवि की कमी खल रही है जिन्होंने लिखा है,

‘हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये।
छेड़िए एक जंग मिलजुलकर गरीबी के खिलाफ,
दोस्त मेरे मजहबी नगमात को मत छेड़िए।’


मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

सलाम... सदी के दो महानायकों को..

'जहाँ खड़े हो जाते हैं लाइन वही से शुरू होती है...' रील लाइफ में यह डायलॉग सिनेमाई महानायक की पहचान है, लेकिन इसे रियल में जिया है, सियासी और सामाजिक महानायक ने। इत्तेफाक से आज दोनों का जन्मदिन है। आजादी भारत में पहली बार जब अराजकता और अहंकार जनहित पर हावी होने लगा और सियासी नारों की गूंगी गुड़िया खुद को गणतंत्र का गनमैन समझने लगी तब भारत ने एक सियासी महानायक का उद्भव देखा। उनकी जिस आवाज ने कांग्रेस के कानों तक दस्तक दे कर उसे उसकी औकात से अवगत कराया, वह सिनेमाई महानायक द्वारा 'नमक हराम' में बोले गए इस डायलॉग जैसी ही थी कि 'है किसी माँ के लाल में हिम्मत जो मेरे सामने आए।' 70 के दशक का वह सियासी महानायक कांग्रेस के लिए कालिया भी था और काल भी। जेलर  रूप में कांग्रेस की महारानी भले ही अपने सियासी अवसान की दस्तक को दबाने की कोशिश में लगी थीं, लेकिन उस महानायक की आवाज, कश्मीर से कन्याकुमारी और कोहिमा से कांडला तक को जम्हूरियत की अहमियत का अहसास करा रही थी। उम्र के अंतिम पड़ाव में भी जेल से उस महानायक ने जो हुंकार भरी उसकी गूंज जेलर रूपी 'सरकार' तक जिस रूप में पहुंची वह सिनेमाई महानायक की 'कालिया' की आवाज जैसी ही थी, 'आपने जेल की दीवारों और जंजीरों का लोहा देखा है, कालिया की हिम्मत का फौलाद नहीं देखा।' आखिरकार 1977 में उस सियासी महानायक के नेतृत्व में जम्हूरियत ने सत्ता और सियासत को खैरात समझने वालों की खैरियत बिगाड़ी। कांग्रेस को सत्ता से सड़क पर लाने वाले इस सियासी महानायक के देश के सर्वोच्च पद को अस्वीकार करने के बाद जो सन्देश कांग्रेस के कानों तक पहुंचाया, वह सिनेमाई महानायक के  'त्रिशूल' के इस डायलॉग जैसा ही था कि 'आज आपके पास आप की सारी दौलत सही, सब कुछ सही, लेकिन मैंने आपसे ज्यादा गरीब आज तक नहीं देखा।'
महानायकों की गौरव गाथा उनके नाम की मोहताज नहीं होती। जब तक सूरज-चांद रहेगा, सियासत जेपी और सिनेमा अमिताभ के नक्से कदम पर चलते रहेंगे...और हाँ, जेपी कभी मरते नहीं, अमर होते हैं।