बुधवार, 10 मई 2017

एक शायर जो हमारी आवाज़ में अमर है...

'पेड़ को काटने वालों को ये मालूम तो था,
जिस्म जल जाएंगे जब सर पे न साया होगा…’

वर्तमान समय के सबसे ज्वलंत मुद्दे को बहुत पहले शायरी में समेट कर जिस शायर ने समाज को सबक सिखाने का काम किया था उसकी मुहब्बत की पंक्तियां आज भी राह चलते लोगों को गुनगुनाते हुए सुनी जा सकती है... सामने वाले के चेहरे की बनावटी हंसी को देखकर आज भी अनायास ही यह गीत होठों पर आ जाता है कि
'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो...'

मिले या बिछड़े हुए, बिछड़ते बिछड़ते मिले हुए या मिलते मिलते बिछड़ चुके किसी हमसफ़र की याद इस 20वी सदी में भी 19वी सदी के इस गीत को ही अपना अपना गंतव्य बनाती है कि,
'चलते-चलते यूं ही कोई मिल गया था,
सरे राह चलते-चलते...
वहीं थम के रह गई है, मेरी रात ढलते-ढलते...'

आज आजादी की पहली जंग की सालगिरह है...जी हां, आज ही के दिन 1857 में फिरंगियों से भारत की आजादी की आवाज बुलंद हुई थी, जिसकी परिणति ने हमें स्वतंत्रता की आबो हवा में सांस लेने की सौगात दी. लेकिन जिन कुर्बानियों की बदौलत हमने स्वतंत्रता पाई उनके लिए नतमस्तक कर देता है उसी गीतकार का यह गीतः 
'कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों...’

जिस लिखनी से मातृभूमि के दीवानों का देशवासियों के लिए यह पैग़ाम निकला उसी लेखनी से उन दीवानों के दिल की आवाज भी निकली है, जिनकी सार्थकता को आज भी लोग जीते हैंः 
'कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों हैं?
वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों हैं?
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों हैं?
यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों हैं?'

शायरी को दीवानों के दिल से निकला प्रश्न बनाने वाले इस शायर की इन पंक्तियों से भी आप शायद ही अनभिज्ञ होंगे कि,
'झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं...'

प्रवास हर समय में समाज की एक पीड़ा रही है और शायर, कवि, गीतकार की तत्कालीन समय में सार्थकता यही है कि वह उस समय के दुःखों, तकलीफों को आवाज दे. दूर रहकर अपनी जमीन को याद करने वालों की ख्वाहिश ये पंक्तियां बखूबी समेटे हुए हैं कि,
'वो कभी धूप कभी छांव लगे,
मुझे क्या-क्या न मेरा गांव लगे,
किसी पीपल के तले जा बैठे
अब भी अपना जो कोई दांव लगे'

वक्त के हंसी सितम से खुद को और 'उनको' बदलने के भाव को बयां करने वाले उस महान शायर को अब तक आप पहचान ही गए होंगे, फिर भी मैं बता देता हूं. समाज, सियासत और मोहब्बत, तीनों को अपनी लेखनी से बयां करने वाले मशहूर शायर 'कैफ़ी आज़मी' की आज पुण्यतिथि है. उसी कैफ़ी आज़मी की, जिन्होंने हिंदी सीने जगत को 'शबाना आज़मी' जैसी अदाकारा दी और जो अपनी ही इन पंक्तियों को चरितार्थ कर गए कि
'इंसां की ख्वाहिशों की कोई इन्तहां नहीं
दो गज़ ज़मीन चाहिए, दो गज़ कफ़न के बाद'
आज ही के दिन यानी 10 मई को आज से 7 साल पहले यह मशहूर शायर, कवि, और गीतकार यह गुनगुनाते हुए हमसे रुखसत हो गया कि,
'ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं...'
लेकिन अब भी...
'जरा-सी आहट होती है तो दिल सोचता है
कहीं ये वो तो नहीं, कहीं ये वो तो नहीं...'

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

कश्मीर को बुखार नहीं जख्म की दवा चाहिए

किसी जख्म के कारण अगर बुखार हो जाता है, तो डॉक्टर बुखार की बजाय जख्म ठीक करने की दवा देता है। जख्म ठीक होने के बाद बुखार खुद-ब-खुद ठीक हो जाता है। अफसोस कि दिल्ली में रायसीना की पहाड़ियों पर बैठने वाले हर किसी ने कश्मीर को हमेशा से डायरेक्ट बुखार की दवा दी है। किसी ने जख्मों को पूरी तरह से ठीक करने की कोशिश नहीं की। एक ने की थी, और ईमानदार कोशिश की थी, यही कारण भी है कि आज कश्मीरी भले ही दिल्ली को गाली देते हैं, लेकिन उनके घरों में अटल जी की तस्वीरें देखी जा सकती हैं।
दिल्ली की सल्तनत पर जब मोदी काबिज हुए और उन्होंने इंसानियत-जम्हूरियत-कश्मीरियत की बात कह कर कश्मीर के मामले में अटल जी की विरासत आगे बढ़ाने की बात कही, तब कश्मीरियों को भी लगा था कि अब उन्हें संगीनों के साए से आजादी मिलेगी और वे भी खुली हवा में सांस लेने वाले आम हिंदुस्तानी की तरह महसूस कर पाएंगे। लेकिन जब मोदी जी भी बम-बन्दूकों और जोर-जबरदस्ती से कश्मीर सुलझाने की नीति पर आगे बढ़े, तो कश्मीर को लेकर मोदी नीति अटल नीति से कोसों दूर हो गई। कश्मीर को लेकर मोदी नीति कुछ ऐसी ही है, जैसे कोई डॉक्टर जख्मों को कुरेद कुरेद कर ताजा बनाए रखता है और मरीज को बुखार की दवा देते रहता है। दिल्ली को अब समझना होगा कि कश्मीर का जख्म अब दर्द की उस सीमा को पार कर चुका है, जिसे और कुरेद कर 'सबक' सिखाया जा सके।
जीप की बोनट पर बंधे कश्मीरी युवा वाली तस्वीर में भले ही आपको कश्मीर में भारतीय सेना की विजय नीति नजर आए, लेकिन इन सब रणनीतियों से भारत हर दिन कश्मीर में हार रहा है। आप अगर कहते हैं कि भारतीय सेना कश्मीर में मजबूर है, तो मैं ये नहीं मान सकता। सेना वहां ताकतवर है लेकिन हमारी रणनीति गलत है। हमारी सरकार के फैसलों के कारण वीर सैनिक वहां आए दिन शहीद हो रहे हैं। हमारे गांवों में भी ये घटना आम है कि पुलिस कहीं छपेमारी करने या किसी की धर-पकड़ करने जाती है, तो कई बार उन्हें स्थानीय लोगों के विरोध का सामना करना पड़ता है। कई बार पुलिस वालों पर गांव वाले हमले भी करते हैं, पुलिस वाले घायल भी हो जाते हैं। लेकिन वहां पुलिस की हिम्मत नहीं होती कि दहशत फैलाने के लिए वो अगले दिन किसी को अपने जीप की बोनट पर बांध कर गांव में घूमा सके। लेकिन पुलिस कश्मीर में ऐसा कर सकती है, फिर कैसे आप ये आशा करते हैं कि कश्मीरी युवा टूरिज्म को चुनेंगे। आप यहां कह सकते हैं कि कश्मीर बिहार नहीं है, लेकिन कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा तो कहते हैं न, तो फिर व्यवहार रूप में इसे क्यों नहीं उतारते।
मेरा मानना है कि दबाव की रणनीति से कश्मीरी युवाओं में भारत के प्रति नफरत और बढ़ता जा रहा है। मैं कतई ये नहीं कहता कि पत्थर चलाने वालों को बख्श दिया जाय, उन्हें कठोर से कठोर सजा दी जाय। लेकिन साथ ही उन कारणों की पड़ताल कर उनके समाधान की कोशिशें भी जारी रहे, जो उन्हें हाथों में पत्थर उठाने पर मजबूर कर रहे हैं। ईवीएम ले जाते सैनिकों को मारने वालों को सजा में किसी भी तरह की रियायत नहीं होनी चाहिए, लेकिन साथ ही उन्हें उन जैसा बनाने की कोशिश की जाय, जो उसी वीडियो में सैनिकों को वहां से सुरक्षित निकालते नजर आ रहे हैं।
आपको इसके पीछे की रणनीति समझनी होगी कि एक लंबी चुप्पी के बाद, चुनाव के दौरान ही अब्दुल्ला बाप बेटे ने पत्थरबाजों के समर्थन में बयान क्यों दिया। उन्होंने चुनावी फायदे के लिए ऐसा बयान दिया, ताकि पत्थर चलाने वाले भी उनके पक्ष में वोट कर सकें। गौर करने वाली बात है कि जिसे पुलिस जीप की बोनट पर बांधा गया, वो भी वोट देकर ही आ रहा था।
मेरा मानना है कि अजित डोभाल एक सफल सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दे सकते हैं, पड़ोसी देश से सामरिक संबंधों पर रणनीति बना सकते हैं, लेकिन उनसे यह आशा रखना कि वे भारत के भाल कश्मीर को इस लोकतंत्र का मणि बना सकते हैं, ये मूर्खता है। क्योंकि अब पत्थर चलाने वालों पर पैलेट की बौछार करके कश्मीर नहीं सुलझाया जा सकता।

बुधवार, 1 मार्च 2017

मतलबी मुद्दों में बकरा बनते हम-आप

अगर आप भारत के हित में तटस्थ हो कर देखें, तो रोहित सरदाना जो प्रश्न उठाते हैं उसपर भी खून खौलता है और रवीश कुमार जो सवाल करते हैं, उसपर भी। शाजिया इल्मी को जामिया में न बोलने देना उतना ही निंदनीय है, जितना सिद्धार्थ वरदराजन को इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में भाषण न देने देना। वैसे जानना यह भी जरूरी है कि जामिया पिछले तीन साल से प्रधानमंत्री जी को अपने दीक्षांत समारोह में बुला रहा है, लेकिन वे नहीं जा रहे। हालांकि दिलचस्प ये है कि राष्ट्रवाद और देशद्रोह के नवसृजित बहस में कुछ ही मोहरे हैं, जो कभी सरदाना के स्टूडियो में होते हैं, तो कभी रवीश के। आमिर खान की पत्नी को जब देश की असहिष्णुता से डर लगा था, तब आमिर रवीश के प्राइम टाइम मैटेरियल थे और सरदाना अपने स्टूडियो से उन्हें पाकिस्तान का रास्ता दिखा रहे थे। लेकिन अपनी फिल्म के म्यूजिक राइट्स ज़ी को बेचने और फिल्म में भारत माता की जय के नारे लगवाने के बाद आमिर ज़ी के स्टूडियो में सुधीर चौधरी के साथ सेल्फी-सेल्फी खेल रहे थे। अवार्ड वापसी के समय जब मुनव्वर राणा ने कहा कि मेरी कलम की स्याही नहीं सूखी है, 'मैं अवार्ड वापस करूं, मैं लिख कर इंकलाब लाऊंगा' तो वे अवार्ड वापसी गैंग को आइना दिखाने हेतु सरदाना के लिए माध्यम थे लेकिन जब एक चैनल पर एंकर के तिलस्म में फंस कर उन्होंने अवार्ड वापसी की घोषणा कर दी, तब से वे विलेन बन गए और आज भी सरदाना उनसे सवाल कर रहे थे कि उन्होंने सोनिया गांधी पर कविता क्यों लिखी। जावेद अख्तर ने जब सदन में तीन बार भारत माता की जय के नारे लगाए, तब वे सरदाना के लिए सच्चे देशभक्त थे लेकिन आज जब एक पूर्व सफल खिलाड़ी के अमर्यादित व्यंग्य पर सवाल खड़े करते हुए उन्होंने ऐसे खिलाड़ियों को ज़ाहिल करार दिया तो वे उसी सरदाना के लिए देशद्रोही हो गए... मीडिया में काम करने वाले हज़ारों लोग आज नौकरी के नाम पर ग़ुलामी कर रहे हैं। बीते दिनों दिल्ली के एक चैनल ने ही अपने एक पत्रकार को इसलिए निकाल दिया क्योंकि वह एक दिन ऑफिस नहीं आया और इसलिए नहीं आया क्योंकि उसके पास किराया देने तक के पैसे नहीं थे। मीडिया के लिए यह मुद्दा नहीं है। देश के विश्वविद्यालयों में आज शिक्षा का स्तर और शैक्षिक माहौल एक बड़ी चुनौती है, लेकिन इसके लिए कोई छात्र संगठन या नेता आवाज़ नहीं उठाता। राजनीति करने वाले छात्र नेताओं में से अधिकतर किसान परिवारों से आते हैं, लेकिन उनमें से किसी ने भी अपने परिवार, अपने खेतों के लिए सियासत के दरवाजे पर उस धमक के साथ दस्तक नहीं दी, जैसा वे राष्ट्रवाद और देशद्रोह के नाम पर करते हैं। पिछले साल राष्ट्रीय स्तर पर उभरे एक छात्र नेता कन्हैया कुमार के पिता ने स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव और मुफलिसी के कारण दम तोड़ दिया, लेकिन इन आधारभूत जन जरूरतों के लिए कन्हैया के नेतृत्व में अब तक कोई आंदोलन नहीं हुआ। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में योगी आदित्यनाथ के प्रस्तावित कार्यक्रम का सफल विरोध कर चर्चा में आई वहां की छात्र संघ अध्यक्ष अभी कानपुर पश्चिम से सपा उम्मीदवार हैं... कहने का मतलब है कि सब अपना मतलब साध रहे हैं और इनके इन मतलबी मुद्दों में उलझ कर हम सब बकरा बन रहे हैं...


मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

बदरंग सियासी चेहरा और स्वतंत्रता की सार्थकता

श्री श्री 1008 श्री देशभक्त महोदय जी, व्यवस्था के विरोध को देशद्रोह नहीं कहते हैं और ना ही अभिव्यक्ति की आजादी को राष्ट्रवाद का हनन। सोशल मीडिया पर ज्ञान बघारने से पहले राष्ट्रवाद-राष्ट्रद्रोही और देशभक्त-देशविरोधी की असली परिभाषा पढ़ लीजिए। एक लड़की के उन्मुक्त विचारों से आपकी संप्रभुता हिल गई, लेकिन इस व्यवस्था की उस पुलिस पर प्रश्न आपको राष्ट्रद्रोह लगता है, जो बस्तर के जंगलों में आदिवासी महिलाओं के स्तन से दूध निकाल कर चाय पीती है। थोड़ा सोचिए उनके बारे में क्या वे आजाद हैं? छपरा में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ने के बाद एक घण्टे के लिए इंटरनेट बंद होता है, तो लोग जिला पदाधिकारी को घेर के गरियाने लगते हैं, लेकिन कश्मीर का युवा साल के 365 में से 300 दिन बिना इंटरनेट के संगीनों के साए में गुजारता है। हम फिर भी गर्व से इन दोनों को अखंड भारत का अभिन्न हिस्सा कहते हैं, लेकिन क्या हमारी सरकार और हमारी व्यवस्था ने इन्हें 'आजाद भारतीय' बनाने पर कभी ध्यान दिया है?
कल यूपी में रैली करते हुए मोदी जी ने भारत की उस दयनीय दशा की ओर ध्यान दिलाया, जहाँ लोग आज भी मवेशियों के गोबर को सुखाकर उसमें से अन्न का दाना निकालकर भोजन करते हैं। यह सच है कि भारत की ये दशा कांग्रेसियों के लिए शर्म से डूब मरने की स्थिति है, लेकिन प्रधानमंत्री जी जिस जमीन पर खड़े होकर कांग्रेस के कुकर्मों का पाठ कर रहे थे, उस जमीन पर दो दिन पहले तक गेंहू की हरी फसल लहलहा रही थी, जिसे रैली के लिए काट दिया गया और कई किसानों को पैसे भी नहीं मिले। शर्मिंदगी की हद देखिए कि एक तरफ जहां, किसान उन बर्बाद फसलों के लिए तो रहे थे वहीं स्थानीय भाजपा उम्मीदवार सीना तान के बोल रहे थे कि इस देश का किसान प्रधानमंत्री जी से बेहद मोहब्बत करता है और उनके लिए ख़ुशी ख़ुशी अपनी फसल कुर्बान का सकता है। वाह रे सियासत और वाह रे सियासतदां। बात भाजपा या मोदी विरोध की नहीं है, बात है उस व्यवस्था और उस सियासी मानसिकता के विरोध की जो लटीयन की दिल्ली को पूरे देश की हकीकत समझ लेता है और इस सोशल मीडिया के जमाने में जिसके भाड़े के टट्टू सवाल उठाने वाले को देशद्रोही करार देते हैं। मैं ना तो वामपंथ का पैरोकार हूँ और ना ही फर्जी राष्ट्रवादी गैंग का सदस्य, लेकिन मुद्दा आधारित राजनीति के सार्थक विरासत वाली भारतीय सियासत की धारणाओं में कैद होकर कठपुतली बनते देखना दुखद है। आजाद भारत में अभिव्यक्ति की आजादी और छात्र राजनीति का एक सार्थक इतिहास रहा है, लेकिन हाल के दिनों में इन दोनों की आड़ में जिस तरह से सियासी रोटियां सेंकी जा रही है, उसे किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता।

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

बचपन वाली सरस्वती पूजा

ऐसे तो उससे पहले वाले साल हमने 'फोटो' पर पूजा किया था, हालांकि पंडाल तब भी बना था, वह भी बाजाब्ता बांस का, चमकीली साड़ियों से सजा के। लेकिन उस साल उमंग उत्साह और जिम्मेदारी कुछ ज्यादा इसलिए थी क्योंकि हम पहली बार मूर्ति रख के पूजा करने जा रहे थे। किसी भी तरह जतन प्रयास कर के लगभग 600 रुपए इकट्ठा हुए थे। तब हमारे लिए यह एक बड़ी रकम थी, खजांची मैं ही था, वह भी एक जिम्मेदार खजांची। इसलिए लगभग हर एक घण्टे में जब तक डिब्बा खोल के पूरा पैसा गिन न लेता, चैन नहीं मिलता। हालांकि खजांची की वह जिम्मेदारी बड़े प्रयासों के बाद मिली थी। तब का नियम यही कहता था कि जो पूजा पर बैठेगा वह पैसा नहीं रखेगा। यानी जिम्मेदारी बराबर-बराबर। लेकिन इसके लिए सबके बीच कई स्तरों पर समझौता हुआ, फिर जिम्मेदारियों का निर्धारण।
खैर, पैसे इकट्ठा होने से पहले ही मूर्ति का बयाना हो चुका था। कुल 225 रुपए की माँ सरस्वती की मूर्ति के लिए शायद हमने 35-45 रुपए का एडवांस दिया था। खुद्दारी और आत्मविश्वास की वैसी मिसाल खुद में दोबारा शायद ही कभी देखने को मिली। उस समय 225 रुपए की उस मूर्ति का वजन भी हम जैसों के लिए बहुत भारी था। लेकिन फिर भी हम बड़ों की सहायता ठुकरा कर, मेरी 20 नंबर वाली साइकिल पर मूर्ति लाने के विश्वास से सिकटा के लिए निकल पड़े। मूर्ति के कारीगर को पैसा भुगतान करने के बाद साइकल के 'किलियर' पर मूर्ति रख के आगे बढ़े। उस समय हम चार लोगों में सबसे 'बलवान' दिब्यप्रकाश जी स्टेयरिंग संभाले हुए थे। लेकिन कुछ ही दूर चलने के बाद अहसास हुआ कि साइकल पर मूर्ति ले जाने की यह कोशिश कलश स्थापना से पहले ही विसर्जन करा देगी। फिर सचिन जी किसी हृष्ट पुष्ट आदमी की खोज में निकले, जो किसी तरह से रेलवे लाइन पार करा दे। फिर गांव के एक अन्य आदमी की सहायता से माँ सरस्वती सकुशल रेलवे लाइन पार कर टांगा वाले के पास पहुंचीं। फिर उसके बाद टांगा पर मूर्ति रखकर हम घर पहूंचे। तब गांव में बिजली थी नहीं, तो बल्ब जलाने और स्पीकर बजाने के लिए हमने घर में टीवी चलाने वाली बैट्री के अलावा भाड़े की बैट्री की भी व्यवस्था की थी। इलेक्ट्रॉनिक विभाग बखूबी संभाला था नीरज जी ने। खुरमा और गाजर, कोन, बैर सहित मौसमी फलों वाले प्रसाद के साथ, सकुशल मूर्ति लाकर भव्य पंडाल में अच्छी तरह से पूजा संपन्न करने के हम जैसे 'छोटे बच्चों' के कारनामों की खूब प्रशंसा भी हुई। हालांकि विसर्जन के समय हमने बड़े लोगों का सहारा लिया था।
उसके अगले साल भी हमने मूर्ति लाकर पूजा की। लेकिन इस साल हमने साइकल वाला रिस्क नहीं लिया और माँ सरस्वती टायर (बॉलगाड़ी) से आईं। इस साल बजट कुछ ज्यादा था। आजकल जैसे अलग अलग चैनल अपने चुनाव पूर्व सर्वे पर चर्चा के लिए पहले से ही पार्टी प्रवक्ताओं और विशेषज्ञों को बुक कर लेते हैं, वैसा ही कुछ पूजा के समय पंडित जी लोगों की बुकिंग होती है। हमारे पुरोहित महाशय को पूजा के समय कोई और बुला ले गए, अपना पूजा करवाने। फिर हमें एक 'कामचलाऊ' पंडित जी का सहारा लेना पड़ा। हालांकि सुबह विसर्जन के समय हमारे पुरोहित जी पधारे और जाते हुए सब समेट गए, उस पंडित जी के लिए कुछ नहीं छोड़ा जो सुबह में पूजा कराए थे। अब भी जब कभी वे सुबह वाले पंडित जी मिलते हैं, तो कहते हैं- 'रे हमार दछिनवा (दक्षिणा) ना नु देहलs सन।' वैसे उस साल हमने लाउडस्पीकर का भी बंदोबस्त किया था और उस पर केवल और केवल भजन और आरती बजा, एक भी फ़िल्मी और तड़क-भड़क वाला गीत नहीं। शाम में हमने गांव की कीर्तन मंडली से कीर्तन भी कराया। मतलब कुल मिलाकर पूजा विशुद्ध रूप से सात्विक रही। वैसे, उस साल भी विसर्जन के लिए दूसरों का सहारा लेना पड़ा, हम पानी में नहीं उतरे।
उसके बाद सिकटा मिडिल स्कूल में पढ़ते हुए भी एक साल स्कूल की पूजा में व्यवस्था और प्रबंधन संभालने का मौका मिला था। तब तो हम माँ सरस्वती की मूर्ति के लिए नरकटियागंज तक गए थे। वह मेरी पहली नरकटियागंज यात्रा थी, वह भी ट्रेन से। जाते हुए सबने कहा था, अरे टिकट क्या होगा 'अपना इलाका' है सब। बस, हम भी सवार हो गए ट्रेन में। नरकटियागंज स्टेशन पहुंचने से पहले ही सिग्नल पर किसी ने शोर मचा दिया, मजिस्ट्रेट चेकिंग हो रही है। फिर सब चलती ट्रेन से कूद कर फरार हुए। हालांकि उस डर का अहसास, उसके बाद बस में भी बिना टिकट यात्रा नहीं करने देता है। खैर, स्कूल की वह पूजा भी स्मरणीय रही। मन है, फिर से एक बार गांव के उस सरस्वती पूजा को जीने का, जिसमे ना कोई आडंबर था, ना बेहतर होने की होड़... माँ सरस्वती से मांग भी मासूमियत भरी। एक वो सरस्वती पूजा थी, जब माँ सरस्वती के सामने जमीन पर सर रखकर सोचा करते थे कि क्या मांगे माँ से, और एक आज है कि ऑफिस के लिए निकलने की जल्दी में बंद आंखे और जुड़े हाथ 'या कुन्देन्दुत सार हार धवला... के जाप और जय माँ सरस्वती' से आगे कुछ सोच ही नहीं पाए...

रविवार, 11 दिसंबर 2016

जनता फिर भी 'लाइन' में है...

'एक चुटकी भर चांदनी, एक चुटकी भर शाम,
वर्षों से सपने यही देखे यहां अवाम...।'

वादों की बलिवेदी पर बदलते इरादे देखना शायद भारतीय जनता की बदकिस्मती ही है और उसी बदकिस्मती को बयां करती है 'दिनेश शक्ल' की ये पंक्तियां। संसद का पूरा शीत सत्र हो-हल्ले की भेंट चढ़ गया। दोनों मुख्य राजनीतिक दल इसके लिए बराबर के जिम्मदार हैं। लेकिन उधर राहुल कहते हैं कि मुझे नहीं बोलने दिया जा रहा और इधर मोदी कहते हैं कि मुझे नहीं बोलने दिया जा रहा। ऐसा हो ही नहीं सकता कि राहुल की बात यूपीए का कोई नेता नहीं माने या मोदी का आदेश मानने से एनडीए का कोई नेता मुकर जाए। लेकिन दोनों जनता के सामने घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। अब होगा यही कि संसद सत्र के अंतिम दिनों में मोदी 'लाजवाब' भाषण देंगे और सत्ता पक्ष के साथ-साथ जनता भी झूम उठेगी। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक सदन में पीएम का भाषण चर्चा का विषय बन जाएगा। सब यही कहेंगे, वाह क्या बोला है, धो डाला... पर विपक्ष फिर भी सवालों के जवाब के लिए हो हल्ला मचाएगा लेकिन जनता को यह जवाब कोई नहीं देगा कि आखिर क्यों संसद सत्र में लगने वाली जनता के खून पसीने की कमाई शोर-शराबे और आरोपों-प्रत्यारोपों की भेंट चढ़ गई। अफ़सोस कि जनता आज नागरिक से ज्यादा समर्थक और विरोधी की भूमिका में आ गई है। तमाम असुविधाओं के बावजूद उसे अपने 'प्रिय' नेता के दर्शन और समर्थन के लिए 'लाइन' लगना मंजूर है... 


'भोर था प्यार अब दोपहर हो गया,
स्वप्न का हर भंवर खंडहर हो गया,
तुम संवरती-संवरती हुईं सैफई,
मैं उजड़ कर मुजफ्फरनगर हो गया।'

हर बार दिखाए जाने वाले सियासी सपने कुछ समय बाद किस तरह से केवल सपने भर बन कर रह जाते हैं और सैफई का विकास मॉडल किस तरह से पूरे सूबे की दुर्दशा के लिए एक मजाक है, इसे कवि 'प्रियांशु गजेंद्र' की इन पंक्तियों से भी समझा जा सकता है। लोहिया और चरण सिंह के बाद जब मुलायम सिंह समाजवादी खेमे के अगुआ के रूप से आगे आए, तो जनता में एक आस जगी कि अखाड़े का यह पहलवान जनता के हक़ के लिए लड़ेगा। यह 'नेता' लोहिया और चौधरी जी के समाजवाद के सपने को जिवंत करेगा। पर अफ़सोस कि समाजवाद परिवारवाद का रास्ता और विलासिता का साधन बन गया। हाल में जब समाजवादी पार्ट के नए खेवैया ने समाजवाद की जातिगत राजनीति और गुंडागर्दी वाली सियासी पहचान को सार्वजनिक रूप से ललकारा और विकास के समाजवादी मॉडल के सहारे आगे बढ़ने की बात कही, तब लगा कि 'नेता का बेटा' हाशिए पर पड़े लोगों के हौसलों को उड़ान देगा। लेकिन आज जब पता चला कि समाजवाद के सियासी सूरमाओं ने फिर से मुख्तार अंसारी जैसे गुंडे के आगे घुटने टेक दिए और उसके हत्यारे भाई को बांदा से टिकट दे दिया गया तो यह सपना फिर से भरभरा गया कि देश को दिशा देने वाली यूपी की सियासत में सूचिता लौटेगी। जनता तब भी समाजवाद की हकीकत से रूबरू हुई थी, जब मुजफ्फरनगर में सैकड़ों लोग खुले आसमान के नीचे ठंढ में ठिठुरते रहे थे और समाजवाद के पहरुआ सैफई में हीटर के बीच बॉलीवुड की बालाओं के साथ झूम रहे थे और जनता आज भी इनकी असलियत देख रही है, लेकिन इन सब के बावजूद आज भी अपने समाजवादी नेताओं के एक दीदार के लिए यूपी की बड़ी आबादी 'लाइन' लगने को तैयार है...

'जिसे मैंने सुबह समझ लिया,
कहीं वो भी शाम-ए-अलम ना हो।'

मुमताज नसीम के इस शेर को आज बिहार सरकार के प्रति पिछड़ों और वंचितों के विचार से जोड़कर देखा जा सकता है। 2005 में जब लालू के जंगल राज को जड़ से खत्म करने के मंसूबे के साथ नीतीश कुमार ने ऐलान किया कि 'वही पुलिस गोली चलाएगी' तो जनता को भयाक्रान्त माहौल से छुटकारा मिला। बिहार की जनता को लगभग एक दशक तक सुशासन की जो सौगात मिली उसी का प्रतिफल था कि बिहार की बिगड़ी पहचान के सर्जग और जंगल राज के प्रतीक लालू यादव के साथ नीतीश के  हाथ मिलाने को भी जनता ने कबूल किया और कभी चिर विरोधी रहे लालू-नीतीश को सर आंखों पर बिठाया। इस जीत से सबसे ज्यादा जो समुदाय या वर्ग खुश हुआ वह था हाशिए पर पड़ा पिछड़ा वर्ग। क्योंकि लालू किसी समय उनकी आवाज हुआ करते थे और नीतीश ने उन्हें 'गर्त' से उबारा था। अब उन्हें सपना दिखाया गया था समाज की पहली पंक्ति में कदमताल करते हुए चलने का। लेकिन दो दिन पहले भागलपुर में जो हुआ उसने ना सिर्फ उन सपनों का गला घोंटा बल्कि सरकार के इकबाल पर भी सवालिया निशान लगा दिया।  अपने आशियाने के सपने को पूरा होते देखने की आस में डीएम ऑफिस के सामने आवाज उठा रही औरतों को जिस बेरहमी और बेशर्मी से मारा गया वह निहायत ही कायरता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि ऐसी घटना नीतीश सरकार में पहली बार हुई है, पहले भी दलितों-औरतों पर लाठियां बरसाई जाती रही है। लेकिन जनता सब भूलकर फिर नीतीश को अपना 'नेता' मान लेती है। अब भी वही होगा, निश्चय यात्रा और नीतीश की अन्य यात्राओं में भी वही जनता फिर से भीड़ जुटाने के लिए 'लाइन' में लगेगी... लब्बोलुबाव यह कि हर बार की सियासी बेवफाई भी जनता को वफ़ा से नाउम्मीद नहीं करती और चोट खाने के बाद भी लोग फिर से उसी आशा, आकांक्षा और उत्साह से 'लाइन' में खड़े हो जाते हैं...

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

6 दिसम्बर: स्तंभों के ढहने और जनता के बिलखने का दिन...

वह 6 दिसम्बर ही था जब नियति ने उन लाखों लोगों को स्तंभहिन कर दिया जिनको आम्बेडकर ने सर उठा कर जीने की ताकत दी... वह 6 दिसम्बर ही था जब एक स्तंभ का गुंबज गिरते ही धर्मनिरपेक्ष भारत की बंधुता धाराशायी हो गई थी... वह 6 दिसम्बर का सूर्य ही था जिसने विश्व जगत को यह मनहूस खबर दी कि लाखों लोगों के लिए स्तंभ, वह मंडेला नहीं रहे जिनके शब्दों ने ना सिर्फ अफ़्रीका बल्कि पूरे विश्व को अपने हक़ के लिए लड़ना सिखाया... और आज भी 6 दिसम्बर ही है जब तमिलनाडु के लाखों लोग अपने सियासी व सामाजिक स्तंभ 'अम्मा'  के लिए बिलख रहे हैं... उस अम्मा के लिए आज देश आंसुओं में डूबा है, जिन्होंने जनता को अपना समझकर जननेता  की एक नई परिभाषा गढ़ी... अभी 'आज तक' पर जयललिता के साथ प्रभु चावला के पुराने 'सीधी बात' कार्यक्रम का प्रसारण हो रहा है... जयललिता बोल रही हैं, 'राजनीति नहीं प्रजा मेरा परिवार है, एआईडीएमके के लाखों कार्यकर्ता मेरा परिवार हैं'... आज यह बात सच साबित हो रही है... खैर, एक बहुत पुराना टीवी विज्ञापन याद आ रहा है-
'जाने वाले तो एक दिन चले जाते हैं,
सिर्फ यादें ही अपनी वो दे जाते हैं,
नाम उनके स्मारक बनाते रहें,
उनकी यादों को यूं ही सजाते रहें...'