मंगलवार, 31 जुलाई 2018

आत्मस्वार्थसिद्धि के लिए पहचान की बलि

'अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम्,
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्...'
अर्थात, यह मेरा है, यह उसका है, ऐसी सोच संकुचित चित्त वोले व्यक्तियों की होती है, इसके विपरीत उदारचरित वाले लोगों के लिए तो यह पूरी धरती ही एक परिवार जैसी है...' दुनिया की सभ्यताएं जब लड़खड़ा कर चलना सिख रही थीं, तब बुद्ध ने वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा प्रस्तुत कर भारत को जगत गुरु होने की संज्ञा दिलाई थी। आज भी संसार का मार्गदर्शन भारतीय दर्शन के बिना संभव नहीं है। हालांकि विडम्बना यह भी है कि यह देश अपनी अस्मिता बचाने वाली आज़ादी हासिल करने से पहले की विशेषताओं को ही आजतक ढो रहा है, अपने पैरों पर खड़ा होने के बाद से आज तक इस देश ने अपनी पहचान का बंटाधार ही किया है, जो आजतक जारी है। क्या सितम है कि पूरी दुनिया हमारी जिन विशेषताओं के लिए हमें जानती है, हमारे तथाकथित भाग्यविधाता क्षणिक निजी स्वार्थसिद्धि के लिए उन्हीं विशेषताओं को तहस-नहस करने पर आमादा हैं। मुद्दा यह नहीं है कि एनआरसी की बुनियाद वर्षों पहले तत्कालीन 'कांग्रेसी' प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने डाली थी, मुद्दा यह भी नहीं है कि वर्तमान सत्ताधारी पार्टी का अध्यक्ष खुद को खुदा समझे जाने वाली अकड़ में खुला ऐलान कर देता है कि वो एक बड़ी आबादी इस देश की नागरिक नहीं है, जिसमें देश के पूर्व राष्ट्रपति का परिवार शामिल है, जिसमें सीमा पर जान की बाजी लगाने वाले सिपाही के परिजन शामिल हैं और जिसमें ऐसे हजारों लोग शामिल हैं, जो इस लोकतंत्र का महापर्व समझे जाने वाले चुनाव में अपनी भागीदारी देते आए हैं। मुद्दा यह है कि क्या हम अपनी उस पहचान से पीछा छुड़ा रहे हैं, जो मुश्किल घड़ी में दलाई लामा को शरण देती है, जो मुश्किल घड़ी में बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को हमारी तरफ देखने का मौका देती है और जिसके कारण एक पाकिस्तानी गायक भारतीय नागरिकता का सौभाग्य पाना चाहता है।
कहा जाता है कि हमारे संविधान का बड़ा उद्देश्य देश में कानून का राज कायम करना है और इसके लिए संविधान कानून-व्यवस्था की बात करता है। यही वही संविधान है, जिसकी शपथ लेकर हर दल और हर नेता सत्ताशीन होते हैं और यह वही कानून-व्यवस्था है, जिसका राज कायम करने की बात हर सरकार करती है, तो फिर यह कैसा कानून का राज है कि हर दिन अवैध रूप से इस देश में घुसपैठ हो रहा है। जो नेता आज संसद में छाती ठोककर कह रहे थे कि हममें वो हिम्मत है कि हमने एनआरसी को लागू किया, तो फिर उनकी हिम्मत अवैध घुसपैठ रोकने के समय कहां थी। आज जब वे संसद में अपनी हिम्मत का ढोल पिट रहे थे, तब भी अवैध रूप से बांग्लादेशी असम में घुस रहे होंगे। क्या हमारी कानून व्यवस्था के पास यह क्षमता नहीं है कि अवैध घुसपैठ रोकी जा सके या उनकी पहचान की जा सके, जो आश्रय की आड़ में हमारी जमीन को खोखला कर रहे हैं? क्या चंद आततायियों की करतूतों के लिए हम उन्हें भी दरबदर कर देंगे जिन्होंने दशकों पहले इस जमीन को अपना मादरे वतन मान लिया था...? क्या यह हमारे पहचान की हमारे मूल चरित्र की बलि नहीं होगी? हमारा देश तो इस सत्य को दशकों से जीता आ रहा है कि 'हैं गांधी भी मगर हम हाथ में लाठी भी रखते हैं', तो फिर हम गांधी की पहचान का ही बंटाधार क्यों कर रहे हैं, जबकि 'दिनकर' की इस सूक्ति हमारे पास है-
'छीनता हो सत्व कोई, और तू
त्याग-तप के काम ले यह पाप है,
पुण्य है विच्छिन्न कर देना उसे
बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है...'

गुरुवार, 31 मई 2018

कौन जीता... किसकी हार...?

आज आए उपचुनाव परिणामों ने किसी को खुश होने का मौका दिया, तो किसी के चेहरे पर उदासी छा गई... एक लोकतांत्रिक देश के तौर पर हमें हर उस शख्स या दल की हार सुकून देती है, जिसने खुद को देश से ऊपर समझने की गफ़लत पाल ली हो और जो सोचता हो कि उसे कोई हरा नहीं सकता... लेकिन व्यक्तिगत तौर पर देखें, तो हमारी खुशी या गम का कोई आधार नहीं है... जो आज जीते हैं वो तो आज से राजशाही सुख भोगेंगे ही और जो हार गए उनके भी ठाट-बाट में कोई कमी नहीं आएगी... यह मैं क्यों कह रहा हूं इसके लिए आज चर्चा में रही तीन सीटों और वहां के उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि पर गौर करें, तो हमें हमारे संविधान की वो बात थोथी लगती है, जिसमें जनता के पास लोकतंत्र की चाबी होने की बात कही गई है... सितंबर 2017 में अररिया से सांसद तस्लीमुद्दीन की मृत्यु हुई, उसके बाद उनके विधायक बेटे सरफ़राज़ आलम ने अपनी विधानसभा सीट जोकीहाट से इस्तीफा देकर पिता की खाली हुई अररिया लोकसभा से मार्च 2018 में उपचुनाव जीता... इसके बाद उनकी सीट खाली हो गई, जिसके लिए उन्हीं के सगे भाई यानि तस्लीमुद्दीन के छोटे बेटे शाहनवाज़ आलम ने चुनाव लड़ा, जिसका परिणाम आज आया है... शाहनवाज़ की जीत पर छाती ठोक रहे तेजस्वी राजनीति की किस बेल से निकले हैं ये तो सबको पता ही है... कुछ ऐसी ही कहानी उत्तरप्रदेश की महत्वपूर्ण सीट कैराना की भी है... जिस तरह तस्लीमुद्दीन 90 के दशक से ही सीमांचल में 'राज' करते रहे, कुछ वैसा ही प्रभुत्व मुनव्वर हसन का भी कैराना क्षेत्र में था, बाद के दिनों में हुकुम सिंह ने उन्हें चुनौती दी... 2014 के लोकसभा चुनाव में हुकुम सिंह ने मुनव्वर हसन के बेटे नाहिद हसन को कैराना में शिकस्त दी... उसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में नाहिद हसन ने हुकुम सिंह की बेटी मृगांका को विधानसभा चुनाव में हराया... इसी साल फरवरी में हुकुम सिंह की मृत्यु हो गई, जिससे उनकी संसदीय सीट खाली हुई... उपचुनाव में भाजपा ने विधानसभा चुनाव हारी मृगांका को पिता की विरासत संभालने के लिए मैदान में उतारा तो दूसरी तरफ मृगांका को हराने वाले नाहिद हसन की मां तबस्सुम हसन पति की सियासी राह पर आगे बढ़ीं और आज के परिणाम में भारी मतों से विजयी हुईं... तबस्सुम की जीत के जरिए अपनी सियासी डूबती सियासी नैया को पार लगाने का सपना देखने वाले जयंत चौधरी भी इसी वंशवाद के बेल की बूटी हैं... परिवारों और घरानों में पीसते लोकतंत्र की यह दुर्दशा केवल उत्तर भारत में नहीं है, पूरा देश ऐसे 'सियासी आक्रांताओं' की जद में है, पूर्वोत्तर भी इससे अछूता नहीं... आज के चुनाव परिणामों में एक नाम मियानि डी शिरा का भी है, जिन्होंने मेघालय की अम्पति सीट से जीत दर्ज की है... मियानि मेघालय के पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा की बेटी हैं और मुकुल संगमा की ही एक खाली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ी थीं... आपको लगेगा कि मुकुल संगमा तो अभी राजनीति में सक्रिय हैं, तो फिर यह सीट कैसे खाली हो गई, तो इसका जवाब यह है कि हमारे संविधान ने सियासी बिरादरी को यह हक दिया है कि वो एकसाथ जितनी थाली में चाहें, खा सकते हैं और पेट भरने पर थाली को फेंक सकते हैं... आप-हम भले एक साथ दो नौकरी नहीं कर सकें, लेकिन नेता दो जगह से चुनाव लड़ सकते हैं... इसी आधार पर मुकुल संगमा ने हाल के विधानसभा चुनाव में दो सीटों से चुनाव लड़ा और दोनों पर जीत दर्ज करने के बाद एक सीट खाली कर दिया, जिसपर हुए उपचुनाव में उनकी बेटी लड़ी और जीती भी... ये लोकतंत्र की अंतहीन मार्मिक दुर्दशा का एक अंश का अंश भर है... अगली बार किसी नेता की जीत पर ताली पीटने या किसी की हार पर आंसू बहाने से पहले सोचिएगा कि क्या इस तंत्र या इस व्यवस्था में आप वहां पहुंच सकते हैं...

गुरुवार, 10 मई 2018

समाज, सियासत और मोहब्बत को शब्द देने वाला शायर

'पेड़ को काटने वालों को ये मालूम तो था,
जिस्म जल जाएंगे जब सर पे न साया होगा।'

वर्तमान समय के सबसे ज्वलंत मुद्दे को बहुत पहले शायरी में समेट कर जिस शायर ने समाज को सबक सिखाने का काम किया था उसकी मुहब्बत की पंक्तियां आज भी राह चलते लोगों को गुनगुनाते हुए सुनी जा सकती हैं। सामने वाले के चेहरे की बनावटी हंसी को देखकर आज भी अनायास ही यह गीत होठों पर आ जाता है कि
'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो 
क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो...'

मिले या बिछड़े हुए, बिछड़ते-बिछड़ते मिले हुए या मिलते-मिलते बिछड़ चुके किसी हमसफ़र की याद इस 20वीं सदी में भी इसी शायर द्वारा लिखे गए 19वीं सदी के इस गीत को ही अपना अपना गंतव्य बनाती है कि,
'चलते-चलते यूं ही कोई मिल गया था, 
सरे राह चलते-चलते,
वहीं थम के रह गई है, मेरी रात ढलते-ढलते...'

आज आजादी की पहली जंग की सालगिरह है। जी हां, आज ही के दिन 1857 में फिरंगियों से भारत की आजादी की आवाज़ बुलंद हुई थी, जिसकी परिणति ने हमें स्वतंत्रता की आबो हवा में सांस लेने की सौगात दी। लेकिन जिन कुर्बानियों की बदौलत हमने स्वतंत्रता पाई उनके लिए नतमस्तक कर देता है, इसी गीतकार का यह गीत जिसकी मैं बात कर रहा हूं,
'कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों...।'

जिस लिखनी से मातृभूमि के दीवानों का देशवासियों के लिए यह पैग़ाम निकला उसी लेखनी से उन दीवानों के दिल की आवाज भी निकली है, जिनकी सार्थकता को आज भी लोग जीते हैं...
'कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों हैं?
वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों हैं?
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों हैं?
यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों हैं?'

शायरी को दीवानों के दिल से निकला प्रश्न बनाने वाले इस शायर की इन पंक्तियों से भी आप शायद ही अनभिज्ञ होंगे कि,
'झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं 
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं...।'

प्रवास हर समय में समाज की एक पीड़ा रही है... और शायर, कवि, गीतकार की तत्कालीन समय में सार्थकता यही है कि वह उस समय के दुःखों, तकलीफों को आवाज दे... दूर रहकर अपनी जमीन को याद करने वालों की ख्वाहिस को इस शायर ने कुछ यूं शब्दों में पिरोया है कि
'वो कभी धूप कभी छांव लगे,
मुझे क्या-क्या न मेरा गांव लगे,
किसी पीपल के तले जा बैठे 
अब भी अपना जो कोई दांव लगे।'

वक्त के हंसी सितम से खुद को और 'उनको' बदलने के भाव को बयां करने वाले उस महान शायर को अब तक आप पहचान ही गए होंगे...फिर भी मैं बता देता हूं... समाज, सियासत और मुहब्बत तीनों को अपनी लेखनी से बयां करने वाले मशहूर शायर 'कैफ़ी आज़मी' की आज पुण्यतिथि है। उसी कैफ़ी आज़मी की जिन्होंने हिंदी सीने जगत को 'शबाना आज़मी' जैसी अदाकारा दी... और जो अपनी ही इन पंक्तियों को चरितार्थ कर गए कि 
'इंसां की ख्वाहिशों की कोई इंतेहा नहीं
दो गज़ ज़मीन चाहिए, दो गज़ कफ़न के बाद।'
आज ही के दिन यानी 10 मई को आज से 6 साल पहले यह मशहूर शायर, कवि, और गीतकार यह गुनगुनाते हुए हमसे रुखसत हो गया कि,
'ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं...'
लेकिन अब भी...
'जरा-सी आहट होती है तो दिल सोचता है
कहीं ये वो तो नहीं, कहीं ये वो तो नहीं...।'

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

दिल्ली का गीत और गांवों का शोकगीत

कहीं पढ़ा था कि दिनकर जब राज्यसभा के सदस्य थे, उन्हीं दिनों एकबार वे और नेहरू साथ में संसद की सीढ़ियां उतर रहे थे। नेहरू के अचानक लड़खड़ाने पर दिनकर ने उन्हें सहारा दिया, उसके बाद नेहरू के धन्यवाद पर दिनकर की प्रतिक्रिया थी कि 'सियासत के कदम जब-जब लड़खड़ाएंगे, अदब उसे सहारा देगा...' अफ़सोस कि अब न नेहरू जैसे नेता रहे और न दिनकर जैसे अदब के स्तम्भ। इत्तेफाक की बात है कि आज दिनकर की पुण्यतिथि भी थी और पंचायती राज दिवस भी। उसी पंचायती राज का दिवस जिसके जरिए गांवों के इस देश में सुराज लाने का सपना देखा गया था। लेकिन कौन जानता था कि आजादी के दो दशक बाद दिल्ली और देश के गांवों की असमानता का दिनकर द्वारा किया गया यह चित्रण आज आजादी के 7 दशक बाद भी सार्थक होगा कि
'...भारत धूलों से भरा, आंसुओं से गीला, भारत अब भी व्याकुल विपत्ति के घेरे में,
दिल्ली में तो है खूब ज्योति की चहल-पहल, पर भटक रहा है सारा देश अंधेरे में...'
दुर्भाग्य तो यह भी है कि 'ज़िंदा कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं करती' का नारा देने वाले वो लोहिया भी देश का अंधेरा दूर नहीं कर सके, जिन्होंने 'तीन आना बनाम तीन रुपया' को संसदीय विमर्श बना दिया था। आना पूरी तरह से रुपए में बदला और साहित्य के सिद्धहस्त पुरोधा दिनकर जिस नेहरू के समय में आमलोगों की आवाज़ बनकर संसद में मौजूद रहे, उसी नेहरू के नाती ने यह कहकर दिनकर की पंक्तियों के अंधेरे भारत को सियासी रूप से सहमति दे दी कि मैं यहां से सौ रुपए भेजता हूं, तो गांवों में 20 पैसे पहुंचता है। ये तो आज भी दूर की कौड़ी है कि दिल्ली से पैसा पहुंचे तो पंचायतों के जरिए देश का विकास हो, लेकिन गांवों वाले भारत के जिन गांवों के जरिए बड़े-बड़े उद्योगपति मालामाल हो रहे हों, वहां के ग्रामीण तड़प-तड़प कर मरने को मजबूर हो जाएं, तो इसे क्या कहेंगे...? जी हां, यह इसी देश की हकीकत है और इसी पंचायती राज व्यवस्था के अधीन शाषित होने वाले गांवों के लोग दिनकर की इन पंक्तियों की सार्थकता।वाले शोषण की कहानी को जी रहे हैं कि
'स्वानों को मिलते दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं,
मां की हड्डी से चिपक-चिपक जाड़े की रात बिताते हैं,
युवती के गहने बेच-बेच यहां कर्ज चुकाए जाते हैं,
और मालिक तेल-फुलेलों पर पानी से द्रव्य बहाते हैं...'
क्या विडम्बना है कि नेहरू ने देश के जिन 100 पिछड़े जिलों को विकसित करने का बीड़ा उठाया था, वे आज़ादी के 7 दशक बाद भी विकास की सीढ़ी नहीं चढ़ सके और वे सभी वर्तमान प्रधानमंत्री के 150 उम्मीदों वाले जिलों की सूची में शामिल हैं। विडम्बना तो यह भी है नेहरू के लड़खड़ाते कदमों को सहारा देने वाले दिनकर ने ही, शासन और सरकार को पांव की जूती समझ लेने वाली नेहरू की बेटी को ललकारते हुए कहा था- 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...' अफ़सोस कि सिंहासन पर तब भी जनता विराजमान नहीं हो सकी और पंचायतों के जरिए देश के विकास का सपना, सपना ही रह गया। वर्तमान सत्ताधारी पार्टी ने 2 साल पहले जब दिनकर की दो महत्वपूर्ण रचनाओं 'संस्कृति के चार अध्याय' और 'परशुराम की प्रतीक्षा' के 50 साल पूरे होने पर बिहार में एक वृहद आयोजन किया, तब भी लगा था कि शायद अब दिनकर से सत्ता का प्रेम सियासतदानों को उनके विचारों के करीब भी ले जाएगा और सुराज का सपना देख रहे ग्रामीणों के आंखों का इक्कीसवा ख्वाब पूरा होगा, पर अफ़सोस कि यह आत्मीयता जातिगत सियासत में बदल गई। दिल्ली से देखे और दिखाए जा रहे सपने अब भी धरातल पर नहीं उतर सके और दिनकर की रचना फिर से सजीव प्रतीत हुई कि
'...रेशम से कोमल तार, क्लांतियों के धागे, हैं बंधे उन्हीं से अंग यहां आजादी के,
दिल्ली वाले गा रहे बैठ निश्चिंत मगन रेशमी महल में गीत खुरदुरी खादी के...'
यह दिल्ली की खुरदुरी खादी का गीत ही है कि कभी गांवों के देश के रूप में पहचान पाने वाले भारत से अब गांव ही गायब होते जा रहे हैं। ग्रामीणों और किसानों को मजबूर से मजदूर बना देने वाली सरकारें भले ही आंकड़ों में ग्रामीण भारत के विकास का राग अलापे लेकिन हक़ीक़त यही है कि ग्रामीण भारत बीमार होकर रह गया है। वहां रोगरहित है तो बस मुखिया-सरपंच जैसे सियासतदान, ठेकेदार और माफ़िया। देश को वैश्वीकृत करने वाली सरकारें ग्रामीणों को तो शहरों तक खींच लाई, पर अफसोस कि गांवों तक विकास नहीं पहुंचा पाई। लेकिन कहते हैं न कि आखिर वादों की बलिवेदी पर बदलते इरादे कब तक बुलन्द रह सकते हैं, कभी न कभी तो सियासी सपनों का बुलबुला फूटना ही था और फूट गया... इसे विडम्बना कहें या दुर्भाग्य लेकिन सच है कि आज जब हमारे प्रधानमंत्री करीब 15 सौ दिन तक शासन करने के बाद भी छत्तीसगढ़ में ग्रामीणों वाले भारत का पंचायतों के जरिए कायाकल्प करने का सपना ही दिखा रहे थे, उसी समय उसी राज्य के एक बड़े हिस्से में ग्रामीण, पंचायतों के जरिए ही अपनी सरकार चला रहे थे। जी हां, छत्तीसगढ़ के जशपुर और अंबिकापुर जिले के करीब 20 गांवों के ग्रामीण ग्राम सभा के माध्यम से अब अपना शासन और कानून चला रहे हैं। इन गांवाें में बिना ग्राम प्रधान की अनुमति किसी का भी प्रवेश वर्जित है, वो चाहे डीएम-एसपी हों, या प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री। इसे पत्थलगड़ी कहते हैं, जिसके एलान से यहां के ग्रामीणों ने यहां अपनी सरकार कायम कर ली है। ऐसा भी नहीं है कि ये केवल छत्तीसगढ़ में हुआ है, पिछले ही महीने झारखण्ड से भी ऐसी ही खबर आई थी कि वहां के आदिवासी भी पत्थलगड़ी करके अपने क्षेत्रों में ग्राम सभा की सरकार चला रहे हैं। इसे भी विडम्बना ही कहेंगे कि हमारे देश में ग्राम सभा की सरकार चल रही है, जो कभी गांधी-नेहरू-दिनकर का सपना हुआ करता था, पर अफसोस कि अपने रहनुमाओं की रहजन वाली छवि से आजिज आकर आदिवासियों द्वारा चलाई जा रही ग्राम सभा की यह सरकार हमारे संविधान के खिलाफ है। हालांकि कभी-कभी तो लगता है कि हमारे पंचायती राज की सार्थकता ग्रामीणों के इस बागी तेवर में ही है। जल-जंगल-ज़मीन से विस्थापित कर, रसायनयुक्त जहरीले पानी के सहारे जीने को मजबूर किए जाने वाले ये आदिवासी अगर अपने संसाधनों को बचाने के लिए तीर-कमान लेकर व्यवस्था से बगावत को तैयार हैं, तो इसमे गलती किसकी है...? आखिर दिनकर ने भी तो कहा ही था कि 
'...सत्य का जिसके हृदय में प्यार हो,
एक पथ, बलि के लिए तैयार हो,
फूंक दे सोचे बिना संसार को,
तोड़ दे मंझदार जा पतवार को...'

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

सरकार ने अपना काम कर दिया अब समाज की बारी है

निर्भया कांड के बाद, बलात्कार और यौन शोषण से सम्बंधित कानून को कड़ा बनाने का सुझाव देने के लिए तत्कालीन सरकार द्वारा गठित कमिटी के अध्यक्ष जस्टिस जेएस वर्मा ने 23 जनवरी 2013 को अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए कहा था कि 'ऐसे अपराध कानून की कमी की वजह से नहीं, बल्कि सुशासन की कमी के कारण होते हैं।' अगर हम 2013 तक और उसके बाद के वर्षों में हुए बलात्कार की घटनाओं की तुलना करें तो जस्टिस वर्मा की बात सही लगती है। 2013 के पहले पॉक्सो एक्ट नहीं था। 2012 में देशभर में 8886 और 2013 में 8511 बलात्कार की घटनाएं सामने आईं। लेकिन 2013 में पॉक्सो बनने के बाद से हम देखें तो 2014, 15 और 16 में क्रमशः 36735, 34651 और 38847 महिलाएं बलात्कार की शिकार हुईं। बलात्कार के मामले में अंतिम फांसी 2004 में धनंजय चटर्जी को हुई थी, उस समय पॉक्सो नहीं था, लेकिन कानून ने अपना काम किया। कुछ सकारात्मक संशोधनों को छोड़ दें तो कई बार संविधान में बदलाव की जरूरत ही नहीं पड़ती। नए कानून या नियम की जरूरत इसलिए पड़ती है, क्योंकि पुराने वाले को कमजोर कर दिया जाता है, अगर पुराने कानूनों का सख्ती से पालन हो, तो नए की जरूरत ही न पड़े और ऐसा आज से नहीं हो रहा है, वर्षों से राजनीतिक दल और सियासदान अपने लिए और अपनों के लिए कानून को तोड़ते-मोड़ते रहे हैं। उन्नाव और कठुआ में क्या हुआ और हो रहा है, यह तो इसकी बानगी है ही इससे पहले भी ऐसे बहुत से मामले सामने आए हैं। 1996 के सूर्यनेल्ली बलात्कार मामले की पीड़िता आज भी उस दर्द और पीड़ा के साथ जी रही हैं। यह घटना थी, 16 बरस की स्कूली छात्रा को अगवा कर 40 दिनों तक 37 लोगों द्वारा बलात्कार करने की। इसमें कांग्रेस नेता पीजे कुरियन का नाम उछला और उसके बाद सिवाय राजनीति के कुछ नहीं हुआ। घटना के 9 साल बाद केरल हाईकोर्ट ने मुख्य आरोपी के अलावा सभी को बरी कर दिया। उसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट गया और कुछ को सजा हुई। 1996 में ही दिल्ली में लौ की पढ़ाई कर रही प्रियदर्शिनी मट्टू की उसके एक साथी ने बलात्कार के बाद हत्या कर दी। लड़का जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन आईजी का बेटा था। बाप के पद और पैरवी की ताकत बेटे के अपराध पर भारी पड़ी और विडम्बना देखिए कि जब यह केस हाईकोर्ट पहुंचा, तब तक वो आरोपी लड़का उसी कोर्ट में वकालत कर रहा था। भंवरी देवी बलात्कार मामले के बारे में कौन नहीं जानता। उसके आरोपी तो न नेता थे और न ही पुलिस के बड़े अधिकारी लेकिन उनकी दबंगई ने इस मामले पर सुनवाई कर रहे ट्रायल कोर्ट के पांच जजों का तबादला करा दिया था।
ऐसे उदाहरण इतने हैं कि पूरा ग्रन्थ लिखा जा सकता है, लेकिन सवाल यह है कि यहां सुशासन का राज क्यों नहीं देखने को मिला? प्रधानमंत्री जी ने लंदन में इस मामले पर कहा कि 'बलात्कार तो बलात्कार होता है, और उसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए', एकदम सही बात है, नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन किया तो जा रहा है, ऐसा नहीं किया गया होता तो उन्नाव मामले में आरोपी की गिरफ्तारी में 7 महीने का समय नहीं लगता और ऐसा नहीं किया गया होता तो कठुआ मामले के आरोपियों के पक्ष में तिरंगा यात्रा नहीं निकलती, वे दोषी सिद्ध होते हैं या बाइज्जत बरी ये अलग मुद्दा है, अभी बात सुशासन की है... और जब बात सुशासन की चलती है, तो चर्चा यह भी होती है कि कौन कितना पाक-साफ है। एडीआर का डाटा है कि वर्तमान में हमारे 48 सांसद-विधायक यौन उत्पीड़न के आरोपी हैं और अपने 12 सांसदों-विधायकों के साथ भाजपा इनमें शीर्ष पर है। वही भाजपा जिसके सियासी माई-बाप, हमारे प्रधानमंत्री जी ने लंदन में कहा कि 'जो व्यक्ति ये अपराध कर रहा है, वह भी किसी का बेटा है।' लेकिन अफ़सोस कि ऐसे बिगड़ैल बेटे हर दलों में हैं और इन्हें सुधारने के बजाय हमारी पार्टियां इन्हें चारित्रिक प्रमाण पत्र दे देती हैं। ऐसा भी नहीं है कि यह सिलसिला थम गया, तमिलनाडु के महामहिम राज्यपाल ने सवाल पूछने वाली एक महिला पत्रकार का गाल छुआ, हालांकि उन्होंने बाद में स्पष्ट किया कि उन्होंने पोती समझकर ऐसा किया था, बात आई-गई हो गई, लेकिन राज्यपाल जी के बचाव में उतरे एक वरीय भाजपा नेता ने फेसबुक पोस्ट में यह लिख दिया कि 'बड़े लोगों के साथ सोए बिना कोई लड़की रिपोर्टर या न्यूज रीडर नहीं बन सकती।'
इन सवालों का तीर भाजपा पर ज्यादातर इसलिए है क्योंकि भाजपा के पास अभी सबसे ज्यादा सांसद-विधायक हैं और भाजपा वाले ही हमारे प्रधानमंत्री जी ने पिछले दिनों कहा कि इन मुद्दों पर सियासत नहीं होनी चाहिए। खैर, बड़ी बात यह है कि हमारी सरकार ने सराहनीय कदम उठाते हुए पॉक्सो में संशोधन कर दिया है और ऐसा समय की मांग थी। लेकिन मुझे कई बार यह बहुत छोटी बात लगती है, ऐसा क्यों है इसे मैंने ऊपर में उदाहरण देकर समझा दिया है। बड़ी बात यह है कि कानून तो बन गया लेकिन सुशासन की संभावना पहले जैसी ही मद्धम है। इसलिए अब समाज को अपना काम करना है। एक आदमी जो 8 महीने और एक साल की बच्ची की मासूमियत में भी हवस का सामान ढूंढ सकता है, उसे उस समय फांसी की सजा वाले अंजाम का ख्याल भी नहीं आएगा। जरूरत इस बात की है कि समाज में संवेदना और समझ का संचार किया जाय। इंसान को इंसान के दुख-दर्द को समझने की संस्कृति पैदा की जाय। पीढ़ी-दर-पीढ़ी रिश्तों की मर्यादा और आत्मीयता का स्थानांतरण हो, तभी ऐसी घटनाओं पर लगाम लग सकती है, वरना कड़े से कड़े कानून बनते रहेंगे और ऐसे अपराध किसी की जिंदगी बर्बाद कर उसे आंकड़ों में समेटते रहेंगे...

गुरुवार, 15 मार्च 2018

तारीखों के 'राही'...

'हुआ उजाला तो हम उनके नाम भूल गए,
जो बुझ गए हैं चराग़ों के लौ बढ़ाते हुए...'

किसी कवि की ये पंक्तियां हमें इसे लेकर आगाह करती हैं कि हमारी इस अक्षुण संस्कृति के अथाह समंदर में एक बूंद का योगदान देने वालों को भी हम उसी शिद्दत से याद करें, जैसे बड़ी शख्सियतों या अपने स्वार्थ से जुड़े लोगों को याद करते हैं... और यह सिर्फ किसी शख्सियत की बात नहीं है, यह 'तारीख' की बात भी है, जो अपने आप में इतिहास का एक बड़ा कालखण्ड समेटे हुए हैं। यूं तो कहा जाता है कि इतिहास एक दिन से नहीं बनता, लेकिन इस इतिहास में कई ऐसे 'एक दिन' होते हैं, जो खुद में इतिहास होते हैं। आज की तारीख यानि 15 मार्च भी कुछ वैसी ही है। 
आज का दिन, वेदव्यास के महाकाव्य को हमारी समझ की भाषा में रूपांतरित कर महाभारत के रूप में चलचित्र के माध्यम से हम तक पहुंचाने वाले उस राही मासूम रज़ा से जुड़ा है, जिन्होंने 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' को हर गृहस्त आश्रम के लिए सूक्ति बना दिया और जिनकी कलम से निकले ये शब्द अपने घर, अपने देश के लिए तड़पते हर प्रवासी के पीड़ा की अभिव्यक्ति बन गए कि 'हम तो हैं परदेश में, देश में निकला होगा चांद...' राही मासूम रज़ा अदब की दुनिया के उन चंद हस्ताक्षरों में से एक थे, जिन्होंने साहित्य में भाषा की सीमारेखा को समाप्त किया। शेर-ओ-शायरी और ग़ज़लों की दुनिया के तो वे बेताज बादशाह हैं ही, हिंदी साहित्य को भी उन्होंने अनमोल कृतियां दी है। हिंदी सिनेमा को तो नाज़ होना चाहिए कि उसके साथ राही मासूम रजा का नाम जुड़ा। कई अनाड़ी हीरे को पत्थर समझ लेते हैं। मुहब्बत को बदकिरदारी का नाम देकर अलीगढ़ के उर्दू विभाग ने राही को निकाल दिया था। लेकिन कहते हैं न कि जो जगह दिल में बसी हो, उसकी यादें पीछा नहीं छोड़तीं, राही ने अलीगढ़ को याद करते हुए अपने एक दोस्त को एक नज्म लिखी थी, जिसके दो शेर हैं:
'...ऐ सबा तू तो उधर से गुजरती होगी
तू ही बता अब मेरे पैरों के निशां कैसे हैं,
मैं तो पत्थर था फेंक दिया, ठीक किया
अब उस शहर में लोगों के शीशे के मकां कैसे हैं...'
गौरतलब यह भी है कि महाभारत धारावाहिक से मिली प्रसिद्धि के बाद अलीगढ़ के उसी उर्दू विभाग ने राही को इज्जत के साथ आमंत्रित कर उनका सम्मान किया था। नाम और टाइटल में सियासत का सामान ढूंढने वाली वर्तमान राजनीति को उस राही मासूम रज़ा के बारे में पता होना चाहिए, जिसके पास वरिष्ठ भाजपा नेता आडवाणी जनसंघ के नेता दीन दयाल उपाध्याय के ऊपर बनने वाली डॉक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लिखवाने गए थे, और आडवाणी के यह पूछने पर कि मेहनताना क्या लेंगे? राही का जवाब था- 'दिल्ली में आपके साथ एक वक्त का खाना खा लूंगा...' 65 साल कोई बड़ी उम्र नहीं होती जाने की, लेकिन कहते हैं न कि ईश्वर को भी अच्छे लोगों की जरूरत होती है, आज ही के दिन 15 मार्च 1992 को जन्नत की सफ़र पर निकलते हुए राही अपनी पंक्तियों को सार्थक कर गए कि,
'इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई, 
हम न सोए रात थककर सो गई...'
और इत्तेफाक देखिए कि 'थककर सोने' के अहसास वाले अपने इस शेर को चरितार्थ कर जिस दिन राही इहलोक से रवाना हुए उसी दिन दुनिया #WorldSleepyDay मनाती है... 15 मार्च उस दीन दयाल उपाध्याय के सपनों से भी जुड़ा है, जिनपर बनने वाली डॉक्यूमेंट्री की स्क्रिप्ट राही मासूम रजा ने लिखी थी। 1996 में 14 दिन की सरकार गिरने के बाद अटल जी के नेतृत्व में आज ही के दिन 15 मार्च 1998 को केंद्र में दोबारा भाजपा की सरकार बनी थी। ये अलग बात है कि आज भारी बहुमत से केंद्र में बैठने के साथ-साथ 22 राज्यों तक पहुंचने वाली भारतीय जनता पार्टी अपनी विरासत को बिसारती जा रही है। खैर, सरकार या सियासत से इतनी उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए। शहादत को भी सियासत का समान बना लेनी वाली वर्तमान राजनीतिक बिरादरी में से कौन ऐसा है, जिसे याद हो कि कारगिल में तिरंगा फहराने के बाद 26/11 को मुम्बई बचाते हुए शहीद होने वाले मेजर संदीप उन्नीकृष्णन आज ही के दिन 15 मार्च 1977 को जन्मे थे। लेकिन देश की एक बड़ी राजनीतिक बिरादरी को यह तो याद ही होना चाहिए कि जिस दबे-कुचले और पीड़ित-शोषित के नाम पर उनकी सियासी दुकान चलती है, उन्हें वास्तव में सार्थक रूप से सियासत के लिए मुद्दा बनाने वाले कांशीराम भी आज ही के दिन 15 मार्च 1934 को जन्मे थे। बॉल और बल्ले में खेलों की दुनिया को समेटती जा रही वर्तमान पीढ़ी को यह तो जरूर पता होना चाहिए कि सबसे पहले आज ही के दिन 15 मार्च 1975 को हम अपने राष्ट्रीय खेल हॉकी में विश्व विजेता बने थे। आज़ादी के बाद अंग्रेज़ों द्वारा घायल छोड़ी गई इस सोने की चिड़िया को आज ही के दिन 15 मार्च 1950 को योजना आयोग के रूप में विकास की दवा का फॉर्मूला मिला था। तो मूल बात यह है कि हर दिन खास होता है, ये अलग बात है कि उनमें से कुछ उस अहसास से भी जुड़े होते हैं, जिनके लिए राही मासूम रजा ने लिखा कि
'हां उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें
हां वही लोग जो अक्सर हमें याद आए हैं...'

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

गुंडातंत्र न बन जाए हमारा गणतंत्र

'भले ही हमारा देश 15 अगस्त को स्वतंत्र हुआ, लेकिन हमें असली आज़ादी मिली थी आज के दिन, यानि 26 जनवरी को। आज ही के दिन हमारा संविधान लागू हुआ और हमें भारतीय होने का दर्जा हासिल हुआ...' स्कूली दिनों में आज के दिन का हमारा भाषण ऐसा ही होता था। तब इस भाषण को रटना पड़ता था, तब भले ही समझ उतनी विकसित नहीं थी, लेकिन आस्ता भरपूर थी। दिल्ली आने के बाद याद नहीं कि कभी मैं बिना खाए या पूजा करके झंडा फहराने गया हूं, लेकिन स्कूली दिनों में यह हमारे लिए सामाजिक नहीं व्यक्तिगत उत्सव हुआ करता था, जिसमे भगवान भी शामिल थे, गांधी-नेहरू-भगत-सुभाष भी और सेना के वीर सिपाही भी। तब हम मन्दिर में जल चढ़ाने के बाद झंडा फहराने जाया करते थे वो भी बिना अन्न ग्रहण किए, क्योंकि वो भी एक तरह से पूजा के समान था। तब का बालमन भी उस दिन की पूजा में खुद की नहीं, देश की हिफाजत की दुआ करता था। 
आज ऐसे ही सोच रहा था कि क्या सभी का बचपन ऐसा ही बीता होगा, खासकर उनका जो आज थोथी इज्जत के नाम पर शासन की धज्जियां उड़ा रहे हैं और सियासी शह जिनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा। मुझे नहीं लगता कि उन्होंने 'स्व' से आगे पढ़कर 'पर' के बारे में कभी सोचा होगा, देश के लिए दुआ करना तो दूर की बात है। क्योंकि जो देश की संपदा को विनष्ट करना अपनी जीत समझे, जिसके लिए लोगों में भय का माहौल पैदा करना उद्देश्य की प्राप्ति हो, जो देश की सर्वोच्च संस्था न्यायपालिका को अपने जूते की नोक पर रखे और जो अपनी बात मनवाने के लिए बच्चों से भरी बस पर भी पत्थर फेंकने से गुरेज न करे, वो खुद के बारे में तो सोच सकता है, लेकिन देश के बारे में नहीं। देश एक व्यक्ति, एक संस्था या एक जातिगत समूह से नहीं बनता, खासकर भारत जैसे देश की पहचान तो वैसी नहीं है। विविधता में एकता हमारी पहचान रही है, पर अफसोस कि एकता के नाम पर एकरूपता लादी जा रही है। ऐसा तो गणतंत्र नहीं था हमारा। न सिर्फ शासन बल्कि सामाजिकता के स्तर पर भी हमें आत्ममंथन की जरूरत है। आज तो पढ़े लिखे बुद्धिजीवियों को भी करणी सेना के करतूत वाजिब दिख रहे हैं। जिन्हें अपने दादा-दादी से बैठकर बात करने की फुर्सत नहीं, जो अपने परदादा-परदादी का नाम तक नहीं जानते, वे भी आज पद्मावती के बहाने विरासत बचाने की बात कर रहे हैं। आज जब हमारा गणतंत्र 69वे साल में प्रवेश कर गया, हमें सोचना चाहिए कि इतने सालों में हमने क्या पाया और जो पाया उसे अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए क्या प्रयत्न कर रहे हैं। केवल राजस्थान की ही बात करें, तो किसी भी क्षेत्र के किसी अखबार का कोई संस्करण ऐसा नहीं होता है, जिसमे किसी भी दिन बलात्कार या महिलाओं के खिलाफ अपराध की कोई घटना नहीं हो, लेकिन आजतक किसी भी संगठन ने उसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई। जिन राजूपत राजघरानों की राजकुमारियां आज विदेशों की पाश्चात्य संस्कृति में सराबोर हो रही हैं, उन्हें ये चिंता सताने लगी कि सिनेमा के पर्दे पर पद्मावती देवी का किरदार निभा रही अभिनेत्री का पेट क्यों दिख रहा है। दिक्कत यह है कि हम अपने बंधे-बंधाए दायरे से बाहर निकलना नहीं चाहते। 
हमने न सिर्फ बचपन से पढ़ा है, बल्कि देखा भी है कि हमारे आस-पास के लोगों का आचार-विचार, बोल-चाल, रहन-सहन सब भिन्न होता है। मेरे गांव से महज 2 किमी की दूरी पर एक मुस्लिम बहुल गांव है, उनकी भाषा हमारे गांव की भाषा से अलग है, उनका पहनावा और रहन-सहन भी हमसे अलग है। लेकिन न सिर्फ हम सद्भाव वाले पड़ोसी गांवों के हैं, बल्कि उस गांव के बच्चों के साथ मैं हॉस्टल में भी रहा हूं। यह है हमारा वास्तविक गणतंत्र, पर अफसोस कि यह 'है' अब धीरे-धीरे 'था' में बदलता जा रहा है। दुर्भाग्यवश ऐसा कहना पड़ रहा है कि वर्तमान का भारत हमें हमारे वास्तविक भारत से अलग छवि पेश कर रहा है। हम मानते हैं कि हर दौर में अभिव्यक्ति की आजादी का बेजा इस्तेमाल होता रहा है, हर दौर में लोगों की भावनाएं आहत होती रही हैं, हर दौर में गुंडे-मवाली सड़कों पर आते रहे हैं, लेकिन क्या हर दौर में सरकार के इक़बाल पर सवालिया निशान खड़ा होता रहा है? क्या हर दौर में सरकार ने निरीह-निस्पृह होने का दिखावा करते हुए हुड़दंगियों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया है? हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने जब पहली बार कहा था कि 'संविधान हमारे लिए ग्रन्थ है' तब लगा था कि इस सरकार में वैसा कुछ नहीं होगा जैसा 1975 में देश के संविधान के साथ और 1984 में देश के भाईचारे के खिलाफ हुआ था। लेकिन इस गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देशभर से आने वाली खबरों ने हमारे उस विश्वास की चूलें हिला दी हैं कि अब वैसा कुछ नहीं होगा। सप्ताह भी पूरे नहीं हुए जब हमारे प्रधानमंत्री जी ने एक समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा था कि 'मैं चुनावी फायदों को ध्यान में रखकर फैसला नहीं लेता', तो क्या आहत भावना के नाम पर गुंडागर्दी करने का खुला छूट दे देना चुनावी फायदे को ध्यान में रखकर लिया जाने वाला फैसला नहीं है? कौन नहीं जानता कि पद्मावती रिलीज नहीं करने वाले मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और गोवा में किसके आदेश से शासनात्मक पत्ता हिलता है? कांग्रेसी शासन के भ्रष्टाचार से त्रस्त भारतवासियों को सुकून मिलता था मोदी जी के कांग्रेस मुक्त भारत के नारे से, लेकिन अगर कांग्रेस मुक्त भारत का असली ध्येय यही है कि सब जगह मनमाफिक हुक्म चलाया जाए, फिर क्या फायदा इस कांग्रेस मुक्त भारत का? इसी 26 जनवरी से कुछ दिन पहले 2015 में अपनी कुछ लोकतांत्रिक मांगों को लेकर धरने पर बैठे अरविंद केजरीवाल को अराजक की संज्ञा दी दी गई थी, वो भी इन्हीं भाजपाइयों द्वारा, लेकिन देशभर में शासन की छाती पर मूंग दलने वाले मुट्ठी भर हुड़दंगियों के खिलाफ निंदा के दो शब्द बोलना भी हमारी सरकार ने जरूरी नहीं समझा है। हम वैश्विक स्तर पर भारत की पहचान बुलन्द करने की बात करते हैं, लेकिन उन 10 आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्षों को हम किस तरह के भारत से रूबरू कराया रहे हैं, जो अभी नई दिल्ली में हैं। क्या अभी उन तक सिर्फ भारत-आसियान बैठक की खबर ही पहुंचती होगी, क्या वे इंरनेट और टीवी के जरिए नहीं देख रहे होंगे कि मीटिंग हॉल और लाटीयन की दिल्ली के बाहर का भारत अभी किस माहौल में जी रहा है? हमने तो सिंघम फ़िल्म के इस डायलॉग को शासन का चरित्र समझ लिया था कि 'पुलिस चाह दे तो किसी मंदिर के आगे से कोई एक जूता भी नहीं चुरा सकता', तो क्या मैं गलत था...? क्या गुंडातंत्र बनना ही अब इस गणतंत्र की नियति है...?