सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

यह पराश्रित होने की पीड़ा है

'अंगना में माई रोए ली,
दुअरा पर लोग बिटोराइल बा,
मेहरी बेहोश भइली गिर के धड़ाम से,
भूअरा के डेड बॉडी आइल बा आसाम से...'

...तब तक मेरे मन में यही धारणा थी कि ताबूत में बंद होकर बाहर से आना वाला हर शव दुश्मन के हाथों 'शहीद' हुए जवानों का होता है, तब नहीं पता था कि जवान सिर्फ देश की सीमा पर नहीं मरते, राज्यों के भीतर की सीमारेखा भी उन्हें काल का ग्रास बना सकती है... राजनीति के निठल्लेपन से उपजी बेरोजगारी और पलायन के पीड़ा बन जाने की दारुण दशा से अपना पहला साक्षात्कार उपर्युक्त भोजपुरी गीत के माध्यम से ही हुआ था। तब असम में बिहारियों को पीटा जा रहा था। अपनों की खुशी के लिए घर छोड़ पराया हुए लोग ताबूत या बोरे में बंद होकर आ रहे थे या फिर घायल अवस्था में। कुछ दिनों तक सब ठीक रहा, हम बाल्यकाल से किशोरावस्था में प्रवेश किए और बिहारियों पर होने वाले जुल्म ने भी प्रदेश बदल लिया, यह दौर था मराठी अस्मिता की आग में बिहारियों के हवन का। हमारे रहनुमाओं और हमने तब आवाज बुलंद की होती, तो फिर किसी ठाकरे के बाद किसी ठाकौर की मजाल नहीं होती ऐसा करने की। हमने समझा ही नहीं कि जो बिहारी बाहुबल गुजरात और महाराष्ट्र की तरक्की को धक्का दे सकता है, वो बिहारियों पर उठने वाले हाथों को भी मरोड़ने की कूवत रखता है। न हमने यह समझा और न सियासत ने हमें यह समझने दिया। वैसे यह समस्या सियासी और बेरोजगारी से ज्यादा पराश्रित होने की है, हम दूसरों के भरोसे खुद को सौंपकर निश्चिंत हो जाते हैं। 
याद कीजिए, जब नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 'जब एक बिहारी गुजरात जाता है, तो तब तक उसकी माँ चिंतित रहती है, जब तक वो गुजरात की सीमा पर प्रवेश नहीं कर जाता...' क्या उस समय किसी ने आवाज़ उठाई कि हम बिहारी गुजरात जाएं ही क्यों, आप हमें हमारे घर में ही कमाई के साधन क्यों नहीं मुहैया करा सकते...? ये पूछने की बात छोड़िए, जहां पर मोदी ने यह बात कही थी वहीं पर बंद चीनी मिल को लेकर भी यह कहा था कि अगली बार आऊंगा तो इस चीनी मिल की चीनी की चाय पीकर जाऊंगा। मोदी उस जगह दोबारा गए, लेकिन वो चीनी मिल आज भी बंद है। मोदी के उस दोबारा हुए दौरे पर बंद चीनी मिल को लेकर चूं तक नहीं करने वाले लोगों ने ही गुजरातियों को हौसला दिया कि वे हम बिहारियों को पीट सकें, क्योंकि उन्हें समझ आ गया है कि जो अपने घर में अपने हक के लिए आवाज़ नहीं उठा सकते, वो लौटकर तो यही आएंगे। यह बात गुजराती भली भांति जानते हैं, वो चाहे बिहारियों को पीटने का खुला एलान करने वाला गुजरात में बैठा बिहार कांग्रेस का प्रभारी हो, या बिहार के भरोसे अगली बार फिर प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब पाले देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठा व्यक्ति। मतलब हद है कि विरोधी पार्टी के शासन वाले राज्य में हुई एक बस दुर्घटना पर भी कई ट्वीट करने वाले हमारे प्रधानमंत्री ने 50 लाख बिहारियों के अपने गृह राज्य से मारपीटकर खदेड़े जाने पर एक ट्वीट तक नहीं किया...

'NRC से पहले कर दिया SRC बहाल
वडनगर के संत तूने कर दिया कमाल...'

*SRC- State Register of Citizens

रविवार, 30 सितंबर 2018

अगला नंबर आपका है...!

अभिज्ञान शाकुन्तलम में एक दृष्टांत आता है कि जंगल में शिकार करने गए राजा दुष्यंत शकुंतला से मिले और उनके साथ सहवास किया, ये खबर जब माता गौतमी को लगी तो वे शकुंतला के साथ रात्रि के तीसरे पहर में राजा दुष्यंत के यहां पहुंचीं। उन्होंने द्वारपाल से पूछा कि क्या हम राजा से मिल सकते हैं, तो उसका जवाब था- 'अवश्यमेवं, लोकतंत्रस्य सर्वाधिकारः'... अंधेरगर्दी वाली सियासत से निकली बेलगाम सरकार की बर्बर पुलिस के हाथों मारे गए एक आम आदमी की विधवा सत्ता के शीर्ष पर विराजमान 'व्यक्ति' से मिलने की गुहार लगाती रह जाती है, लेकिन चंद किलोमीटर दूर उस पीड़िता के दर पर पहुंचकर अपनी पुलिस की गुंडागर्दी के कबूलनामे के साथ उसके आंसू पोछने के बजाए प्रदेश के मुख्यमंत्री आलाकमान के आदेश का पालन करने सैकड़ों किलोमीटर दूर दिल्ली पहुंच जाते हैं... किसे लोकतंत्र कहें...? आज की सरकारों को, जिनके लिए उनकी प्रजा वोटिंग मशीन का बटन दबाने वाली उंगली भर है, या हजार साल पहले के उस समय को, जब रात्रि के तीसरे पहर में भी प्रजा द्वारा अपने राजा से मिलने के लिए उनके दरवाजे पर दी गई दस्तक का जवाब होता था, 'अवश्य, आप मिल सकते हैं अपने राजा से, यह लोकतंत्र में आपका अधिकार है...' जैसा कि सियासत चाहती है और जैसा कि हर बार होता है, इस बार भी सत्ता की कारगुजारियों पर यह चर्चा हावी हो गई कि मरने वाला हिन्दू था या मुसलमान, सवर्ण या दलित... किसी ने इस मामले को दिल्ली के मुख्यमंत्री के हिन्दू-मुस्लिम एंगल वाले ट्वीट की तरफ मोड़ दिया, तो किसी ने अखिलेश और मायावती की चुप्पी की तरफ... हे भारतवासियों, इन सियासतदानों की चुप्पी या सवाल इनके हर बिरादर भाई के लिए कवच-कुंडल का काम करती है, भुगतने के लिए रह जाते हैं हम और आप... अगर अपने जैसे किसी निर्दोष इंसान की बेहरमी से हुई हत्या भी आपको नहीं झकझोरती तो, नवाज़ देवबंदी की इन पंक्तियों का सुबह-शाम पाठ कीजिए, हो सकता है कि सियासी समर्थन और विरोध के बोझ से दबा जमीर जाग जाए-
'जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है,
आपके पीछे तेज़ हवा है आगे मुकद्दर आपका है
उसके क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरा नम्बर अब आया,
मेरे क़त्ल पे आप भी चुप हैं अगला नंबर आपका है...'

शनिवार, 1 सितंबर 2018

हिंदी साहित्य के 'दुष्यंत'

मैं जब भी दिल्ली की दौलत द्वारा दुत्कारे गए दबे कुचलों को चकाचौंध से दूर फुटपाथ के अंधेरों में अपनी बदरंग दुनिया को दुरुस्त करने की असफल कोशिश करते देखता हूं तो अनायास ही ये पंक्तियां याद आ जाती हैं- 

'...न हो क़मीज़ तो पांव से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए.'

आधुनिकता के साथ कदमताल करते अलग-अलग सफ़र के दो राही के हमसफ़र बनने की जद्दोजहद जब भी विरासत के आडंबरों वाली थोथी आना के आगे दम तोड़ देती है, तो जी करता है कि जोर से चिल्लाऊं- 

'अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं...'

शाइनिंग इंडिया के सपनों के महज नारों तक सिमटने की बात हो, भारत निर्माण के दावों के बस फाइलों में दफन होने की, या फिर अच्छे दिनों के वादों के जुमला बन जाने की... वादों की बलिवेदी पर बदलते इरादे हर पांच साल बाद इस दुआ को मजबूर कर देते हैं- 

'...हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.'

बॉलीवुड यानि मायानगरी मुम्बई को पहला ऑस्कर देने वाला धारावी हो या फिर अपने पसीने के ईंधन से दिल्ली की चकाचौंध बढ़ाने वालों को अपने अंधेरे कबूतरखानों में छुपाए राजधानी का कापसहेड़ा... इनकी दयनीय दशा अपनी अभिव्यक्ति के लिए खुद-ब-खुद इन पंक्तियों का गंतव्य तय कर लेती हैं- 

'कहां तो तय था चरागां हर एक घर के लिए
कहां चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए...'

शायद ही कोई हो, जिसने किसी अपने को, उसकी असफ़लता के बाद उपजी हताशा और निराशा को दूर करने और मार्गदर्शित करने के लिए इन पंक्तियों का सहारा न लिया हो-

'कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो.'

1977 में हुए आज़ादी के बाद के दूसरे सबसे बड़े जनांदोलन के बाद 2011 में जिस राजनीतिक बदलाव की बयार बही और जिसका असर दिल्ली से होते हुए कोहिमा से कांडला और कश्मीर से कन्याकुमारी तक महसूस किया गया, उसका सूत्र वाक्य यही था और आज भी हर सियासी वायदों का सारथी यही पंक्तियां हैं- 

'सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़्सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए'

सत्ता के मनमाफ़िक इतिहास न लिखने वाले लेखकों की तौहीन हो, सरकार के कसीदे न पढ़ने वाले कवियों की बेइज्जती, या फिर चाटुकारिता को तैयार न होने वाले पत्रकारों के पर कतरने की बात... हर ऐसी घटना इस शेर की याद दिलाती है-

'तेरा निज़ाम है सिल दे ज़बान-ए-शायर को
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए...'

वो चाहे एक गूंगी गुड़िया द्वारा अपने को सत्ता की महारानी समझने की गफ़लत हो, या फिर वर्तमान समय के साहेब द्वारा खुद को खुदा समझने की भूल... एक आम जनता के एक छोटे शरीर की एक छोटी उंगली के एक छोटे हिस्से भर की हैसियत वाले सेवक जब भी खुद को देश से ऊपर समझने लगते हैं, ये पंक्तियां उन्हें औकात दिखाती हैं- 

'...तुम्हारे पांव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं.'

'मैं यहां से 1 रुपए भेजता हूं तो गांव तक 15 पैसे ही पहुंचते हैं' 3 दशक बीत गए, जब सत्ता के सर्वोच्च शिखर द्वारा यह दुर्भाग्यपूर्ण स्वीकारोक्ति हुई थी, पर अफ़सोस आज भी हकीकत ने वहां से कुछ ज्यादा दूरी तय नहीं की, हालांकि अवाम अब खुलकर कहती है-

'यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा...'

हमारी रोजमर्रा की अभिव्यक्ति को स्वर दे रही इन जैसी अनगिनत पंक्तियों के लेखक की आज जयंती है। मसान फ़िल्म में प्रेमिका के रेल सी गुजरने पर प्रेमी के थरथराने की प्रेमाभिव्यक्ति भले आपको फिल्मी लगे लेकिन यह उस मूल गजल लेखक के जीवन में प्रेम की पटरियों के उखड़ने का दर्द है, जो अपने पिता की अना के आगे अपनी मुहब्बत को हार गया और फिर लिखा- 
'मैं तुझे भूलने की कोशिश में, आज कितने क़रीब पाता हूं,
कौन ये फ़ासला निभाएगा, मैं फ़रिश्ता हूं सच बताता हूं'
करीब साढ़े चार दशक की उम्र बहुत बड़ी नहीं होती, कई शख्सियतों को तो दुनिया इस उम्र के बाद ही जानती है, लेकिन इतिहास के रंगमंच पर कुछ ऐसे किरदार भी आए जिनकी अदाकारी का पटाक्षेप बहुत जल्द हो गया, लेकिन उनके कौशल पर आज भी तालियां बज रही हैं और उनके शब्द आज भी असंख्य लोगों की अभिव्यक्ति के काम आ रहे हैं। हिंदी साहित्य और इस समाज को यह दुर्भाग्य सालता रहेगा कि इसे दुष्यंत कुमार के साथ का सौभाग्य बहुत कम समय तक ही मिला...

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

एक अजातशत्रु का अवसान...

एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा 
आंख हैरान है क्या शख़्स ज़माने से उठा...

यह शेर उस देश की शायरा परवीन शाकिर का है, जिसके लिए अटल जी ने कहा था- 'दोस्त बदले जा सकते हैं, पड़ोसी नहीं...' आज अटल जी पंचतत्व में विलीन हो गए, लेकिन पाकिस्तान से जुड़ी कश्मीर समस्या के समाधान को लेकर जब भी ईमानदार प्रयासों का जिक्र होगा अटल जी का नाम पहले आएगा। कश्मीर से जुड़े हर स्थानीय नेता कश्मीर समस्या के लिए हिंदुस्तानी नेता और नीति को जिम्मेदार मानते हैं, लेकिन समाधान के लिए ईमानदार प्रयास का जब भी जिक्र आता है, तो उनके होठों पर सिर्फ एक नाम होता है और वह है, 'अटल बिहारी वाजपेयी।' मैं ऐसे बहुत से 'हार्डकोर' भाजपाइयों को जानता हूं, जो एक प्रधानमंत्री के रूप से अटल जी को पसंद नहीं करते और ऐसे कई बड़े नेताओं को भी जानता हूं, जो धुर विरोधी हो कर भी अटल जी की सियासी सोच के कायल हैं। ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि अटल जी ने कभी विचारधारा को थोपने वाली सियासत नहीं की, हां वे एक प्रखर राष्ट्रवादी थे। वे चाहते थे कि अयोध्या में राम मंदिर बने लेकिन वह ये भी चाहते थे कि कश्मीर सुलझाने के लिए कश्मीरियों से बात की जाय। भारत ही नहीं दुनिया की सियासत ने दुबारा किसी 'अटल' शख्सियत को नहीं देखा क्योंकि कोई और नेता इन पंक्तियों को जी ही नहीं पाया कि

'टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते,
सत्य का संघर्ष सत्ता से, न्याय लड़ता निरंकुशता से,
अंधेरे ने दी चुनौती है, किरण अंतिम अस्त होती है,
दांव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते,
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते...।'

आज भारतीय सियासत के इस अजातशत्रु का अवसान हो गया, लेकिन अपने सुकर्मों द्वारा इन्होंने राजनीति को जो दिशा दिखाई वह युग-युगांतर तक इस महान नेता की गाथा गाते रहेंगे। आज जब सियासी सफर के हर कदम में करोड़ों-अरबो लुटाए जा रहे हैं इस समय सियासत के इस पितामह की याद आती है, जब इन्होंने भरी संसद में कहा था- 
'ऐसी सरकार जो सांसदों के खरीदने से बनती हो मैं इसे चिमटे से छूने से अस्वीकार करता हूं।' वर्तमान सियासत में जबकि विरोध का स्तर ज़ुबानी नीचता की परकाष्ठा पार कर रहा है, हमारे नेताओं को अटल जी के उस व्यक्तित्व से सीख लेने की जरूरत है जिसके कारण विपक्षी दल के प्रधानमंत्री 'नरसिम्हा राव' ने इन्हें सरकार का नुमाइंदा बना कर पाकिस्तान भेजा था। आज के नेताओं को, विरोधी की नजर में भी अपनत्व की उस अटल छवि से सीखने की जरूरत है, जिसके कारण निवर्तमान प्रधानमंत्री 'राजीव गांधी' ने अटल जी के मना करने के बावजूद उन्हें एक प्रतिनिधिमंडल के साथ जाने के बहाने इसलिए अमेरिका भेजा था ताकि वे वहां अपने घुटने का इलाज करा सकें क्योंकि अटल जी की खुद की आर्थिक स्थिति वैसी नहीं थी कि वे अपने खर्च से अमेरिका जाकर इलाज कराएं। आज के दौर में बनने से पहले टूटने वाले गठबंधन के सूत्रधार नेताओं को तो यह पता ही होगा कि वह 'अटल क्षमता' ही थी जिसकी बदौलत भारतीय राजनीति ने 24 दलों के गठबंधन की सफल सरकार देखी थी। कितना अच्छा होता कि आज अटल जी के लिए श्रद्धांजलि के लिए उमड़े हुजूम में से हर नेता उनकी स्वच्छ छवि वाली विरासत को आगे बढ़ाते और उनकी इन पंक्तियों को सार्थक करते कि,

'आओ फिर से दिया जलाएं
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएं,
आओ फिर से दिया जलाएं...।'

वे अटल जी ही थे जिन्होंने संसद के भीतर विदेश निति पर हो रही चर्चा में अपनी बात से तत्कालीन प्रधानमंत्री 'नेहरू' जी को प्रभावित कर दिया था और नेहरू जी ने अटल जी की प्रशंसा करते हुए कहा था, 'आप एक दिन जरूर देश का प्रतिनिधित्व करेंगे।' वे अटल जी ही थे जिन्होंने पाकिस्तान को उसकी भाषा में जवाब दिया और समय पर समझाया भी कि,

'ओ नादान पड़ोसी अपनी आंखें खोलो,
आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ।'

वर्तमान राजनीति के खराब चरित्र का एक कारण यह भी है कि अब इसके पास कोई 'अटल शख्सियत की छवि' नहीं रही... हिन्दू धर्म की मेरी मान्यता यह उम्मीद जगाती है कि मौत से ठनी रार में अवसान को प्राप्त हुआ यह अजातशत्रु पुनर्जन्म लेकर दोबारा इस देश की सियासत और सामाजिकता को पटरी पर लाने के लिए आएगा, क्योंकि वे न सिर्फ इस देश की जरूरत हैं, बल्कि चाहत भी हैं। आज उनकी अंतिम यात्रा में प्रधानमंत्री, दर्जन भर से ज्यादा मुख्यमंत्री, सैकड़ों सांसद-विधायक, लाखों पार्टी कार्यकर्ता और असंख्य लोग जरूर दिखे होंगे, लेकिन मैंने जो देखा उससे ऑफिस में बैठे हुए आंखें डबडबा गईं। दीनदयाल उपाध्याय से होकर आईटीओ चौराहे पर आने के क्रम में एक चैनल का कैमरा कुछ समय के लिए एक बुजुर्ग पर फोकस हुआ, जो एक हाथ से आंसू पूछते हुए दूसरे हाथ से 'अटल बिहारी जिंदाबाद' के नारे लगा रहे थे... इस दृश्य से एक शेर याद आ गया कि
'कहानी खत्म हुई और ऐसे खत्म हुई
कि लोग रोने लगे तालियां बजाते हुए...

गुरुवार, 2 अगस्त 2018

बेलगाम सत्ता और निरीह चौथा खम्भा

किसी स्वयंसेवी संस्था को चाहिए कि रवीश कुमार की इस सूक्ति का शिलापट्ट देशभर में लगा दे कि 'एक डरा हुआ पत्रकार लोकतंत्र में मरा हुआ नागरिक पैदा करता है...' सच में लग रहा है कि एक नागरिक के तौर पर इस देश की जनता विचार-शून्य स्थिति में पहुंच गई है और शायद सरकार भी यह समझ गई है कि अब इस देश में नागरिक नहीं समर्थक और विरोधी बसते हैं। आज का दिन वर्तमान दौर की भारतीय पत्रकारिता के लिए महत्वपूर्ण है। इस दिन को खासकर दो बातों के लिए याद रखा जाना चाहिए। पहली यह कि एक शख्स ने अपने पत्रकारीय धर्म के निर्वहन के लिए सत्ता के सान्निध्य को ठोकर मार दी और दूसरी यह कि वैश्विक स्तर पर महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर महान भारतीय लोकतंत्र की शानदार बहुमत वाली सरकार एक पत्रकार से डर गई। वैसे ये डर अचानक सामने नहीं आई। आलमपनाह की परेशानी तो उसी दिन से शुरू हो गई थी जब मास्टर स्ट्रोक की शुरुआत ही सत्ता और सत्ताधारी पार्टी की 'भागीदारी' से देशभर में हो रहे खनन की खबरों से हुई थी। सरकार को इस बात ने भी कचोटा कि आखिर इस पत्रकार को यह क्यों दिखा कि केवल बीते एक साल में हुए 12553 बैंक फ्रॉड में देश को 18 हजार करोड़ से ज्यादा का चूना लग गया... इस पत्रकार ने इस सच का ढोल क्यों पीटा कि 2009-13 के बीच 87 हजार करोड़ रहने वाला एनपीए 2014-18 में 4 लाख करोड़ के करीब पहुंच गया... इस पत्रकार को यह खबर कैसे मिली कि बीते 4 साल में सरकार 9 बार तेल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर 31 खरब रुपए कमा चुकी है... इस पत्रकार ने क्यों यह गणना की कि बीते चार साल में सरकार परस्त गुंडों की भीड़ ने 64 निर्दोषों को बेमौत मार दिया... इस पत्रकार ने क्यों यह सवाल उठाया कि जो देश केवल एक साल 2009-10 में अपने 18 हजार से ज्यादा गांवों को रौशन कर चुका है, उसी देश में 4 साल में विद्युतीकृत किए गए 18 हजार गांव कौन सी बड़ी उपलब्धि हैं... इस पत्रकार ने सेस के खेल को उजागर करते हुए क्यों यह सच देश के सामने रखा कि बीते चार साल में हुई सेस की कमाई में से खर्च के बाद भी सरकार के खाते में साढ़े 17 खरब रुपए बचे हुए हैं, जिनका कोई लेखा-जोखा नहीं है... इस पत्रकार ने सीएजी रिपोर्ट वाली उस ख़बर को क्यों तूल दी, जिसमें सरकार के 19 मंत्रालयों द्वारा देश को 1179 करोड़ रुपए का चूना लगाने की बात सामने आई थी... ऐसी अनेक खबरें हैं जिनके कारण सरकार को पुण्य प्रसून वाजपेयी खटकने लगे थे... हाल के दिनों की सबसे बड़ी खबर वो थी जब इन्होंने सरकार की आंख में आंख डालकर साबित कर दिया कि प्रधानमंत्री के सामने मजमा सजाकर जबरदस्ती उगलवाया जाता है कि किसान की आमदनी 50 प्रतिशत बढ़ गई...
होना तो यह चाहिए था कि खुद के लिए प्रधानसेवक सुनने को लालायित रहने वाले हमारे प्रधानमंत्री जी इन सभी खबरों से सीख लेकर देश को आगे बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त करते। नोटबंदी के कुछ दिन बाद आम लोगों के लिए भी बैंकिंग ट्रांजैक्शन को आसान बनाने से सम्बन्धित एक स्किम का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने मीडिया को इसलिए धन्यवाद दिया था, क्योंकि किसी टीवी चैनल पर उन्हें एक ऐसे आदमी की पीड़ा दिखी थी जिसके पास स्मार्टफोन नहीं था। मीडिया के साथ नरेंद्र मोदी के छत्तीस के आंकड़े वाले इतिहास के बावजूद उस समय मुझे लगा था कि तथाकथित छप्पन इंची सीने वाले इस शख्स में अपनी आलोचना सुनने और उससे सीख लेने की क्षमता है, लेकिन उसके बाद कई ऐसे उदाहरण दिखे, जिसने साबित किया कि वो मेरी गलत धारणा थी। वो चाहे सेल्फी के लिए लालायित रहने वाले चंद पत्रकारों को ही इंटरव्यू देने की बात हो या सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों और संस्थानों के पीछे हाथ धोकर पड़ने की, हर बार इस सरकार ने लोकतंत्र के चौथे खंभे की नींव कमज़ोर करने की कोशिश की। हमने यही पढ़ा है कि पत्रकारिता सत्ता के चरणवन्दन का नाम नहीं है और न ही पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम है। अफसोस कि सत्ता से सर्वार्थसिद्धि साधने वाले चंद पत्रकारों और अपने भविष्य के लिए राज्यसभा की चौखट ताकने वाले कुछ मालिकों ने पत्रकारिता को पीआईबी और सूचना प्रसारण मंत्रालय से भी गया-गुजरा बना दिया और दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इस देश की जनता उसे ही पत्रकारिता समझ बैठी। मोदी जी आज चाहें तो अपने चार साल के कामों के लेखा-जोखा वाला बैनर बीच समुंदर में लगवा सकते हैं, लेकिन सुदूर गांव का कोई वंचित-पीड़ित अपनी बात बगल के थानेदार और बीडीओ तक पहुंचाने में भी असमर्थ होता है। विडम्बना देखिए कि सरकार उन्हें ही पत्रकारिता का झंडाबरदार मान चुकी है, जो सरकार के कामों को विज्ञापन एजेंसी की तरह फैला रहे हैं और उनके पीछे हाथ धोकर पड़ी है जो उस जनता की आवाज को सत्ता के कान तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत हैं, जिनतक आज़ादी के 70 वर्ष में लोकतंत्र की रौशनी नहीं पहुंची। यही पत्रकारिता वे तीन लोग कर रहे थे, जिन्हें सत्ता की ताकत ने आज टीवी स्क्रीन से हटा दिया। 

मंगलवार, 31 जुलाई 2018

आत्मस्वार्थसिद्धि के लिए पहचान की बलि

'अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम्,
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्...'
अर्थात, यह मेरा है, यह उसका है, ऐसी सोच संकुचित चित्त वोले व्यक्तियों की होती है, इसके विपरीत उदारचरित वाले लोगों के लिए तो यह पूरी धरती ही एक परिवार जैसी है...' दुनिया की सभ्यताएं जब लड़खड़ा कर चलना सिख रही थीं, तब बुद्ध ने वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा प्रस्तुत कर भारत को जगत गुरु होने की संज्ञा दिलाई थी। आज भी संसार का मार्गदर्शन भारतीय दर्शन के बिना संभव नहीं है। हालांकि विडम्बना यह भी है कि यह देश अपनी अस्मिता बचाने वाली आज़ादी हासिल करने से पहले की विशेषताओं को ही आजतक ढो रहा है, अपने पैरों पर खड़ा होने के बाद से आज तक इस देश ने अपनी पहचान का बंटाधार ही किया है, जो आजतक जारी है। क्या सितम है कि पूरी दुनिया हमारी जिन विशेषताओं के लिए हमें जानती है, हमारे तथाकथित भाग्यविधाता क्षणिक निजी स्वार्थसिद्धि के लिए उन्हीं विशेषताओं को तहस-नहस करने पर आमादा हैं। मुद्दा यह नहीं है कि एनआरसी की बुनियाद वर्षों पहले तत्कालीन 'कांग्रेसी' प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने डाली थी, मुद्दा यह भी नहीं है कि वर्तमान सत्ताधारी पार्टी का अध्यक्ष खुद को खुदा समझे जाने वाली अकड़ में खुला ऐलान कर देता है कि वो एक बड़ी आबादी इस देश की नागरिक नहीं है, जिसमें देश के पूर्व राष्ट्रपति का परिवार शामिल है, जिसमें सीमा पर जान की बाजी लगाने वाले सिपाही के परिजन शामिल हैं और जिसमें ऐसे हजारों लोग शामिल हैं, जो इस लोकतंत्र का महापर्व समझे जाने वाले चुनाव में अपनी भागीदारी देते आए हैं। मुद्दा यह है कि क्या हम अपनी उस पहचान से पीछा छुड़ा रहे हैं, जो मुश्किल घड़ी में दलाई लामा को शरण देती है, जो मुश्किल घड़ी में बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को हमारी तरफ देखने का मौका देती है और जिसके कारण एक पाकिस्तानी गायक भारतीय नागरिकता का सौभाग्य पाना चाहता है।
कहा जाता है कि हमारे संविधान का बड़ा उद्देश्य देश में कानून का राज कायम करना है और इसके लिए संविधान कानून-व्यवस्था की बात करता है। यही वही संविधान है, जिसकी शपथ लेकर हर दल और हर नेता सत्ताशीन होते हैं और यह वही कानून-व्यवस्था है, जिसका राज कायम करने की बात हर सरकार करती है, तो फिर यह कैसा कानून का राज है कि हर दिन अवैध रूप से इस देश में घुसपैठ हो रहा है। जो नेता आज संसद में छाती ठोककर कह रहे थे कि हममें वो हिम्मत है कि हमने एनआरसी को लागू किया, तो फिर उनकी हिम्मत अवैध घुसपैठ रोकने के समय कहां थी। आज जब वे संसद में अपनी हिम्मत का ढोल पिट रहे थे, तब भी अवैध रूप से बांग्लादेशी असम में घुस रहे होंगे। क्या हमारी कानून व्यवस्था के पास यह क्षमता नहीं है कि अवैध घुसपैठ रोकी जा सके या उनकी पहचान की जा सके, जो आश्रय की आड़ में हमारी जमीन को खोखला कर रहे हैं? क्या चंद आततायियों की करतूतों के लिए हम उन्हें भी दरबदर कर देंगे जिन्होंने दशकों पहले इस जमीन को अपना मादरे वतन मान लिया था...? क्या यह हमारे पहचान की हमारे मूल चरित्र की बलि नहीं होगी? हमारा देश तो इस सत्य को दशकों से जीता आ रहा है कि 'हैं गांधी भी मगर हम हाथ में लाठी भी रखते हैं', तो फिर हम गांधी की पहचान का ही बंटाधार क्यों कर रहे हैं, जबकि 'दिनकर' की इस सूक्ति हमारे पास है-
'छीनता हो सत्व कोई, और तू
त्याग-तप के काम ले यह पाप है,
पुण्य है विच्छिन्न कर देना उसे
बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है...'

गुरुवार, 31 मई 2018

कौन जीता... किसकी हार...?

आज आए उपचुनाव परिणामों ने किसी को खुश होने का मौका दिया, तो किसी के चेहरे पर उदासी छा गई... एक लोकतांत्रिक देश के तौर पर हमें हर उस शख्स या दल की हार सुकून देती है, जिसने खुद को देश से ऊपर समझने की गफ़लत पाल ली हो और जो सोचता हो कि उसे कोई हरा नहीं सकता... लेकिन व्यक्तिगत तौर पर देखें, तो हमारी खुशी या गम का कोई आधार नहीं है... जो आज जीते हैं वो तो आज से राजशाही सुख भोगेंगे ही और जो हार गए उनके भी ठाट-बाट में कोई कमी नहीं आएगी... यह मैं क्यों कह रहा हूं इसके लिए आज चर्चा में रही तीन सीटों और वहां के उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि पर गौर करें, तो हमें हमारे संविधान की वो बात थोथी लगती है, जिसमें जनता के पास लोकतंत्र की चाबी होने की बात कही गई है... सितंबर 2017 में अररिया से सांसद तस्लीमुद्दीन की मृत्यु हुई, उसके बाद उनके विधायक बेटे सरफ़राज़ आलम ने अपनी विधानसभा सीट जोकीहाट से इस्तीफा देकर पिता की खाली हुई अररिया लोकसभा से मार्च 2018 में उपचुनाव जीता... इसके बाद उनकी सीट खाली हो गई, जिसके लिए उन्हीं के सगे भाई यानि तस्लीमुद्दीन के छोटे बेटे शाहनवाज़ आलम ने चुनाव लड़ा, जिसका परिणाम आज आया है... शाहनवाज़ की जीत पर छाती ठोक रहे तेजस्वी राजनीति की किस बेल से निकले हैं ये तो सबको पता ही है... कुछ ऐसी ही कहानी उत्तरप्रदेश की महत्वपूर्ण सीट कैराना की भी है... जिस तरह तस्लीमुद्दीन 90 के दशक से ही सीमांचल में 'राज' करते रहे, कुछ वैसा ही प्रभुत्व मुनव्वर हसन का भी कैराना क्षेत्र में था, बाद के दिनों में हुकुम सिंह ने उन्हें चुनौती दी... 2014 के लोकसभा चुनाव में हुकुम सिंह ने मुनव्वर हसन के बेटे नाहिद हसन को कैराना में शिकस्त दी... उसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में नाहिद हसन ने हुकुम सिंह की बेटी मृगांका को विधानसभा चुनाव में हराया... इसी साल फरवरी में हुकुम सिंह की मृत्यु हो गई, जिससे उनकी संसदीय सीट खाली हुई... उपचुनाव में भाजपा ने विधानसभा चुनाव हारी मृगांका को पिता की विरासत संभालने के लिए मैदान में उतारा तो दूसरी तरफ मृगांका को हराने वाले नाहिद हसन की मां तबस्सुम हसन पति की सियासी राह पर आगे बढ़ीं और आज के परिणाम में भारी मतों से विजयी हुईं... तबस्सुम की जीत के जरिए अपनी सियासी डूबती सियासी नैया को पार लगाने का सपना देखने वाले जयंत चौधरी भी इसी वंशवाद के बेल की बूटी हैं... परिवारों और घरानों में पीसते लोकतंत्र की यह दुर्दशा केवल उत्तर भारत में नहीं है, पूरा देश ऐसे 'सियासी आक्रांताओं' की जद में है, पूर्वोत्तर भी इससे अछूता नहीं... आज के चुनाव परिणामों में एक नाम मियानि डी शिरा का भी है, जिन्होंने मेघालय की अम्पति सीट से जीत दर्ज की है... मियानि मेघालय के पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा की बेटी हैं और मुकुल संगमा की ही एक खाली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ी थीं... आपको लगेगा कि मुकुल संगमा तो अभी राजनीति में सक्रिय हैं, तो फिर यह सीट कैसे खाली हो गई, तो इसका जवाब यह है कि हमारे संविधान ने सियासी बिरादरी को यह हक दिया है कि वो एकसाथ जितनी थाली में चाहें, खा सकते हैं और पेट भरने पर थाली को फेंक सकते हैं... आप-हम भले एक साथ दो नौकरी नहीं कर सकें, लेकिन नेता दो जगह से चुनाव लड़ सकते हैं... इसी आधार पर मुकुल संगमा ने हाल के विधानसभा चुनाव में दो सीटों से चुनाव लड़ा और दोनों पर जीत दर्ज करने के बाद एक सीट खाली कर दिया, जिसपर हुए उपचुनाव में उनकी बेटी लड़ी और जीती भी... ये लोकतंत्र की अंतहीन मार्मिक दुर्दशा का एक अंश का अंश भर है... अगली बार किसी नेता की जीत पर ताली पीटने या किसी की हार पर आंसू बहाने से पहले सोचिएगा कि क्या इस तंत्र या इस व्यवस्था में आप वहां पहुंच सकते हैं...